अधिकार से परिणाम की ओर: मनरेगा को VBGRAM-G से बदलने का तर्क

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(अधिकार से परिणाम की ओर: मनरेगा को VBGRAM-G से बदलने का तर्क)   नीरवा मेहता के विचार   सार्वजनिक नीतियों का मूल्यांकन भावना, पुरानी यादों या राजनीतिक प्रतीकों के आधार पर नहीं, बल्कि उनके वास्तविक परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। मनरेगा को विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण अधिनियम, 2025 (VB GRAM G) से बदलने के निर्णय पर स्वाभाविक रूप से विरोध हुआ है। आलोचकों का कहना है कि यह नया कानून अधिकारों को कमजोर करता है, राज्यों पर बोझ डालता है, केंद्र के हाथों में सत्ता का केंद्रीकरण करता है और महात्मा गांधी की विरासत को मिटा देता है। लेकिन ये आपत्तियाँ नीति के वास्तविक स्वरूप से अधिक राजनीतिक मानसिकता को दर्शाती हैं।   VB GRAM G पर सबसे बड़ा आरोप यह है कि यह अधिकार आधारित ढाँचे को तोड़ देता है। यह तर्क इस गलत मान्यता पर आधारित है कि कानूनी अधिकार अपने आप सशक्तिकरण में बदल जाता है। मनरेगा के लगभग दो दशकों के अनुभव ने इस सोच की सीमाओं को उजागर कर दिया है। मजदूरी में लगातार देरी, काम की अधूरी मांग, खराब गुणवत्ता की परिसंपत्तियाँ और असमान क्रियान्वयन ने धीरे-धीरे उस अधिकार को खोखला कर दिया, जिसे न्यायसंगत माना गया था। जो अधिकार समय पर, व्यापक स्तर पर और निरंतर रूप से लागू ही न हो सके, वह व्यवहार में अधिकार नहीं रह जाता। VB GRAM G राज्य की रोज़गार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी खत्म नहीं करता, बल्कि उसे नए तरीके से संरचित करता है—समयसीमा तय करके, परिणामों से वित्त पोषण जोड़कर और जवाबदेही को संस्थागत रूप देकर। यह अधिकारों का कमजोर होना नहीं, बल्कि उनकी व्यावहारिक सुधार प्रक्रिया है।   इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह नया कानून भारत की विकास सोच में एक आवश्यक बदलाव को दर्शाता है। मनरेगा को तीव्र ग्रामीण संकट के दौर में एक राहत योजना के रूप में तैयार किया गया था। लेकिन यदि संकट आधारित रोज़गार को स्थायी नीति बना दिया जाए, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ठहराव को सामान्य बना देता है। VB GRAM G अल्पकालिक रोज़गार को आजीविका निर्माण, कौशल विकास और उत्पादक परिसंपत्तियों से जोड़ता है। केवल काम के दिनों की गिनती से हटकर स्थायी आय और आजीविका पर जोर देना इस सच्चाई को स्वीकार करता है कि गरिमा केवल काम मिलने से नहीं, बल्कि आय की स्थिरता, उत्पादकता और सामाजिक उन्नति से आती है। जो कल्याणकारी व्यवस्था खुद को समय के साथ नहीं बदलती, वह गरीबी खत्म करने के बजाय निर्भरता को बढ़ावा देती है।   राज्यों पर बढ़ते वित्तीय बोझ की चिंता भी गहराई से देखने पर टिकती नहीं। पुराने ढाँचे में राज्यों को केंद्रीय फंड में देरी, अनियोजित देनदारियों और लागत साझा करने के विवादों का सामना करना पड़ता था। VB GRAM G स्पष्ट वित्तीय भूमिकाएँ, मध्यम अवधि की योजना और परिणाम आधारित वित्तपोषण लाता है। वास्तविक वित्तीय संघवाद की नींव ही पूर्वानुमेयता है। इससे राज्यों को संकट प्रबंधन के बजाय योजनाबद्ध ढंग से काम करने का अवसर मिलता है, जिससे उनकी प्रशासनिक स्वायत्तता मजबूत होती है।   इसी तरह, अत्यधिक केंद्रीकरण का आरोप राष्ट्रीय मानकों और सूक्ष्म प्रबंधन के बीच के अंतर को समझने में चूक करता है। इतने बड़े पैमाने की योजना में पारदर्शिता, पात्रता और निगरानी के लिए एकसमान मानक जरूरी हैं। स्थानीय संस्थाएँ अब भी कार्यों की पहचान करेंगी, परियोजनाएँ लागू करेंगी और क्रियान्वयन की निगरानी करेंगी। फर्क सिर्फ इतना है कि अब प्रदर्शन और जवाबदेही पर जोर दिया गया है। इतिहास बताता है कि बिना निगरानी के विकेंद्रीकरण का लाभ अक्सर श्रमिकों से ज्यादा बिचौलियों को मिला है। VB GRAM G इसी संरचनात्मक दोष को ठीक करने की कोशिश करता है।   सबसे भावनात्मक आलोचना महात्मा गांधी का नाम हटाने को लेकर है। यह तर्क नीति की वास्तविक प्रभावशीलता के बजाय प्रतीकवाद को प्राथमिकता देता है। गांधी की आर्थिक सोच उत्पादक श्रम, आत्मनिर्भरता, विकेंद्रीकृत विकास और नैतिक जिम्मेदारी पर आधारित थी। उनके नाम को बनाए रखते हुए प्रणालीगत अक्षमताओं को स्वीकार करना उनकी विरासत का सम्मान नहीं है। इसके विपरीत, टिकाऊ सामुदायिक परिसंपत्तियों, स्थानीय उद्यम और आजीविका की स्थिरता पर आधारित कार्यक्रम गांधीवादी सिद्धांतों के कहीं अधिक अनुरूप है, बजाय इसके कि केवल जीविका-भर काम को अंतिम लक्ष्य मान लिया जाए।   हर सुधार का विरोध होता है, खासकर जब वह जमी-जमाई राजनीतिक धारणाओं को चुनौती देता है। लेकिन सामाजिक नीति को समय में जकड़कर नहीं रखा जा सकता। भारत की जनसंख्या संबंधी दबाव, वित्तीय सीमाएँ और विकास की आकांक्षाएँ ऐसे साधनों की मांग करती हैं जो मापनीय और ठोस परिणाम दें। VB GRAM G ग्रामीण रोज़गार नीति को इनपुट आधारित अधिकार से हटाकर परिणाम आधारित गारंटी की ओर ले जाने का एक सचेत प्रयास है। इस बदलाव के लिए सतर्कता, निरंतर सुधार और अनुशासित क्रियान्वयन जरूरी होगा। लेकिन सुधार का विरोध करना उससे भी बड़ी विफलता होगी।   असल विकल्प करुणा और दक्षता या अधिकार और सुधार के बीच नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या हम ऐसी कल्याणकारी व्यवस्था चाहते हैं जो बदलती वास्तविकताओं के साथ खुद को ढाले, या फिर ऐसी जो पुरानी संरचनाओं से चिपकी रहे, भले ही उनकी सीमाएँ उजागर हो चुकी हों। VB GRAM G सोच के इसी विकास का संकेत है। इसका लक्ष्य सार्वजनिक खर्च को टिकाऊ ग्रामीण समृद्धि में बदलना है। राष्ट्रीय बहस की दिशा राजनीतिक नॉस्टैल्जिया नहीं, बल्कि यही लक्ष्य तय करना चाहिए। लेखक के बारे में: निरवा मेहता एक राजनीतिक विश्लेषक और स्तंभकार हैं, जो सार्वजनिक नीति, शासन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर लिखती हैं। उनका लेखन सत्ता संरचनाओं, राज्य के व्यवहार और भारत तथा वैश्विक संदर्भ में नीतिगत फैसलों के दीर्घकालिक प्रभावों पर केंद्रित रहता है।

*नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त होने पर जशपुर में जश्न, पार्टी नेताओं ने जताई खुशी*

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*नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त होने पर जशपुर में जश्न, पार्टी नेताओं ने जताई खुशी* जशपुर छत्तीसगढ़ प्रदेश भाजपा के प्रभारी एवं बिहार सरकार के मंत्री श्री नितिन नबीन के भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त होने पर जशपुर जिले में भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं में भारी उत्साह देखा गया। इस अवसर पर जशपुर जिले के विभिन्न स्थानों पर भाजपा कार्यकर्ताओं ने पटाखे फोड़े, मिठाइयां बांटी और एक-दूसरे को बधाई देकर खुशी मनाई। इस दौरान पार्टी नेताओं ने कहा कि नितिन नबीन का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना संगठन की मजबूती और कार्यकर्ता आधारित राजनीति की जीत है। उनके नेतृत्व में भाजपा देशभर में और अधिक सशक्त होकर जनहित के कार्यों को आगे बढ़ाएगी। पूर्व प्रदेश महामंत्री *कृष्ण कुमार राय* ने कहा कि नितिन नबीन का छत्तीसगढ़ प्रभारी के रूप में कार्यकाल अत्यंत सफल और प्रेरणादायी रहा है। उनके प्रभारी रहते छत्तीसगढ़ में संगठनात्मक ढांचे को मजबूती मिली, कार्यकर्ताओं में नया उत्साह आया और भाजपा ने जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत की। अब उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से पूरे देश में पार्टी को इसी तरह सशक्त नेतृत्व मिलेगा। पूर्व राज्यसभा सांसद *रणविजय सिंह जूदेव* ने कहा कि नितिन नबीन एक अनुभवी, दूरदर्शी और संगठन के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित नेता हैं। उनका राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना भाजपा के उज्ज्वल भविष्य का संकेत है। जशपुर विधायक *रायमुनी भगत* ने कहा कि यह नियुक्ति पूरे भाजपा परिवार के लिए गर्व का विषय है। नितिन नबीन के नेतृत्व में पार्टी गरीब, किसान, महिला और आदिवासी समाज के कल्याण के लिए और अधिक प्रभावी ढंग से कार्य करेगी। पत्थलगांव विधायक *गोमती साय* ने कहा कि नितिन नबीन का लंबा संगठनात्मक अनुभव और कार्यशैली भाजपा को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी। इससे कार्यकर्ताओं में नया जोश और आत्मविश्वास पैदा हुआ है। जिला पंचायत अध्यक्ष *सालिक साय* ने कहा कि नितिन नबीन का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना आदिवासी एवं ग्रामीण अंचलों के विकास को भी नई दिशा देगा। उनके नेतृत्व में सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास का संकल्प और मजबूत होगा। भाजपा जिलाध्यक्ष *भरत सिंह* ने कहा कि जशपुर जिले के सभी कार्यकर्ता इस ऐतिहासिक निर्णय से अत्यंत उत्साहित हैं। नितिन नबीन का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना पार्टी की संगठनात्मक शक्ति और अनुशासन का प्रतीक है। उनके नेतृत्व में भाजपा राष्ट्र निर्माण के लक्ष्य को और दृढ़ता से आगे बढ़ाएगी। उक्त जानकारी देते हुए जिला भाजपा मीडिया प्रभारी फैज़ान सरवर खान ने बताया कि जशपुर बस स्टैंड में कार्यक्रम के समय मुख्य रूप से बलरामपुर जिला संगठन प्रभारी ओमप्रकाश सिन्हा, नगरपालिका अध्यक्ष अरविंद भगत, जनपद अध्यक्ष गंगा राम भगत, संतोष सिंह, मुकेश सोनी, शरद चौरसिया, पिंटू गोस्वामी, रागिनी भगत, सुधीर पाठक, रविन्द्र पाठक, विनोद निकुंज, विजय सहाय, राजा सोनी, आकाश गुप्ता, दीपक गुप्ता, सज्जू खान, नीतीश गुप्ता, राहुल गुप्ता, नागेंद्र भगत सहित भाजपा कार्यकर्ता उपस्थित थे।

देखिए धान की “उल्टी गंगा” — राइस मिल से सीधे खरीदी केंद्र पहुंच रहा धान!प्रशासन की बड़ी कार्रवाई

