ईब नदी पर चल रहे सोना खदानों से नदी का पानी हुआ लाल,परम्परा का हवाला देकर नदी का जीवन खतरे में डाल रहा मानव समूह,सरकार को इसका पता नहीं!

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मेरे देश की धरती सोना उगले,उगले हीरे मोती,,,हमारे जशपुर जिले में फरसाबहार तहसील क्षेत्र की धरती सोना उगल रही है।जिसकी स्पीड बढ़ाने के लिए स्वर्ण माफिया सक्रिय हो गए हैं।बीते तीन दिनों की हमारी पड़ताल में मानव समूह ईब नदी के लिए खतरा बन चुके हैं हालांकि इस अवैध कारोबार के पीछे के चेहरे तक पहुंचने की हमारी कोशिश नाकाम रही है। जशपुर (फरसाबहार) जशपुर जिले में अवैध रेत खदानों की खबरें आम हैं, लेकिन अब जिले की जीवनदायिनी ईब नदी अवैध सोना खनन की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। फरसाबहार तहसील के धौरासांड गांव से होकर बहने वाली ईब नदी पम्पशाला, कोताईबीरा कपाट द्वार और लावाकेरा होते हुए ओडिशा राज्य में प्रवेश करती है। इसी पूरे क्षेत्र में नदी के तटों और आसपास की सरकारी व निजी जमीनों को जेसीबी और ट्रैक्टरों से खोदकर, मिट्टी के ढेर बनाए जा रहे हैं और ओपन टनल सिस्टम के जरिए मिट्टी को सीधे नदी में बहाया जा रहा है। इस प्रक्रिया में सोने के कण बेहद नाममात्र निकल रहे हैं, लेकिन उसके बदले लाखों गुना ज्यादा मिट्टी नदी को गंदला और बीमार कर रही है। धौरासांड से लेकर लावाकेरा तक ईब नदी का पानी लगातार खराब हो रहा है। हालात यह हैं कि लावाकेरा गांव के लोगों का कहना है कि अब नदी में मछली मिलना मुश्किल हो गया है, निस्तार के लिए पानी उपयोग लायक नहीं रहा और पशुओं को भी साफ पानी नसीब नहीं हो पा रहा। मीडिया को देख भागे, सवालों से बचते दिखे खननकर्ता जब इस अवैध गतिविधि की पड़ताल के लिए टीम मौके पर पहुंची, तो उससे पहले ही सोनाजोरी नाला में भी पांच अवैध सोना खदानें संचालित होती मिलीं। एक स्थान सीनाजोरी पुल के पास भोकलू राम की जमीन से जेसीबी द्वारा खोदी गई मिट्टी नदी किनारे डाली जा रही थी, जिसे बाद में उसका परिवार नदी में बहाकर स्वर्ण कण चुनता है।जिसका कहना है कि बंजर जमीन को खेती लायक बनाने के लिए जमीन की मिट्टी नदी में डालकर सोना मिल रहा है जिससे जेसीबी,ट्रैक्टर का खर्चा निकल जाएगा।इसमें गलत क्या है? मैं नहीं जानता। हालांकि, धौरासांड ईब नदी के किनारे जैसे ही मीडिया मौके पर पहुंची, अधिकांश लोग मौके से भाग खड़े हुए। मोटर पंप बंद कर दिए गए और काम रोक दिया गया। दो मजदूरों को रोककर बातचीत शुरू की गई, तब उनके बुलाने पर 5 से 10 लोग सामने आए। यह व्यवहार खुद ही इस बात की ओर इशारा करता है कि सब कुछ “परंपरा” के नाम पर इतना सरल नहीं है। आजीविका का तर्क, लेकिन नुकसान नदी का खनन में लगे लोगों का कहना है कि गांव में रोजगार का कोई साधन नहीं है। उन्होंने बताया कि पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा धौरासांड से दाईजबहार तक ईब नदी पर पुल निर्माण की घोषणा की गई थी, लेकिन आज तक काम शुरू नहीं हुआ। मजदूरी नहीं मिलने और सोना निकालने की पुरानी परंपरा का हवाला देकर वे इसे अपनी आजीविका का एकमात्र साधन बता रहे हैं। यह तर्क अपनी जगह है, लेकिन सवाल यह है कि क्या रोजगार के नाम पर पूरी नदी को बर्बाद कर देना जायज़ है? सरपंच अनजान, पंचायत से नहीं ली गई अनुमति मामले में धौरासांड की सरपंच दशमती पैंकरा से बात करने पर चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। सरपंच ने कहा कि उन्हें पंचायत क्षेत्र में वर्षों से चल रही सोने की खदानों की कोई जानकारी नहीं है। न तो पंचायत से किसी प्रकार की अनुमति ली गई है और न ही कोई टैक्स जमा किया गया है। सरपंच ने साफ कहा कि नदी में मिट्टी बहाना गलत है। वहीं, एसडीएम ओंकारेश्वर सिंह ने कहा कि वे मौका मुआयना के बाद ही इस पर कोई ठोस टिप्पणी कर पाएंगे। पर्यावरण नियम क्या कहते हैं? पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) की Sustainable Sand Mining Management Guidelines 2016 भले ही रेत और लघु खनिजों के लिए हों, लेकिन इनके मूल सिद्धांत साफ हैं— नदी के प्राकृतिक बहाव और पारिस्थितिकी तंत्र से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए नदी तटों को काटकर या मिट्टी बहाकर खनन करना पर्यावरणीय अपराध है बिना अनुमति, बिना आकलन और बिना पुनर्स्थापन योजना के कोई भी खनन अवैध माना जाता है नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) भी कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि नदी के सक्रिय प्रवाह क्षेत्र में खनन पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन है। नतीजा क्या होगा? एक तरफ स्वर्ण माफिया ग्रामीणों को सरकार के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी ओर ग्रामीण इसे अपनी मजबूरी और परंपरा बताकर जारी रखने की बात कह रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि अगर यही हाल रहा तो ईब नदी का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। अब सवाल साफ है— क्या प्रशासन समय रहते कार्रवाई कर ईब नदी को बचाएगा, या फिर सोने की कुछ चमकदार रेत के लिए जशपुर अपनी जीवनदायिनी नदी खो देगा?

