आंखों-देखी: केरसई पंचायत – विकास के इंतज़ार में खड़ा एक आदिवासी गांव : जशपुर जिले के फरसाबहार विकासखंड के दौरे से लौटकर संतोष चौधरी,संपादक ख़बर जनपक्ष

विशेष रिपोर्ट : 

11 जून 2025

जशपुर जिले का केरसई पंचायत — स्टेट हाईवे-17 के दोनों ओर फैला एक गांव जो मानो विकास के द्वार पर खड़ा होकर अब भी दस्तक की प्रतीक्षा कर रहा है। स्कूल है, बैंक है, व्यापारिक सुविधा है, लेकिन दो सबसे बुनियादी ज़रूरतें – सड़क और पानी – आज भी गांववालों की पहुंच से बाहर हैं।

मुख्य सड़क से जैसे ही बड़का बस्ती और नवाटोली की ओर कदम बढ़ते हैं, एक उखड़ी, गड्ढों से भरी सीमेंट कांक्रीट की सड़क मानो यह बताने लगती है कि असली लड़ाई अब शुरू होती है। थोड़ी ही दूर पर बैराटोली की एक महिला मिलती है, जो रास्ता दिखाते हुए बताती है – “यही कच्चा रास्ता है, बाबू।”

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रास्ता जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, दृश्य एक आदिम समाज की झलक देता है – बरगद के पेड़ के नीचे बैठी एक बुज़ुर्ग महिला, पास में उसका नशे में धुत बेटा, ऊपर टीले पर मिट्टी का घर और सामने से आती आंगनबाड़ी सहायिका जो पांच नन्हें बच्चों को लेकर लौट रही थी। वह कहती है, “सरकार ने सब दिया, लेकिन सड़क देना भूल गई।”

बड़का बस्ती की आंगनबाड़ी तक पहुँचने पर दुश्वारी और बढ़ जाती है। कार्यकर्ता बताती हैं कि बच्चों के लिए पानी आसपास के घरों से मांगकर लाना पड़ता है। टंकी है, लेकिन केवल हवा से भरी — सपनों की तरह खोखली। हालांकि आंगनबाड़ी का कक्ष और रसोई स्वच्छ और सुसज्जित हैं, लेकिन सड़क की बदहाली उस सुंदरता पर धूल फेंक देती है।

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गांव की महिलाएं और बच्चे बताते हैं कि यहां साइकिल या बाइक से गिरना आम बात है। बरसात में स्कूल जाना मुश्किल हो जाता है। बीमार या गर्भवती महिलाओं को खाट पर उठाकर एक किलोमीटर दूर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है। कई बार इलाज पहुंचने से पहले मौत दस्तक दे देती है।

युवक कैलाश तिर्की बताते हैं, “नेता लोग चुनाव के वक्त आते हैं, सड़क का वादा कर जाते हैं, और फिर गायब हो जाते हैं।” लेकिन इस बार एक उम्मीद जगी है – गोपाल कश्यप नाम का एक स्थानीय युवक बीडीसी बना है, जो सचमुच कुछ करना चाहता है। गांववालों की आवाज़ बनकर वह खुद मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से मिल चुका है, इंजीनियरों को लेकर मुआयना करवा चुका है।

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ब्लॉक डेवलपमेंट कमेटी मेंबर गोपाल कश्यप कहते हैं – “मैं खुद भी आदिवासी हूं, मैं इन लोगों की तकलीफ समझता हूं। इन ग्रामीणों के साथ मुख्यमंत्री निवास बगिया जाकर मुख्यमंत्री जी से सड़क और पानी को लेकर ज्ञापन दिया। उनकी पहल से सड़क के लिए अनुपूरक बजट में प्रस्ताव भेजा गया है और पानी के लिए भी जगह चिन्हित कर ली है। जल्द ही पीएचई विभाग के साथ मिलकर बोरिंग कराएंगे।”

बड़का बस्ती में 80 घर हैं और सभी उरांव आदिम जनजाति से हैं। वे शिक्षित हैं, लेकिन सहज, शांत और संघर्ष से अधिक इंतज़ार को जीवन का हिस्सा मानने वाले लोग हैं।

केरसई पंचायत की यह तस्वीर केवल एक गांव की नहीं है, यह उस भारत की झलक है जो विकास के नक्शे पर चिन्हित तो है, लेकिन अब भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्षरत है। यहां की मिट्टी में अब भी उम्मीद की जड़ें हैं — बस ज़रूरत है, उस जड़ को सींचने वाले हाथों की।

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