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देखिए धान की “उल्टी गंगा” — राइस मिल से सीधे खरीदी केंद्र पहुंच रहा धान! जशपुर से बड़ी खबर जशपुर जिले में धान खरीदी के बीच एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आमतौर पर किसानों का धान खरीदी केंद्र से राइस मिल जाता है, लेकिन जशपुर में मामला बिल्कुल उल्टा निकला — राइस मिल से धान निकालकर सीधे खरीदी केंद्र ले जाने की कोशिश पकड़ी गई है। ताजा मामला कांसाबेल विकासखंड का है। यहां बगिया स्थित वेदांश राइस मिल से अवैध रूप से धान निकालकर उसे चोंगरीबहार धान खरीदी केंद्र ले जाया जा रहा था। प्रशासन को गुप्त सूचना मिली थी, जिसके बाद पुलिस और राजस्व विभाग की संयुक्त टीम ने जाल बिछाकर कार्रवाई की। 🚜 दो ट्रैक्टर पकड़े गए, 100 क्विंटल धान जब्त कार्रवाई के दौरान राइस मिल से निकलकर धान खरीदी केंद्र की ओर जा रहे दो ट्रैक्टरों को रोका गया। ट्रैक्टरों में करीब 100 क्विंटल धान लोड था। ट्रैक्टर चालकों मानेश्वर सिदार और यमन बेहरा ने पूछताछ में स्वीकार किया कि धान राइस मिल से चोंगरीबहार धान खरीदी केंद्र ले जाया जा रहा था। यह कार्रवाई राइस मिल के पास ही, खरीदी केंद्र के रास्ते में की गई। फिलहाल दोनों ट्रैक्टर जब्त कर लिए गए हैं और दस्तावेजों की जांच जारी है। ❓ पुराने धान को नया बताकर खपाने की आशंका प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक आशंका है कि राइस मिल में रखा पुराना धान नए धान के रूप में खरीदी केंद्र में खपाने की कोशिश की जा रही थी। अगर ऐसा साबित होता है, तो यह सीधे-सीधे सरकारी खरीदी प्रणाली से बड़ा खेल माना जाएगा। 🔍 और भी जगहों से मिल रही शिकायतें धान मंडी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि सिंगीबहार क्षेत्र की एक राइस मिल से भी आसपास की मंडियों में इसी तरह धान भेजे जाने की चर्चा है।हमारी पड़ताल जारी है। इतना ही नहीं, गड़बड़ी पकड़ने के लिए उपरकछार बेरियर पर लगाए गए सीसीटीवी कैमरे की दिशा भी संदिग्ध बताई जा रही है। कैमरा सड़क की बजाय पुलिस चौकी को कवर कर रहा है। जानकारों का दावा है कि जिला प्रशासन राइस मिलों के सीसीटीवी कैमरे में धान लद रहे विजुअल और धान खरीदी में लगे सीसीटीवी कैमरे से धान उतरते विजुअल की मिलान करे तो बिचौलिए और राइस मिलर बेपर्दा हो जाएंगे। आज दोपहर करीब 2 बजे बेरियर पर कोई भी अधिकारी-कर्मचारी ड्यूटी पर मौजूद नहीं था, जिससे ग्रामीणों के आरोपों को और बल मिलता है। 🏛️ संरक्षण का आरोप, बड़ा खेल होने की चर्चा ग्रामीणों और मंडी सूत्रों का दावा है कि यह खेल छोटे स्तर का नहीं, बल्कि बड़े संरक्षण में चल रहा है। चर्चा है कि किसी प्रभावशाली व्यक्ति का संरक्षण राइस मिलरों को मिल रहा है। ⚠️ प्रशासन सख्त, बड़ी कार्रवाई के संकेत अधिकारियों का कहना है कि धान खरीदी में किसी भी तरह की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जांच के बाद राइस मिल संचालक पर कड़ी कार्रवाई की तैयारी है। 👉 जशपुर में धान खरीदी को लेकर उठे ये सवाल अब प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। आने वाले दिनों में जांच आगे बढ़ने के साथ और भी बड़े खुलासे होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव की कृपा से किसान को मिला पट्टा,फिर भी नहीं बेच पा रहा धान,,,सुशासन पर बड़ा सवाल

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पटवारी–पोर्टल की जुगलबंदी में पिसता किसान: बी-1 खसरा गड़बड़ी से धान अटका, मुख्यमंत्री के गृहजिले में सुशासन पर उठा बड़ा सवाल जशपुर,13/012026 – जिले के कांसाबेल तहसील का एक किसान बी वन में दर्ज आधिकारिक खसरे नम्बर के कारण न तो सरकार को धान बेच पा रहा है, न सोलर पैनल लगवा पा रहा है,न ही अपनी खेती को बढ़ाने के लिए बैंक से लोन ले पा रहा है। दरअसल,तिलंगा गांव का किसान दिलबंधु तिर्की को पिता की मृत्यु के बाद भाइयों के बीच जमीन बंटवारे के बाद पट्टा नहीं मिल रहा था।जिसको लेकर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को अपनी तकलीफ बताई। मुख्यमंत्री कार्यालय बगिया के त्वरित सक्रियता से पटवारी ने किसान का पट्टा बनाकर दे दिया। अब परेशानी तब खड़ी हो गई जब दिलबंधन तिर्की अपनी खेती का धान बेचने के लिए पंजीयन कराने सहकारी समिति गया।जहां देखा गया की पट्टे में दर्ज खसरा नंबर सरकार के भू रिकॉर्ड से बिल्कुल अलग है। दरअसल, वर्ष 2022–23 की बंटवारा सूची में खाता विभाजन पूरी तरह वैधानिक रूप से हुआ था। बंटवारे के आधार पर दर्ज खसरा नंबर हैं— 666/6, 666/9, 666/1 ठ, 666/13, 666/15, 666/20, 672/7, 666/5, 666/8, 666/11, 666/1 ण, 666/17, 666/19, 672/1उ। इन खसरा नंबरों के आधार पर बंटवारा सूची पूरी तरह सही है। यही नहीं, इसी आधार पर ऋण पुस्तिका भी विधिवत जारी की गई, जिसे 23 जून 2025 को पटवारी द्वारा प्रदान किया गया था। लेकिन समस्या तब सामने आई जब किसान ने ऑनलाइन बी-1 रिकॉर्ड निकाला। बी-1 में खसरा नंबर 666/2, 666/12, 666/16, 666/21, 666/5, 666/17 दर्ज मिले, जो न तो बंटवारा सूची से मेल खाते हैं और न ही ऋण पुस्तिका से। इसी तकनीकी विसंगति के कारण सहकारी समिति ने किसान का धान पंजीयन करने से इंकार कर दिया। नतीजतन, किसान का धान आज भी घर में रखा हुआ है। इस संबंध में जब किसान पटवारी के पास गया तो पटवारी ने साफ कह दिया कि खसरा नंबर पट्टे वाले ही पोर्टल पर चढ़ाया लेकिन नहीं लिया।अब खसरा नंबर चेंज नहीं हो सकता।पटवारी की दो टूक बातें सुनकर किसान हताश हो गया और उसका पंजीयन नहीं होने से धान घर में रखा हुआ है।   इस संबंध में जब हमने हल्का पटवारी विक्की गुप्ता से फोन पर बात की तो उन्होंने कहा कि दिलबंधन तिर्की के साथ ही उसके दो भाइयों का भी खसरा नंबर पोर्टल में बदल गया है। ऐसा कइयों का हुआ है।जो खसरा नंबर बी वन में दिख रहा है, वही मान्य है।किसान सीमांकन करा सकता है लेकिन किसान इस बात को समझ नहीं पा रहा है। वहीं पीड़ित किसान ने बताया कि पटवारी के मनमानी से तंग आकर नायब तहसीलदार कांसाबेल के न्यायालय में खसरा नंबर को ठीक करने के लिए आवेदन दिया गया है।जो बी वन में खसरा नंबर है,वह मेरे भाइयों की जमीन है।ऐसे में भविष्य में विवाद पैदा हो सकता है।किसान ने पटवारी पर तहसीलदार के आदेश नहीं मानने और किसान का धान नहीं बिकने पर हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई कराने की मांग की है।   बहरहाल,यह बड़ा सवाल है कि ऐसे में विष्णु का सुशासन कैसे सफल होगा कि एक किसान सरकारी सिस्टम के कारण अपना धान नहीं बेच पा रहा है? यह स्थापित लोकल्याणकारी राज्य में शासन की योजनाओं का लाभ हितग्राही को पहुंचा कर देना है न कि उसे दफ्तरों के चक्कर लगवाने हैं। अब देखना है कि मुख्यमंत्री के गृहजिले में ऐसे किसानों को न्याय कब तक मिलेगा या कागजी घोड़े दौड़ते रहेंगे।