अधिकार से परिणाम की ओर: मनरेगा को VBGRAM-G से बदलने का तर्क

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(अधिकार से परिणाम की ओर: मनरेगा को VBGRAM-G से बदलने का तर्क)   नीरवा मेहता के विचार   सार्वजनिक नीतियों का मूल्यांकन भावना, पुरानी यादों या राजनीतिक प्रतीकों के आधार पर नहीं, बल्कि उनके वास्तविक परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। मनरेगा को विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण अधिनियम, 2025 (VB GRAM G) से बदलने के निर्णय पर स्वाभाविक रूप से विरोध हुआ है। आलोचकों का कहना है कि यह नया कानून अधिकारों को कमजोर करता है, राज्यों पर बोझ डालता है, केंद्र के हाथों में सत्ता का केंद्रीकरण करता है और महात्मा गांधी की विरासत को मिटा देता है। लेकिन ये आपत्तियाँ नीति के वास्तविक स्वरूप से अधिक राजनीतिक मानसिकता को दर्शाती हैं।   VB GRAM G पर सबसे बड़ा आरोप यह है कि यह अधिकार आधारित ढाँचे को तोड़ देता है। यह तर्क इस गलत मान्यता पर आधारित है कि कानूनी अधिकार अपने आप सशक्तिकरण में बदल जाता है। मनरेगा के लगभग दो दशकों के अनुभव ने इस सोच की सीमाओं को उजागर कर दिया है। मजदूरी में लगातार देरी, काम की अधूरी मांग, खराब गुणवत्ता की परिसंपत्तियाँ और असमान क्रियान्वयन ने धीरे-धीरे उस अधिकार को खोखला कर दिया, जिसे न्यायसंगत माना गया था। जो अधिकार समय पर, व्यापक स्तर पर और निरंतर रूप से लागू ही न हो सके, वह व्यवहार में अधिकार नहीं रह जाता। VB GRAM G राज्य की रोज़गार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी खत्म नहीं करता, बल्कि उसे नए तरीके से संरचित करता है—समयसीमा तय करके, परिणामों से वित्त पोषण जोड़कर और जवाबदेही को संस्थागत रूप देकर। यह अधिकारों का कमजोर होना नहीं, बल्कि उनकी व्यावहारिक सुधार प्रक्रिया है।   इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह नया कानून भारत की विकास सोच में एक आवश्यक बदलाव को दर्शाता है। मनरेगा को तीव्र ग्रामीण संकट के दौर में एक राहत योजना के रूप में तैयार किया गया था। लेकिन यदि संकट आधारित रोज़गार को स्थायी नीति बना दिया जाए, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ठहराव को सामान्य बना देता है। VB GRAM G अल्पकालिक रोज़गार को आजीविका निर्माण, कौशल विकास और उत्पादक परिसंपत्तियों से जोड़ता है। केवल काम के दिनों की गिनती से हटकर स्थायी आय और आजीविका पर जोर देना इस सच्चाई को स्वीकार करता है कि गरिमा केवल काम मिलने से नहीं, बल्कि आय की स्थिरता, उत्पादकता और सामाजिक उन्नति से आती है। जो कल्याणकारी व्यवस्था खुद को समय के साथ नहीं बदलती, वह गरीबी खत्म करने के बजाय निर्भरता को बढ़ावा देती है।   राज्यों पर बढ़ते वित्तीय बोझ की चिंता भी गहराई से देखने पर टिकती नहीं। पुराने ढाँचे में राज्यों को केंद्रीय फंड में देरी, अनियोजित देनदारियों और लागत साझा करने के विवादों का सामना करना पड़ता था। VB GRAM G स्पष्ट वित्तीय भूमिकाएँ, मध्यम अवधि की योजना और परिणाम आधारित वित्तपोषण लाता है। वास्तविक वित्तीय संघवाद की नींव ही पूर्वानुमेयता है। इससे राज्यों को संकट प्रबंधन के बजाय योजनाबद्ध ढंग से काम करने का अवसर मिलता है, जिससे उनकी प्रशासनिक स्वायत्तता मजबूत होती है।   इसी तरह, अत्यधिक केंद्रीकरण का आरोप राष्ट्रीय मानकों और सूक्ष्म प्रबंधन के बीच के अंतर को समझने में चूक करता है। इतने बड़े पैमाने की योजना में पारदर्शिता, पात्रता और निगरानी के लिए एकसमान मानक जरूरी हैं। स्थानीय संस्थाएँ अब भी कार्यों की पहचान करेंगी, परियोजनाएँ लागू करेंगी और क्रियान्वयन की निगरानी करेंगी। फर्क सिर्फ इतना है कि अब प्रदर्शन और जवाबदेही पर जोर दिया गया है। इतिहास बताता है कि बिना निगरानी के विकेंद्रीकरण का लाभ अक्सर श्रमिकों से ज्यादा बिचौलियों को मिला है। VB GRAM G इसी संरचनात्मक दोष को ठीक करने की कोशिश करता है।   सबसे भावनात्मक आलोचना महात्मा गांधी का नाम हटाने को लेकर है। यह तर्क नीति की वास्तविक प्रभावशीलता के बजाय प्रतीकवाद को प्राथमिकता देता है। गांधी की आर्थिक सोच उत्पादक श्रम, आत्मनिर्भरता, विकेंद्रीकृत विकास और नैतिक जिम्मेदारी पर आधारित थी। उनके नाम को बनाए रखते हुए प्रणालीगत अक्षमताओं को स्वीकार करना उनकी विरासत का सम्मान नहीं है। इसके विपरीत, टिकाऊ सामुदायिक परिसंपत्तियों, स्थानीय उद्यम और आजीविका की स्थिरता पर आधारित कार्यक्रम गांधीवादी सिद्धांतों के कहीं अधिक अनुरूप है, बजाय इसके कि केवल जीविका-भर काम को अंतिम लक्ष्य मान लिया जाए।   हर सुधार का विरोध होता है, खासकर जब वह जमी-जमाई राजनीतिक धारणाओं को चुनौती देता है। लेकिन सामाजिक नीति को समय में जकड़कर नहीं रखा जा सकता। भारत की जनसंख्या संबंधी दबाव, वित्तीय सीमाएँ और विकास की आकांक्षाएँ ऐसे साधनों की मांग करती हैं जो मापनीय और ठोस परिणाम दें। VB GRAM G ग्रामीण रोज़गार नीति को इनपुट आधारित अधिकार से हटाकर परिणाम आधारित गारंटी की ओर ले जाने का एक सचेत प्रयास है। इस बदलाव के लिए सतर्कता, निरंतर सुधार और अनुशासित क्रियान्वयन जरूरी होगा। लेकिन सुधार का विरोध करना उससे भी बड़ी विफलता होगी।   असल विकल्प करुणा और दक्षता या अधिकार और सुधार के बीच नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या हम ऐसी कल्याणकारी व्यवस्था चाहते हैं जो बदलती वास्तविकताओं के साथ खुद को ढाले, या फिर ऐसी जो पुरानी संरचनाओं से चिपकी रहे, भले ही उनकी सीमाएँ उजागर हो चुकी हों। VB GRAM G सोच के इसी विकास का संकेत है। इसका लक्ष्य सार्वजनिक खर्च को टिकाऊ ग्रामीण समृद्धि में बदलना है। राष्ट्रीय बहस की दिशा राजनीतिक नॉस्टैल्जिया नहीं, बल्कि यही लक्ष्य तय करना चाहिए। लेखक के बारे में: निरवा मेहता एक राजनीतिक विश्लेषक और स्तंभकार हैं, जो सार्वजनिक नीति, शासन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर लिखती हैं। उनका लेखन सत्ता संरचनाओं, राज्य के व्यवहार और भारत तथा वैश्विक संदर्भ में नीतिगत फैसलों के दीर्घकालिक प्रभावों पर केंद्रित रहता है।

छत्तीसगढ़ के साहित्य-सूर्य हुए अस्त: हिंदी के महान साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल का निधन

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छत्तीसगढ़ के साहित्य-सूर्य हुए अस्त: हिंदी के महान साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल का निधन “लिखना मेरे लिए सांस लेने जैसा है”—यह कहने वाले छत्तीसगढ़ के धरोहर, हिंदी साहित्य के अप्रतिम साधक और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल ने आज दुनिया को अलविदा कह दिया। वे 89 वर्ष के थे। उनके निधन से न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे हिंदी साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। विनोद कुमार शुक्ल छत्तीसगढ़ के पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार थे। उनकी लेखनी में साधारण जीवन की असाधारण गहराई, मानवीय संवेदना और मौन की भाषा बोलती थी। वे शब्दों के शोर में नहीं, बल्कि सादगी, ठहराव और संवेदनशीलता में विश्वास करने वाले रचनाकार थे। उनका जन्म 1 जनवरी 1937 को मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ़) में हुआ था। उन्होंने कविता, उपन्यास और निबंध—तीनों विधाओं में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘नौकर की कमीज’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’, ‘खिलेगा तो देखेंगे’ जैसी रचनाएं शामिल हैं, जिन्होंने हिंदी साहित्य को नई दृष्टि और नई भाषा दी। उनकी रचनाओं पर फिल्में और रंगमंचीय प्रस्तुतियां भी हुईं। विनोद कुमार शुक्ल की लेखनी किसी आंदोलन की घोषणा नहीं करती थी, बल्कि चुपचाप मनुष्य के भीतर उतर जाती थी। वे उन दुर्लभ साहित्यकारों में थे, जिन्होंने यह सिद्ध किया कि साहित्य ऊंची आवाज़ नहीं, बल्कि गहरी अनुभूति से जीवित रहता है। उनके निधन को साहित्य जगत “साहित्य के सूर्य के अस्त” के रूप में देख रहा है। उनकी कमी शब्दों से नहीं, बल्कि उस खालीपन से महसूस होगी, जिसे केवल उनकी सादगी और मौन भर सकता था। आज हिंदी साहित्य ने अपना एक मौन साधक, छत्तीसगढ़ ने अपनी एक अमूल्य धरोहर और पाठकों ने अपने मन का एक सच्चा साथी खो दिया है। विनोद कुमार शुक्ल भले ही हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी रचनाएं सांस की तरह आने वाली पीढ़ियों के साथ जीवित रहेंगी।

संपादकीय : छत्तीसगढ़ में गौ-तस्करी : संरचनात्मक विफलता और शासन की नैतिक जिम्मेदारी