भूख हाथियों को धान मंडी तक खींच लाई,छत्तीसगढ़ में 20 रातों से धान की बोरियां उठाकर जंगल ले जा रहे जंगली हाथी

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भूख हाथियों को धान मंडी तक खींच लाई,छत्तीसगढ़ में 20 रातों से धान की बोरियां उठाकर जंगल ले जा रहे जंगली हाथी सार – जैसे ही अंधेरा घिरता है, ग्रामीणों को हाथियों के आने की खबर मिल जाती है। इसके बाद धान खरीदी केंद्र के आसपास बड़ी संख्या में लोग जमा हो जाते हैं। लोग मोबाइल कैमरों से उस दृश्य को रिकॉर्ड करते हैं, जहां विशालकाय हाथी शांति से धान की बोरियां उठाकर जंगल की ओर लौट जाते हैं। रायगढ़,09 जनवरी,2025 रायगढ़ जिले में ग्राम बंगुरसिया के धान खरीदी केंद्र में इन दिनों एक अनोखा लेकिन बेहद चिंताजनक दृश्य देखने को मिल रहा है। लगातार 15 से 20 दिनों से हर रात जंगली हाथियों का झुंड धान मंडी तक पहुंच रहा है और वहां से धान की बोरियां उठाकर जंगल की ओर ले जा रहा है। यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि जंगलों में बदलती स्थिति और भूखे वन्यजीवों की मजबूरी की तस्वीर है। रात होते ही जुटती है ग्रामीणों की भीड़ जैसे ही अंधेरा घिरता है, ग्रामीणों को हाथियों के आने की खबर मिल जाती है। इसके बाद धान खरीदी केंद्र के आसपास बड़ी संख्या में लोग जमा हो जाते हैं। लोग मोबाइल कैमरों से उस दृश्य को रिकॉर्ड करते हैं, जहां विशालकाय हाथी शांति से धान की बोरियां उठाकर जंगल की ओर लौट जाते हैं। हैरानी की बात यह है कि हाथी अब तक किसी तरह की तोड़फोड़ या आक्रामकता नहीं दिखा रहे हैं। वन विभाग सतर्क, हाथी मित्र दल तैनात वन विभाग स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। हाथी मित्र दल की टीम मौके पर तैनात है, जो हाथियों की गतिविधियों की मॉनिटरिंग कर रही है और उन्हें सुरक्षित तरीके से जंगल की ओर वापस भेजने का प्रयास कर रही है। हालांकि, हाथियों का बार-बार लौट आना यह संकेत देता है कि जंगलों में उनके लिए पर्याप्त भोजन नहीं बचा है। तस्वीरें बता रही हैं जंगल की सच्चाई हाथियों के ये वीडियो और तस्वीरें साफ संदेश दे रही हैं कि जंगल भले ही हाथियों का प्राकृतिक घर हों, लेकिन वहां भोजन का संकट गहराता जा रहा है। जंगलों में घटता प्राकृतिक आहार, बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप और विकास गतिविधियां हाथियों को इंसानी इलाकों की ओर खींच रही हैं। गणेश के स्वरूप गजराज संकट में भारत में हाथी को भगवान गणेश के रूप में पूजा जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में यही पूजनीय जीव आज अपने अस्तित्व और भोजन के लिए संघर्ष करता नजर आ रहा है। मानव-हाथी द्वंद्व बढ़ने का सबसे बड़ा कारण जंगल में इंसानों की बढ़ती दखलअंदाजी और हाथियों की भोजन तलाश में बस्तियों तक पहुंच है। सिर्फ नुकसान की नहीं, चेतावनी की खबर बंगुरसिया की धान मंडी में उठती धान की बोरियां केवल सरकारी नुकसान की कहानी नहीं कहतीं, बल्कि यह भविष्य के बड़े टकराव की चेतावनी भी हैं। यदि जंगलों में हाथियों के लिए भोजन और सुरक्षित रास्ते नहीं बनाए गए, तो ऐसी घटनाएं और बढ़ सकती हैं। स्थायी समाधान जरूरी वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के लिए जंगलों में प्राकृतिक भोजन की उपलब्धता बढ़ाना,हाथी कॉरिडोर का संरक्षण,और मानव बस्तियों से हाथियों की सुरक्षित दूरी सुनिश्चित करना भी बेहद जरूरी है। यह खबर हाथियों की नहीं, हमारी जिम्मेदारी की कहानी भी है।