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संपादकीय : छत्तीसगढ़ में गौ-तस्करी : संरचनात्मक विफलता और शासन की नैतिक जिम्मेदारी संतोष चौधरी छत्तीसगढ़ में गौ-तस्करी की बढ़ती घटनाएँ अब केवल आपराधिक गतिविधि भर नहीं रहीं, बल्कि वे राज्य की पशु-कल्याण नीति, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और शासन-प्रणाली की गंभीर संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर कर रही हैं। कुनकुरी में पकड़ी गई हालिया घटना—जिसमें पिकअप वाहन में क्रूरतापूर्वक लदे मवेशियों में से एक बैल और दो गायों की दम घुटने से मृत्यु हो गई—इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि गौ-संरक्षण के दावे और जमीनी वास्तविकता के बीच गहरी खाई मौजूद है। यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक है कि जब सरकार गौ-तस्करी के विरुद्ध “जीरो टॉलरेंस” की नीति का दावा करती है, तब बिलासपुर, कोरबा, जांजगीर जैसे कृषि प्रधान जिलों से बड़ी संख्या में मवेशी बिना किसी प्रभावी रोक-टोक के अंतरराज्यीय मार्गों तक कैसे पहुँच रहे हैं? स्पष्ट है कि यह समस्या केवल तस्करों की चतुराई का परिणाम नहीं, बल्कि निगरानी तंत्र की सीमाओं और प्रशासनिक समन्वय की कमी का द्योतक है। गौ-तस्करी का मूल कारण : आवारा मवेशी और अपर्याप्त गौशालाएँ छत्तीसगढ़ में आवारा मवेशियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। खेतों में फसल नुकसान और मवेशियों की बढ़ती तादाद से किसान विवश होकर मवेशियों को खुला छोड़ देते हैं। राज्य में उपलब्ध गौशालाओं की संख्या, उनकी क्षमता और संसाधन इस बढ़ते दबाव को संभालने में पूर्णतः अक्षम प्रतीत होते हैं। अनेक गौशालाएँ मात्र औपचारिकता बनकर रह गई हैं—जहाँ न पर्याप्त स्थान है, न चारा, न पशु चिकित्सा सुविधाएँ। इसी शून्य का लाभ गौ-तस्कर उठाते हैं। आवारा मवेशी उनके लिए कच्चा माल बन जाते हैं। नतीजतन, तस्करी केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा न रहकर नीतिगत विफलता का रूप ले लेती है। कानून प्रवर्तन की सीमाएँ और जोखिम कुनकुरी की घटना में पुलिस की तत्परता सराहनीय है, किंतु यह भी ध्यान देने योग्य है कि कार्रवाई के दौरान पुलिसकर्मी घायल हुए और तस्कर अंधेरे का लाभ उठाकर फरार हो गए। यह दर्शाता है कि गौ-तस्करी जैसे संगठित अपराधों से निपटने के लिए वर्तमान व्यवस्था न तो पर्याप्त संसाधनों से लैस है और न ही तकनीकी रूप से सुदृढ़। शासन की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी भारतीय संविधान और पशु-कल्याण से जुड़े अधिनियम राज्य को यह दायित्व सौंपते हैं कि वह मूक पशुओं के संरक्षण और मानवीय व्यवहार को सुनिश्चित करे। गौमाता को सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से सम्मान देने का दावा तभी सार्थक होगा, जब उसे सड़कों पर बेसहारा भटकने और तस्करों के वाहनों में दम तोड़ने से बचाया जा सके। आवश्यक नीतिगत हस्तक्षेप समस्या का समाधान प्रतीकात्मक अभियानों से नहीं, बल्कि ठोस और दीर्घकालिक रणनीति से संभव है। इसके लिए— प्रत्येक विकासखंड में पर्याप्त क्षमता वाली, सुव्यवस्थित गौशालाओं की स्थापना आवारा मवेशियों का पंजीकरण और ट्रैकिंग प्रणाली अंतरराज्यीय सीमाओं पर स्थायी, तकनीक-आधारित निगरानी और गौ-तस्करी में संलिप्त पूरे नेटवर्क पर कठोर, उदाहरणात्मक कार्रवाई अनिवार्य है।   कुनकुरी की घटना एक चेतावनी है—यदि अब भी गौ-तस्करी को केवल पुलिसिया समस्या मानकर टाल दिया गया, तो यह संकट और गहराएगा। तीन गायों की मौत केवल एक समाचार नहीं, बल्कि यह उस व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है जो गौ-संरक्षण की बात तो करती है, पर उसके लिए आवश्यक ढाँचा खड़ा करने में अब तक विफल रही है। शासन को आत्ममंथन करना होगा, क्योंकि गौमाता की दुर्दशा अंततः राज्य की प्रशासनिक और नैतिक साख से जुड़ा प्रश्न है।

तलाक-ए-हसन शरीअत की नज़र से : न्याय, जवाबदेही और नैतिक सुधार

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तलाक-ए-हसन शरीअत की नज़र से : न्याय, जवाबदेही और नैतिक सुधार निर्मल कुमार भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 26 नवम्बर 2025 को मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत तलाक-ए-हसन की प्रथा की संवैधानिकता और सामाजिक प्रभावों का गहन परीक्षण करते हुए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया । यह वह क्षण था जब देश ने एक बार फिर देखा कि कैसे अदालतें परंपरा, शरीअत और आधुनिक कानून के संगम पर खड़ी होकर समकालीन समाज के लिए संतुलित रास्ता तलाशती हैं। तलाक-ए-हसन, इस्लामी न्यायविदों के अनुसार, ऐसा तलाक है जिसमें एक निश्चित प्रतीक्षा अवधि और पुनर्मिलन का अवसर निहित रहता है। इसमें पति और पत्नी को अपने वैवाहिक संबंध पर पुनर्विचार करने का समय दिया जाता है। पहली तथा दूसरी बार उच्चारण के बाद विवाह अभी भी पुनर्स्थापित किया जा सकता है, परन्तु तीसरे उच्चारण के बाद यह तलाक अंतिम और अपरिवर्तनीय हो जाता है । इसे तलाक-ए-बिद्दत की तुलना में अधिक विचारशील, मर्यादित और गरिमापूर्ण प्रक्रिया माना गया है, क्योंकि इसमें दम्पत्ति को समय और सम्भावना दी जाती है। आज के डिजिटल समाज में, जब रिश्ते तेजी से बनते और बिखरते हैं, यह मॉडल न्यायपालिका के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करता है कि व्यक्तिगत कानून केवल धार्मिक आज्ञा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना के आधार पर भी समझे जाने चाहिए। अदालत ने स्पष्ट रूप से यह दर्शाया कि धार्मिक ढाँचे के भीतर भी शालीनता, सुनवाई और महिलाओं की सुरक्षा सर्वोपरि रहनी चाहिए। न्यायालय का हस्तक्षेप : प्रक्रिया की त्रुटियाँ और पीड़ित पक्ष की असुरक्षा सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन के मामले में हस्तक्षेप इस दृष्टि से भी आवश्यक पाया कि कई मामलों में प्रक्रिया की विसंगतियाँ पीड़ित पक्ष, विशेषतः महिलाओं, को न्याय के लिए उच्चतम अदालत तक जाने को बाध्य कर देती हैं । अदालत का कक्ष एक ऐसे मंच में बदल जाता है जहाँ पुरुष-प्रधान निर्णय-प्रक्रिया उजागर होती है और महिलाओं की आवाज़ अक्सर पीछे छूट जाती है। मुख्य याचिका में अदालत ने उस पति से कठोर प्रश्न किए जिसने बिना हस्ताक्षर वाले नोटिस के माध्यम से अपने अधिवक्ता से तलाक दिलाने की चेष्टा की। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि वैवाहिक विघटन की प्रक्रिया में प्रतिनिधि-संप्रेषण (delegation) की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे प्रक्रिया की पवित्रता और महिला की गरिमा प्रभावित होती है । न्यायमूर्ति सूर्यकांत का प्रश्न — “क्या आप अपने वकील को निर्देश दे सकते हैं, पर अपनी पत्नी का सामना करने का साहस नहीं?” शायद इस मुकदमे की सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति बनकर उभरा। अदालत ने पति को निर्देशित किया कि वह अपनी पत्नी हीना और बच्चे के साथ संवाद स्थापित करे, स्वयं निर्णय व्यक्त करे और शरीअत में अपेक्षित जिम्मेदारी निभाए । हीना ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि दस्तावेज़-अस्पष्टता के कारण उसके बेटे के स्कूल प्रवेश, पासपोर्ट नवीनीकरण और अभिरक्षा जैसे मुद्दों पर गंभीर अड़चनें उत्पन्न हुईं। अदालत ने तत्परता से राहत प्रदान की और आवश्यक अंतरिम आदेश जारी किए । शरिया और संविधान का संगम : समानता, गरिमा और स्वतंत्रता 2017 की प्रसिद्ध शायरा बानो बनाम भारत संघ मामले में तलाक-ए-बिद्दत को अवैधानिक घोषित किया गया था। इसी संदर्भ में न्यायालय ने तलाक-ए-हसन पर गहराई से विचार करते हुए कहा कि यदि तलाक को धार्मिक प्रावधानों के अनुसार क्रियान्वित करना है, तो हर चरण का शुद्ध पालन अनिवार्य है । अदालत ने यह भी कहा कि तीसरे पक्ष द्वारा तलाक भेजना न केवल असंवैधानिक है बल्कि महिला-सम्मान, एजेंसी और अधिकारिता को भी नुकसान पहुँचाता है। सभा-कक्ष में यह बहस केवल तलाक की तकनीकी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रही; यह महिलाओं की आवाज़, सुरक्षा, वित्तीय अस्तित्व और पुनर्विवाह-समान अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक भी बन गई। जब धार्मिक नियमों का गलत उपयोग होता है, तब स्त्री अक्सर सबसे बड़ा नुकसान झेलती है — आर्थिक, सामाजिक और मानसिक तीनों स्तरों पर। अदालत ने इसी बिंदु पर जोर देते हुए कहा कि इस्लामी सिद्धांत न्याय और करुणा पर आधारित हैं, और यदि प्रक्रिया महिला को असुरक्षित बनाती है, तो उसका सुधार नैतिक दायित्व है।   तलाक-ए-हसन का व्यापक प्रभाव: सुधार, पुनर्मिलन और सामाजिक संदेश अदालत ने एआईएमपीएलबी तथा जमीयत-उलमा-ए-केरल को भी इस बहस का हिस्सा बनने की अनुमति दी, ताकि इस्लामी विवाह-क़ानूनों पर समग्र दृष्टिकोण स्थापित हो सके । इस्लामी शिक्षाओं में ‘सुलह’ सर्वोत्तम मार्ग मानी जाती है, और तलाक-ए-हसन इसी सिद्धांत के निकट है। यह सुनवाई भारतीय समाज के लिए एक सबक के रूप में सामने आई कि न्याय का मक़सद दंड नहीं, बल्कि संरक्षण और संतुलन स्थापित करना है। धार्मिक विधान चाहे जितना पुराना हो, उसका उपयोग मानव गरिमा की रक्षा के अनुरूप होना चाहिए। क़ुरआन स्पष्ट कहता है कि महिला को मेहर, पोस्ट-डाइवोर्स मेंटेनेंस, और सम्पत्ति-स्वामित्व का अधिकार प्राप्त है। तलाक की प्रक्रिया में उसे किसी भी प्रकार से अपमानित या निष्कासित करना इस्लामी सिद्धांत के विरुद्ध है । हीना जैसी महिलाएँ इस न्यायिक प्रक्रिया की प्रतीक बन गई हैं, जिन्होंने अपनी आवाज़ दबने नहीं दी — और अदालत ने दिखाया कि कानून उनके साथ खड़ा है यह फैसला केवल एक मुकदमा नहीं, बल्कि भारतीय न्यायिक इतिहास में शरिया, संवैधानिक समानता और महिला-गरिमा के बीच संतुलन का उदाहरण है। तलाक-ए-हसन पर यह निर्णय बताता है कि धर्म और कानून टकराव नहीं, बल्कि संवाद और सुधार के माध्यम बन सकते हैं। यह केस हमें याद दिलाता है कि न्याय का वास्तविक उद्देश्य सबसे कमजोर को सबसे अधिक सुरक्षा देना है। (लेखक निर्मल कुमार सामाजिक एवं धार्मिक मामलों के जानकार हैं।यह उनके निजी विचार हैं।)

सीरत-उन-नबी: आधुनिक ज़िंदगी में भी एक मार्गदर्शन — मेरी दृष्टि से विस्तृत विश्लेषण