आरटीओ चाचा की अटैची से उड़ाए लाखों! भतीजी ने बॉयफ्रेंड संग रची चोरी की खौफनाक स्क्रिप्ट

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**आरटीओ चाचा की अटैची से उड़ाए लाखों! भतीजी ने बॉयफ्रेंड संग रची चोरी की खौफनाक स्क्रिप्ट** जशपुर,09 जनवरी 2025 कहते हैं लालच जब हदें पार कर जाए तो रिश्ते, भरोसा और इज्जत—सब कुछ बिखर जाता है। जशपुर जिले के नारायणपुर थाना क्षेत्र से सामने आई यह कहानी किसी फिल्मी क्राइम थ्रिलर से कम नहीं, जहाँ आरटीओ चाचा विजय निकुंज की अटैची में रखे लाखों रुपए और सोने की ज्वेलरी पर भतीजी की नजर पड़ी—और यहीं से शुरू हुआ अपराध का खतरनाक सफर। आईफोन की चाह… और पहली चोरी कहानी की शुरुआत होती है तब, जब कॉलेज में पढ़ने वाली भतीजी मिनल निकुंज साफ-सफाई के बहाने चाचा के कमरे में पहुंचती है। दीवान के भीतर रखी एक अटैची खोलते ही उसकी आंखें चौंधिया जाती हैं—नगद नोटों के बंडल और चमकता सोना। पहले सिर्फ आईफोन खरीदने के लिए दो लाख रुपए उठाए गए। किसी को भनक नहीं लगी… और यहीं से उसका हौसला बढ़ता गया। बॉयफ्रेंड की एंट्री, अपराध को मिली रफ्तार सोशल मीडिया से शुरू हुआ प्यार, जल्द ही लिव-इन रिलेशनशिप में बदल चुका था। बॉयफ्रेंड अनिल प्रधान को जब पैसों की भनक लगी, तो लालच ने दोनों को एक ही राह पर ला खड़ा किया—अपराध की राह। फिर एक-एक कर अटैची से पैसे निकलते रहे… पिकनिक, पार्टी, होटल, शराब—सब चलता रहा। पूरा सूटकेस ही उड़ा ले गए लेकिन असली खेल तब हुआ, जब भतीजी ने दादी से चाबी चुराई और पूरी अटैची ही बॉयफ्रेंड और उसके साथियों के हवाले कर दी। अटैची खुली—तो निकले 15 लाख नगद, सोने के बिस्किट और जेवरात। इसके बाद शुरू हुआ अय्याशी का दौर— रायपुर में विला बुक हुआ, जन्मदिन मनाया गया, लाखों उड़ाए गए और चोरी के पैसों से 25 लाख की लग्जरी कार खरीद ली गई। सोना बेचा, पैसा बांटा… लेकिन किस्मत ने नहीं दिया साथ आरोपी सोने के बिस्किट बेचने ओडिशा तक पहुंच गए। पैसा आपस में बांटा गया। मगर जल्द ही आरटीओ चाचा को चोरी की भनक लग गई और पुलिस में मामला दर्ज हो गया। इधर, चोरी के माल पर हाथ साफ करने वालों के बीच ही एक और चोरी हो गई, जब उनके किराए के मकान से बाकी सोना भी गायब हो गया। रांची के होटल में टूटा सपनों का महल पुलिस की साइबर टीम और मुखबिरों ने लोकेशन ट्रेस की। आखिरकार रांची के एक होटल में भतीजी और बॉयफ्रेंड को दबोच लिया गया। पूछताछ में पूरा काला सच सामने आया—रिश्तों से गद्दारी, लालच और अपराध की पूरी कहानी। 51 लाख की चोरी, सलाखों के पीछे पांच आरोपी अब तक इस मामले में पांच आरोपी जेल पहुंच चुके हैं।मीनल निकुंज,अनिल प्रधान ,अभिषेक इंद्रवार (28 वर्ष),लंकेश्वर बड़ाईक (35 वर्ष),अलीशा भगत (29 वर्ष)। पुलिस ने हरियर कार, नगद रकम, सोने के बिस्किट, ज्वेलरी और मोबाइल फोन बरामद कर लिए हैं। चोरी गए माल की कुल कीमत 51 लाख रुपए से अधिक आंकी गई है। सबक साफ है… यह कहानी सिर्फ एक चोरी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है— लालच जब रिश्तों पर भारी पड़ जाए, तो अंजाम सिर्फ सलाखें होती हैं।

मुख्यमंत्री के जिले में धान खरीदी पर घमासान, 9 जनवरी को 46 केंद्रों में कांग्रेस का जिला-व्यापी “धान खरीदी किसान न्याय आंदोलन”