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सीरत-उन-नबी: आधुनिक ज़िंदगी में भी एक मार्गदर्शन — मेरी दृष्टि से विस्तृत विश्लेषण निर्मल कुमार   जब मैं पैग़म्बर मुहम्मद के जीवन पर सोचता हूँ, तो मुझे यह महसूस होता है कि उनकी ज़िंदगी इतिहास की कोई पुरानी किताब नहीं, बल्कि आज भी हमारा मार्गदर्शक है। उनकी बोली, उनके विचार, उनके व्यक्तिगत और सामाजिक रिश्ते — सब कुछ ऐसे हैं कि अगर हम उन्हें समझें, तो हमारी जिन्दगी बदल सकती है। उन्होंने दिखाया कि इंसानियत, दया, न्याय, सहानुभूति, नैतिकता — ये सिर्फ अच्छे विचार नहीं, बल्कि व्यवहार का हिस्सा हैं। उनके जीवन की शुरुआत भी बहुत सहज और कई मायनों में कठिन थी। वे एक सामान्य परिवार में पैदा हुए, पिता पहले ही गुज़र चुके थे, और बचपन में ही मां का साया उठ गया। फिर भी उन्होंने कभी हालात के आगे हथियार नहीं डाले। उनका जीवन हमें यह समझाता है कि कठिनाई किसी को बड़ा बनने से रोकती नहीं, बल्कि बड़ा बनाती है, अगर इंसान टूटने के बजाय सीखने का रास्ता चुने।   उनकी ईमानदारी इतनी मशहूर थी कि लोग उन्हें अल-अमीन कहते थे। यह विश्वास अचानक नहीं मिला, बल्कि उनके काम, उनके व्यवहार और उनकी सत्यनिष्ठा ने समाज के दिल में जगह बनाई। किसी भी रिश्ते की जड़ भरोसा होता है, और यह भरोसा उन्होंने शब्दों से नहीं बल्कि कर्मों से कमाया। यही बात आज के समय पर भी लागू होती है — कि पहचान और सम्मान दिखावे या उपाधि से नहीं, बल्कि सिद्धांतों और व्यवहार से बनते हैं।   फिर जब उन्हें पैग़म्बरी मिली, उन्होंने सिर्फ़ इबादत का पैग़ाम नहीं दिया, बल्कि इंसानी जीवन का संतुलित मॉडल पेश किया। उन्होंने बताया कि मजबूत विश्वास वही है जो व्यवहार में दिखे, जो घर में भी उतना ही चमके जितना मस्जिद में, जो बाज़ार के सौदे में भी उतना ही स्पष्ट हो जितना सजदे में। उनकी शिक्षा इबादत के साथ ईमानदारी, रिश्तों के साथ संतुलन, शक्ति के साथ करुणा और न्याय के साथ विनम्रता जोड़ती थी।   उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि जो लोग उनके विरोधी थे वे भी उनकी न्यायप्रियता की गवाही देते थे। उन्होंने कभी नफरत को भाषा नहीं बनने दिया। उन्होंने दिखाया कि बदले की जगह माफी बड़ा रास्ता खोलती है। मक्का की फतह इसका सबसे भव्य उदाहरण है। उन लोगों पर पूरा अधिकार था जिन्होंने उन्हें सताया, अपमानित किया, पत्थर बरसाए, पर उन्होंने तलवार नहीं, क्षमा चुनी। यह केवल इतिहास की घटना नहीं, बल्कि आज के विश्व नेतृत्व के लिए चरित्र की परिभाषा है। अगर राष्ट्र और समाज आज भी उससे सीखें, तो युद्ध की जगह संवाद, टकराव की जगह समाधान और विभाजन की जगह सह-जीवन संभव हो सकेगा।   उनके जीवन में महिलाओं की स्थिति को लेकर भी बड़ा संदेश मिलता है। उन्होंने बेटी का सम्मान किया, पत्नी से सलाह ली, महिलाओं के अधिकार घोषित किए और उन्हें शिक्षा, सामाजिक सहभागिता और आर्थिक भागीदारी का दर्जा दिया। आज जब हम “जेंडर इक्विटी” की बात आधुनिक विचार के रूप में करते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि यह सच एक ऐतिहासिक नमूने के रूप में पहले ही दिया जा चुका है। अगर समाज उस सीख को फिर से पहचान ले, तो घरेलू हिंसा, असमानता और पक्षपात जैसी समस्याएँ काफी कम हो सकती हैं। बराबरी सिर्फ़ कानून नहीं, व्यवहार से आती है — और यही सीरत का सार है।   अब जब हम आधुनिक समाज पर नजर डालते हैं, तो रिश्तों में दरारें, सामाजिक अविश्वास, राजनीतिक ध्रुवीकरण और आध्यात्मिक खालीपन नजर आता है। सीरत-उन-नबी हमें यह एहसास कराती है कि समाधान नए सिद्धांत खोजने में नहीं, बल्कि पुराने सिद्धांतों को जीने में है। मनुष्य तभी संतुलित जीवन जी सकता है जब उसकी नैतिकता और ज़िम्मेदारी उसके विश्वास के बराबर मजबूत हों। सिर्फ़ धार्मिक पहचान काफी नहीं, धार्मिक चरित्र जरूरी है। बरकत वहीं होती है जहाँ धर्म सिद्धांत नहीं, व्यवहार बनकर उतरे।   अगर परिवारों में मामूली बातों पर नाराज़गी टूटने की बजाए बातचीत और क्षमा के रूप में बदल जाए, अगर समाज में कटुता की जगह सम्मान और सुनने की संस्कृति विकसित हो, अगर युवा यह समझें कि ईमानदारी सफलता का दुश्मन नहीं बल्कि नींव है, और अगर राष्ट्र यह याद रखे कि शक्ति शासन का साधन है शासन का चरित्र नहीं — तो दुनिया बदली जा सकती है। और इसका खाका पहले से मौजूद है, बस हमें उसे अपनाना है।   सीरत केवल एक शरीयत या नियम-पुस्तिका नहीं, बल्कि जीवन-कला है। यह सिखाती है कि धार्मिक व्यक्ति वह नहीं जो सिर्फ़ नमाज़ पढ़े या रोज़े रखे, बल्कि वह जो सच बोले, वादा निभाए, भरोसा दे सके, मदद करे, क्षमा करे, ईर्ष्या से बचे, और अपने से कमजोर को अधिकार दे। यह जीवन का वह रूप है, जिसे अपनाकर मनुष्य अपने आप में भी शांति पाता है और समाज को भी देता है। यही चरित्र यदि आज जनमानस में फिर जीवित हो जाए, तो धार्मिक संघर्ष, सामाजिक टूटी हुई संरचनाएँ और नैतिक अवसाद स्वभाविक रूप से कम हो जाएँ।   मेरी दृष्टि में यह विषय सिर्फ़ मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए उपयोगी है। क्योंकि इंसाफ़, सद्भाव, विनम्रता, दया, वचन-पालन, पड़ोस का हक़, स्त्री-पुरुष सम्मान, आर्थिक ईमानदारी — ये किसी एक समाज की जरूरत नहीं, पूरे विश्व की है। नबी ﷺ ने अपने जीवन से सिखाया कि सच्ची क्रांति तलवार से नहीं, चरित्र से आती है। आज भी जितनी हमें प्रौद्योगिकी, विकास और बुद्धि की आवश्यकता है, उतनी ही हमें इंसानियत, धैर्य, संवाद और संवेदनशीलता की भी है।   इसलिए मैं चाहता हूँ कि सीरत पढ़ी भी जाए और जी भी जाए। यह सिर्फ़ शब्द नहीं, आचरण बने। यह सिर्फ़ किताब नहीं, संस्कृति बने। यह सिर्फ़ आदर्श नहीं, अभ्यास बने। उसी दिन समाज शांत होगा, परिवार मजबूत होंगे, मनुष्य संतुलित होगा और धर्म सुंदरतम रूप में सामने आएगा — व्यवहार में, चरित्र में, और इंसानियत में। नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं

आलेख : विविधता में एकता – राष्ट्र निर्माण में संस्कृति, कला और परंपराओं की भूमिका

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आलेख : विविधता में एकता – राष्ट्र निर्माण में संस्कृति, कला और परंपराओं की भूमिका भारत की एकता केवल संविधान या कानूनों से संचालित नहीं होती, बल्कि यह हमारे जीवन के हर पहलू में रची-बसी है। यह एकता हमारे त्योहारों, लोककला, संगीत, भाषा, परिधान, भोजन और परंपराओं में सांस लेती है। भारत की सच्ची ताकत उसकी विविधता में छिपी है—जहाँ अलग-अलग धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ मिलकर एक ऐसा रंगीन मोज़ेक बनाती हैं जो दुनिया में अद्वितीय है। राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर हमें यह स्मरण करना चाहिए कि हमारी सांस्कृतिक विविधता केवल पहचान नहीं, बल्कि हमारे राष्ट्र की आत्मा है। कश्मीर की सूफियाना कव्वालियों से लेकर कन्याकुमारी के भरतनाट्यम तक, राजस्थान के लोकगीतों से लेकर नागालैंड के जनजातीय नृत्यों तक, भारत का हर क्षेत्र अपनी विशिष्टता में चमकता है। यह विविधता विभाजन नहीं लाती, बल्कि एक-दूसरे के अनुभवों और भावनाओं को जोड़ती है। जब हम किसी और क्षेत्र के त्योहार में शामिल होते हैं या किसी अन्य भाषा का गीत गुनगुनाते हैं, तब हम अपने राष्ट्र की एकता को और गहराई से महसूस करते हैं। मेले, उत्सव और स्थानीय परंपराएँ केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि वे आपसी मेल-जोल और सांस्कृतिक संवाद के पुल हैं। भारतीय समाज में महिलाओं की भूमिका इस सांस्कृतिक निरंतरता का केंद्र बिंदु है। वे घर से लेकर समाज तक परंपराओं की संवाहक और एकता की प्रतीक हैं। किसी भी त्योहार की तैयारी, लोककला का संरक्षण, पारिवारिक रस्मों का निर्वाह या समुदायिक समन्वय—हर स्तर पर महिलाओं का योगदान अद्वितीय है। वे लोककथाएँ सुनाकर, लोकगीत सिखाकर और बच्चों में परंपरागत मूल्यों को रोपित करके न केवल संस्कृति को जीवित रखती हैं, बल्कि सामाजिक एकजुटता को भी सशक्त बनाती हैं। वास्तव में, महिलाएँ उस अदृश्य शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं जो समाज को भीतर से जोड़ती है। भारत की कला और संगीत केवल सौंदर्य की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के उपकरण हैं। शास्त्रीय नृत्य की लय, लोकगीतों की आत्मा, नाटकों का संदेश और चित्रकला की भावनाएँ – सब मिलकर नागरिकों में साझा चेतना का निर्माण करती हैं। जब कोई बच्चा स्कूल में भांगड़ा और भरतनाट्यम दोनों सीखता है, या जब किसी कार्यक्रम में कथक और ओडिसी साथ प्रस्तुत होते हैं, तब यह केवल कला नहीं होती – यह एकता की भाषा होती है। यही कारण है कि एकता दिवस जैसे अवसरों पर बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ हमारे राष्ट्रीय चरित्र की जीवंत झलक पेश करती हैं। त्योहार भारत के समाज को जोड़ने वाली सबसे बड़ी शक्ति हैं। दीवाली की रोशनी, ईद का सेवरीं, पोंगल का भात या बैसाखी की फसल – हर त्योहार अपने भीतर साझेदारी और पारस्परिक सम्मान का संदेश रखता है। इन अवसरों पर जब समाज के लोग साथ मिलकर उत्सव मनाते हैं, तो धर्म, भाषा और क्षेत्र की दीवारें स्वतः गिर जाती हैं। ऐसे साझा अनुभव सामाजिक जिम्मेदारी, सहिष्णुता और सहयोग की भावना को जन्म देते हैं। यही भावना भारत को एक ऐसा राष्ट्र बनाती है जहाँ भिन्नताएँ टकराती नहीं, बल्कि मिलकर नई पहचान बनाती हैं। संस्कृति की यह एकता केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि संस्थागत भी है। जहाँ संस्कृति लोगों को जोड़ती है, वहीं शासन और नीतियाँ उस एकता की रक्षा करती हैं। प्रशासनिक संस्थाएँ, कानून व्यवस्था और नीतिगत ढाँचे यह सुनिश्चित करते हैं कि हर नागरिक को अपनी संस्कृति और परंपरा को सुरक्षित रखने की स्वतंत्रता मिले। जब सरकार कला, संगीत, नाटक, लोककला और सांस्कृतिक त्योहारों को प्रोत्साहन देती है, तो वह न केवल कलाकारों का सम्मान करती है, बल्कि समाज की एकजुटता को भी सशक्त बनाती है। भारत की एकता का ताना-बाना कानून और जीवन दोनों के धागों से बुना गया है। संस्कृति, कला, संगीत और विविधता वह सामाजिक गोंद हैं जो हमें एक साथ बाँधते हैं, जबकि संस्थाएँ इस एकता को सुरक्षा और संरचना प्रदान करती हैं। राष्ट्रीय एकता दिवस का यह संदेश हमें याद दिलाता है कि एकता और विविधता विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक मूल्य हैं। राष्ट्र निर्माण केवल साझा शासन से नहीं, बल्कि साझा भावनाओं, परंपराओं और मूल्यों से संभव होता है। जब हम हर संस्कृति को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, तब हम न केवल भारत की आत्मा को समझते हैं, बल्कि उसे और मजबूत भी बनाते हैं। यही वह दृष्टिकोण है जो भारत को एक जीवंत, सशक्त, सामंजस्यपूर्ण और दूरदर्शी राष्ट्र के रूप में स्थापित करता है।