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मुख्यमंत्री के जिले में धान खरीदी पर घमासान, 9 जनवरी को 46 केंद्रों में कांग्रेस का जिला-व्यापी “धान खरीदी किसान न्याय आंदोलन” जशपुर,08/01/2026 मुख्यमंत्री के गृह जिले जशपुर में धान खरीदी व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। नमी, कटौती, अवैध वसूली और बिचौलियों के जरिए धान खरीदी के आरोपों को लेकर जशपुर जिला कांग्रेस कमेटी ने 9 जनवरी शुक्रवार को जिले-व्यापी आंदोलन का ऐलान किया है। कांग्रेस के अनुसार जिले के सभी 46 धान खरीदी केंद्रों में एक साथ सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक धरना-प्रदर्शन किया जाएगा। यह जिला-व्यापी “धान खरीदी किसान न्याय आंदोलन” जिला कांग्रेस अध्यक्ष यूडी मिंज के नेतृत्व में होगा। कार्यक्रम के वरिष्ठ मार्गदर्शक प्रदेश महासचिव एवं जिला कांग्रेस प्रभारी भानु प्रताप सिंह होंगे, जो आंदोलन को संगठनात्मक और रणनीतिक दिशा देंगे। कांग्रेस ने आंदोलन के लिए संयोजक और सह-संयोजक भी तय किए हैं। पूर्व विधायक विनय भगत को मुख्य संयोजक बनाते हुए जशपुर जिला एवं जशपुर विधानसभा की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पूर्व जिला कांग्रेस अध्यक्ष मनोज सागर यादव को कुनकुरी विधानसभा का सह-संयोजक बनाया गया है। वहीं पत्थलगांव विधानसभा में प्रदेश महासचिव एवं जिला पंचायत सदस्य आरती सिंह को सह-संयोजक नियुक्त किया गया है। युवा कांग्रेस प्रभारी रवि शर्मा, महिला कांग्रेस प्रभारी रत्ना पैकरा, सेवा दल एवं सभी प्रकोष्ठों को भी आंदोलन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं। कांग्रेस का दावा है कि जिले के सभी 46 धान खरीदी केंद्रों में पार्टी की ओर से प्रभारी नियुक्त किए गए हैं, जो ब्लॉक अध्यक्षों और ब्लॉक प्रभारियों के साथ मिलकर आंदोलन को सफल बनाएंगे और किसानों के साथ खड़े रहेंगे। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री के जिले में ही किसानों के साथ खुलेआम लूट हो रही है। धान खरीदी केंद्रों में नमी के नाम पर अवैध वसूली की जा रही है। शासन द्वारा निर्धारित 40.680 किलोग्राम (बारदाना सहित) के मानक की अनदेखी कर अधिक तौल की जा रही है। कई केंद्रों पर बिचौलियों के माध्यम से धान खरीदी होने से किसानों को सीधे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। विरोध करने पर किसानों से दुर्व्यवहार किया जा रहा है, जबकि प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। जिला कांग्रेस कमेटी के महामंत्री महेश त्रिपाठी ने बताया कि 22 दिसंबर 2025 को इन गड़बड़ियों को लेकर प्रशासन को ज्ञापन सौंपा गया था, लेकिन अब तक किसी भी दोषी पर कार्रवाई नहीं हुई। कांग्रेस का आरोप है कि धान खरीदी में फैली अव्यवस्था और भ्रष्टाचार को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है। कांग्रेस ने मांग की है कि धान की तौल निर्धारित 40.680 किलोग्राम के मानक के अनुसार की जाए, बिचौलियों के जरिए खरीदी पर तत्काल रोक लगे और राइस मिलों को विशेष निगरानी में रखा जाए, जहां से पिक-अप के माध्यम से धान मंडी आने की शिकायतें मिल रही हैं। साथ ही किसानों से दुर्व्यवहार करने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई हो तथा नमी के नाम पर होने वाली अवैध वसूली पूरी तरह बंद की जाए। कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि 9 जनवरी का धरना-प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहेगा, लेकिन यदि किसानों की मांगों को गंभीरता से नहीं लिया गया तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। पार्टी ने कहा कि अन्नदाता के साथ हो रहे अन्याय को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और किसान न्याय की यह लड़ाई आखिरी दम तक लड़ी जाएगी।

क्रशर प्लांट के विरोध में उतरे ग्रामीण,कूटरचना कर ले ली लीज!प्रशासन ने स्थिति नियंत्रण में लिया

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जशपुर,07/01/2026 – जिले के बागबहार थाना क्षेत्र अंतर्गत कुकरभुका कोयलापहाड़ी गांव में प्रस्तावित पत्थर खदान और क्रशर प्लांट की स्थापना को लेकर मंगलवार को ग्रामीणों का जबरदस्त विरोध सामने आया है । सैकड़ों की संख्या में आदिवासी समाज के महिला-पुरुष हाथों में नारे लिखी तख्तियां लेकर सड़क पर उतर आए और क्रशर प्लांट के खिलाफ जमकर प्रदर्शन किया।   ग्रामीणों का कहना है कि  जंगल, पहाड़ और पेड़-पौधे ही उनकी जीवनरेखा आस्था और आजीविका का आधार हैं, लेकिन कथित तौर पर दस्तावेजों में कूटरचना कर लंबी अवधि की लीज लेकर यहां पत्थर खदान और क्रशर प्लांट स्थापित किया जा रहा है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि प्लांट के समीप स्थित गौठान की भूमि पर अवैध अतिक्रमण किया गया है, साथ ही डभरी को पाटने का भी काम हुआ है। साथ ही स्थानीय लोगों ने आशंका जताई कि क्रशर प्लांट से उड़ने वाली धूल से गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ेगा और पूरा गांव प्रदूषण की चपेट में आ जाएगा। ग्रामीणों का दावा है कि वर्ष 2009 में कथित रूप से फर्जी ग्रामसभा कर लगभग 10 एकड़ भूमि लीज पर ली गई, जहां अब प्लांट लगाया जा रहा है। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि जिस पहाड़ की कटाई की जा रही है, उसे आदिवासी समाज ग्राम देवता के रूप में पूजता आ रहा है। आरोप है कि प्लांट के लिए बड़े-बड़े पेड़ों की कटाई की गई और पहाड़ियों को काटकर रास्ता बनाया गया है, जिससे धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचा है। मामले को और गंभीर बनाते हुए ग्रामीणों ने प्लांट संचालक द्वारा जान से मारने की धमकी देने का आरोप भी लगाया है। इसके विरोध में ग्रामीणों ने बागबहार थाना में लिखित ज्ञापन सौंपकर कड़ी कार्रवाई की मांग की है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मौके पर पत्थलगांव एसडीएम ऋतुराज सिंह बिसेन, एसडीओपी ध्रुवेश जायसवाल, बागबहार तहसीलदार कृष्णमूर्ति दीवान, पत्थलगांव नायब तहसीलदार भीष्म पटेल सहित अन्य अधिकारी पहुंचे। अधिकारियों ने ग्रामीणों से संवाद कर उनकी समस्याएं सुनीं और पूरे मामले को उच्चाधिकारियों तक पहुंचाने का आश्वासन दिया। ग्रामीणों ने एक स्वर में मांग की है कि पत्थर खदान और क्रशर प्लांट की अनुमति तत्काल निरस्त की जाए, ताकि जंगल, पर्यावरण और आदिवासी आस्था की रक्षा हो सके ।

*मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में जशपुर में स्वास्थ्य क्रांति, दो वर्षों में बदली जिले की तस्वीर, आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की मिली बड़ी सौगात….*

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*मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में जशपुर में स्वास्थ्य क्रांति, दो वर्षों में बदली जिले की तस्वीर, आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की मिली बड़ी सौगात….* जशपुर, 19 दिसंबर 2025/मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में बीते दो वर्षों में जशपुर जिले की स्वास्थ्य सेवाओं ने ऐतिहासिक परिवर्तन का साक्षी बना है। कभी सीमित संसाधनों और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझने वाला यह जिला आज आधुनिक चिकित्सा ढांचे, सुदृढ़ आपात सेवाओं और जनकल्याणकारी योजनाओं के कारण प्रदेश के अग्रणी जिलों में अपनी मजबूत पहचान बना चुका है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार से जशपुर की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। पहले जहां दूरस्थ अंचलों के लोगों को सामान्य उपचार और सुरक्षित प्रसव के लिए भी लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी, वहीं अब जिले में ही उच्च स्तरीय उपचार की सुविधाएं उपलब्ध हो रही हैं। डायलिसिस जैसी जटिल सेवाएं, जो कभी कल्पना से परे थीं, अब जिलेवासियों के लिए सुलभ होती जा रही हैं। *दो वर्षो में मिली स्वास्थ्य के क्षेत्र में मिलीं जिले को कई ऐतिहासिक सौगातें* मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में स्वास्थ्य अधोसंरचना को मजबूत करने के लिए अनेक बड़े निर्णय लिए गए हैं। जशपुर में मेडिकल कॉलेज की स्थापना के लिए वित्त विभाग से 359 करोड़ रुपये की सैद्धांतिक स्वीकृति मिलना जिले के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। इसके साथ ही 220 बिस्तरों वाले अत्याधुनिक अस्पताल के निर्माण के लिए 32 करोड़ रुपये की मंजूरी ने जिले में उच्च स्तरीय चिकित्सा व्यवस्था की नींव रख दी है।अखिल भारतीय कल्याण आश्रम परिसर में 35 करोड़ रुपये की लागत से आधुनिक चिकित्सालय का निर्माण कार्य तीव्र गति से जारी है, जो भविष्य में जशपुर को एक प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र के रूप में स्थापित करेगा। वहीं नर्सिंग शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 8.78 करोड़ रुपये की लागत से नर्सिंग कॉलेज भवन निर्माण को स्वीकृति दी गई है, जिससे जिले को प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की स्थायी उपलब्धता सुनिश्चित होगी। *मातृ-शिशु स्वास्थ्य को मिली प्राथमिकता* मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करते हुए कुनकुरी में 50 बिस्तरों वाले मातृ-शिशु अस्पताल का निर्माण 8.77 करोड़ रुपये की लागत से प्रगति पर है। इसके अतिरिक्त जिले में 14 करोड़ रुपये की लागत से फिजियोथेरेपी महाविद्यालय तथा कुनकुरी में 2 करोड़ 62 लाख रुपये से नेचुरोपैथी भवन निर्माण की स्वीकृति ने स्वास्थ्य सेवाओं को बहुआयामी बनाया है।वहीं मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय की पहल पर जिले के फरसाबहार मुख्यालय में बहुत जल्द सत्य साईं मातृत्व शिशु चिकित्सालय की स्थापना होगी जो जिले वासियों के साथ पड़ोसी राज्यों को भी इसकी सुविधाएं मुहैया होगी। यह नागलोग क्षेत्र वासियों के लिए बड़ी सौगात है।अब स्वास्थय के क्षेत्र में लोगों के लिए यह वरदान साबित होगी। *जिले में आपातकालीन सेवाओं को मिली नई गति* मुख्यमंत्री  विष्णुदेव साय के निर्देश पर जिले में आपात चिकित्सा सेवाओं का उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। स्वास्थ्य आपात स्थितियों में त्वरित सहायता सुनिश्चित करने के लिए जिले को 10 नई 108 संजीवनी एंबुलेंस उपलब्ध कराई गई हैं। अब जिले में कुल 24 संजीवनी एक्सप्रेस एंबुलेंस जीवनरक्षक सेवा प्रदान कर रही हैं। इसके अलावा 102 महतारी एक्सप्रेस की 18 एंबुलेंस गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुंचाकर सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित कर रही हैं। प्रत्येक विकासखंड में शव वाहन की उपलब्धता ने कठिन समय में ग्रामीण परिवारों को बड़ी राहत दी है। *नए स्वास्थ्य केंद्रों की सौगात से ग्रामीण क्षेत्रों को मिला संबल* जिले के स्वास्थ्य ढांचे को जमीनी स्तर पर मजबूत करते हुए कोतबा में 4 करोड़ 37 लाख रुपये की लागत से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भवन निर्माण की स्वीकृति दी गई है। साथ ही जिले के फरसाबहार तहसील के पेटामारा (अंकिरा) एवं गांझियाडीह, दुलदुला तहसील के करडेगा एवं सीरिमकेला तथा कुनकुरी तहसील के केराडीह में 5 नए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना को मंजूरी मिली है,जो ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ जाएगी। आज जशपुर स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में एक नए युग में प्रवेश कर चुका है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में बीते दो वर्षों में किए गए ये ऐतिहासिक प्रयास जिले को एक मजबूत, सक्षम और आधुनिक स्वास्थ्य मॉडल के रूप में स्थापित कर रहे हैं। यह परिवर्तन केवल अधोसंरचना का नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ते कदमों का प्रतीक है।

तलाक-ए-हसन शरीअत की नज़र से : न्याय, जवाबदेही और नैतिक सुधार

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तलाक-ए-हसन शरीअत की नज़र से : न्याय, जवाबदेही और नैतिक सुधार निर्मल कुमार भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 26 नवम्बर 2025 को मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत तलाक-ए-हसन की प्रथा की संवैधानिकता और सामाजिक प्रभावों का गहन परीक्षण करते हुए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया । यह वह क्षण था जब देश ने एक बार फिर देखा कि कैसे अदालतें परंपरा, शरीअत और आधुनिक कानून के संगम पर खड़ी होकर समकालीन समाज के लिए संतुलित रास्ता तलाशती हैं। तलाक-ए-हसन, इस्लामी न्यायविदों के अनुसार, ऐसा तलाक है जिसमें एक निश्चित प्रतीक्षा अवधि और पुनर्मिलन का अवसर निहित रहता है। इसमें पति और पत्नी को अपने वैवाहिक संबंध पर पुनर्विचार करने का समय दिया जाता है। पहली तथा दूसरी बार उच्चारण के बाद विवाह अभी भी पुनर्स्थापित किया जा सकता है, परन्तु तीसरे उच्चारण के बाद यह तलाक अंतिम और अपरिवर्तनीय हो जाता है । इसे तलाक-ए-बिद्दत की तुलना में अधिक विचारशील, मर्यादित और गरिमापूर्ण प्रक्रिया माना गया है, क्योंकि इसमें दम्पत्ति को समय और सम्भावना दी जाती है। आज के डिजिटल समाज में, जब रिश्ते तेजी से बनते और बिखरते हैं, यह मॉडल न्यायपालिका के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करता है कि व्यक्तिगत कानून केवल धार्मिक आज्ञा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना के आधार पर भी समझे जाने चाहिए। अदालत ने स्पष्ट रूप से यह दर्शाया कि धार्मिक ढाँचे के भीतर भी शालीनता, सुनवाई और महिलाओं की सुरक्षा सर्वोपरि रहनी चाहिए। न्यायालय का हस्तक्षेप : प्रक्रिया की त्रुटियाँ और पीड़ित पक्ष की असुरक्षा सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन के मामले में हस्तक्षेप इस दृष्टि से भी आवश्यक पाया कि कई मामलों में प्रक्रिया की विसंगतियाँ पीड़ित पक्ष, विशेषतः महिलाओं, को न्याय के लिए उच्चतम अदालत तक जाने को बाध्य कर देती हैं । अदालत का कक्ष एक ऐसे मंच में बदल जाता है जहाँ पुरुष-प्रधान निर्णय-प्रक्रिया उजागर होती है और महिलाओं की आवाज़ अक्सर पीछे छूट जाती है। मुख्य याचिका में अदालत ने उस पति से कठोर प्रश्न किए जिसने बिना हस्ताक्षर वाले नोटिस के माध्यम से अपने अधिवक्ता से तलाक दिलाने की चेष्टा की। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि वैवाहिक विघटन की प्रक्रिया में प्रतिनिधि-संप्रेषण (delegation) की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे प्रक्रिया की पवित्रता और महिला की गरिमा प्रभावित होती है । न्यायमूर्ति सूर्यकांत का प्रश्न — “क्या आप अपने वकील को निर्देश दे सकते हैं, पर अपनी पत्नी का सामना करने का साहस नहीं?” शायद इस मुकदमे की सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति बनकर उभरा। अदालत ने पति को निर्देशित किया कि वह अपनी पत्नी हीना और बच्चे के साथ संवाद स्थापित करे, स्वयं निर्णय व्यक्त करे और शरीअत में अपेक्षित जिम्मेदारी निभाए । हीना ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि दस्तावेज़-अस्पष्टता के कारण उसके बेटे के स्कूल प्रवेश, पासपोर्ट नवीनीकरण और अभिरक्षा जैसे मुद्दों पर गंभीर अड़चनें उत्पन्न हुईं। अदालत ने तत्परता से राहत प्रदान की और आवश्यक अंतरिम आदेश जारी किए । शरिया और संविधान का संगम : समानता, गरिमा और स्वतंत्रता 2017 की प्रसिद्ध शायरा बानो बनाम भारत संघ मामले में तलाक-ए-बिद्दत को अवैधानिक घोषित किया गया था। इसी संदर्भ में न्यायालय ने तलाक-ए-हसन पर गहराई से विचार करते हुए कहा कि यदि तलाक को धार्मिक प्रावधानों के अनुसार क्रियान्वित करना है, तो हर चरण का शुद्ध पालन अनिवार्य है । अदालत ने यह भी कहा कि तीसरे पक्ष द्वारा तलाक भेजना न केवल असंवैधानिक है बल्कि महिला-सम्मान, एजेंसी और अधिकारिता को भी नुकसान पहुँचाता है। सभा-कक्ष में यह बहस केवल तलाक की तकनीकी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रही; यह महिलाओं की आवाज़, सुरक्षा, वित्तीय अस्तित्व और पुनर्विवाह-समान अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक भी बन गई। जब धार्मिक नियमों का गलत उपयोग होता है, तब स्त्री अक्सर सबसे बड़ा नुकसान झेलती है — आर्थिक, सामाजिक और मानसिक तीनों स्तरों पर। अदालत ने इसी बिंदु पर जोर देते हुए कहा कि इस्लामी सिद्धांत न्याय और करुणा पर आधारित हैं, और यदि प्रक्रिया महिला को असुरक्षित बनाती है, तो उसका सुधार नैतिक दायित्व है।   तलाक-ए-हसन का व्यापक प्रभाव: सुधार, पुनर्मिलन और सामाजिक संदेश अदालत ने एआईएमपीएलबी तथा जमीयत-उलमा-ए-केरल को भी इस बहस का हिस्सा बनने की अनुमति दी, ताकि इस्लामी विवाह-क़ानूनों पर समग्र दृष्टिकोण स्थापित हो सके । इस्लामी शिक्षाओं में ‘सुलह’ सर्वोत्तम मार्ग मानी जाती है, और तलाक-ए-हसन इसी सिद्धांत के निकट है। यह सुनवाई भारतीय समाज के लिए एक सबक के रूप में सामने आई कि न्याय का मक़सद दंड नहीं, बल्कि संरक्षण और संतुलन स्थापित करना है। धार्मिक विधान चाहे जितना पुराना हो, उसका उपयोग मानव गरिमा की रक्षा के अनुरूप होना चाहिए। क़ुरआन स्पष्ट कहता है कि महिला को मेहर, पोस्ट-डाइवोर्स मेंटेनेंस, और सम्पत्ति-स्वामित्व का अधिकार प्राप्त है। तलाक की प्रक्रिया में उसे किसी भी प्रकार से अपमानित या निष्कासित करना इस्लामी सिद्धांत के विरुद्ध है । हीना जैसी महिलाएँ इस न्यायिक प्रक्रिया की प्रतीक बन गई हैं, जिन्होंने अपनी आवाज़ दबने नहीं दी — और अदालत ने दिखाया कि कानून उनके साथ खड़ा है यह फैसला केवल एक मुकदमा नहीं, बल्कि भारतीय न्यायिक इतिहास में शरिया, संवैधानिक समानता और महिला-गरिमा के बीच संतुलन का उदाहरण है। तलाक-ए-हसन पर यह निर्णय बताता है कि धर्म और कानून टकराव नहीं, बल्कि संवाद और सुधार के माध्यम बन सकते हैं। यह केस हमें याद दिलाता है कि न्याय का वास्तविक उद्देश्य सबसे कमजोर को सबसे अधिक सुरक्षा देना है। (लेखक निर्मल कुमार सामाजिक एवं धार्मिक मामलों के जानकार हैं।यह उनके निजी विचार हैं।)