विशेष लेख : एकता दिवस का महत्व : भारत की एकता और अखंडता की आधारशिला को नमन (निर्मल कुमार)

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विशेष लेख : एकता दिवस का महत्व : भारत की एकता और अखंडता की आधारशिला को नमन (निर्मल कुमार) हर साल 31 अक्टूबर को भारत राष्ट्रीय एकता दिवस (Rashtriya Ekta Diwas) मनाता है, ताकि सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती का सम्मान किया जा सके — एक ऐसे महान नेता जिनकी दूरदृष्टि और दृढ़ निश्चय ने एक एकीकृत भारत की नींव रखी। “भारत के लौह पुरुष” के रूप में प्रसिद्ध पटेल के नेतृत्व में स्वतंत्रता के बाद 560 से अधिक रियासतों का एकीकरण हुआ, जिसने आज के इस अखंड, संप्रभु राष्ट्र को जन्म दिया। एकता दिवस केवल उनकी विरासत को श्रद्धांजलि नहीं है — यह भारत की विविधता में एकता की स्थायी प्रतिबद्धता की पुनर्पुष्टि है। लौह पुरुष और भारत का एकीकरण 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब देश को 560 से अधिक रियासतों का जटिल ताना-बाना विरासत में मिला — प्रत्येक रियासत की अपनी स्वायत्तता और अलग निष्ठाएँ थीं। सरदार पटेल ने इन रियासतों को भारतीय संघ में सम्मिलित करने की चुनौती स्वीकार की — एक ऐसा कार्य जिसके लिए अद्वितीय कूटनीति, साहस और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता थी। उनकी स्थिर दृष्टि और अटूट निश्चय ने उन्हें “लौह पुरुष” का ख़िताब दिलाया। राजनैतिक समझदारी और व्यवहारिकता के संयोजन से पटेल ने हैदराबाद, जूनागढ़ और जम्मू-कश्मीर जैसी महत्वपूर्ण रियासतों का विलय कराया, जिससे भारत की क्षेत्रीय अखंडता सुनिश्चित हुई। “एकता के बिना मनुष्यबल कोई शक्ति नहीं है; जब तक वह उचित रूप से संगठित न हो जाए, तब तक वह एक आध्यात्मिक शक्ति नहीं बन सकता।” — सरदार वल्लभभाई पटेल पटेल के लिए राष्ट्र की सच्ची शक्ति केवल सीमाओं में नहीं, बल्कि उसके लोगों की एकता में निहित थी। राष्ट्रीय एकता दिवस की शुरुआत वर्ष 2014 में भारत सरकार ने सरदार पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। इसका उद्देश्य नागरिकों में एकता की भावना को पुनर्जीवित करना और पटेल की “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की दृष्टि को सम्मानित करना है। इस दिन देशभर में Run for Unity, सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रदर्शनियाँ, और शपथ समारोह आयोजित किए जाते हैं — स्कूलों, कॉलेजों, सरकारी संस्थानों से लेकर सेना और समुदायों तक। मुख्य समारोह गुजरात के एकता नगर स्थित “Statue of Unity” (182 मीटर ऊँची पटेल की भव्य प्रतिमा) पर आयोजित होता है, जो भारत की शक्ति, साहस और सामूहिक संकल्प का प्रतीक है। एक दृष्टि जो समय से परे है सरदार पटेल की राजनीतिक बुद्धिमत्ता और दूरदृष्टि आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी स्वतंत्रता के समय थी। उनका सामाजिक समरसता और समावेशिता में विश्वास आज के विभाजित विश्व में भी प्रेरणा देता है। “सत्य और न्याय के मार्ग पर चलो — क्योंकि वही सभी के लिए सही मार्ग है।” — सरदार पटेल ये शब्द हमें याद दिलाते हैं कि भारत के सामाजिक ताने-बाने में न्याय, परस्पर सम्मान और शांति बनाए रखना हमारी साझा जिम्मेदारी है। एकता दिवस उस भारत की भावना को पुनर्स्थापित करता है जो अपनी विविधता में फलता-फूलता है, न कि उसके बावजूद। यह हर नागरिक को राष्ट्र की एकता के प्रति समर्पण की याद दिलाता है और भाषा, क्षेत्र और धर्म के बीच मजबूत बंधन बनाने का आह्वान करता है। आधुनिक भारत में एकता दिवस का महत्व आज जब भारत क्षेत्रीय असमानताओं, सामाजिक विभाजनों और वैचारिक मतभेदों जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब एकता दिवस का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यह केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सामूहिक प्रगति की भावना का पुनर्जागरण है। हर वर्ष Statue of Unity पर आयोजित समारोह देशभक्ति और गर्व की भावना को फिर से प्रज्वलित करता है। यह संदेश देता है कि भारत चाहे जितना विशाल और विविध क्यों न हो — उसका दिल और आत्मा एक है। “मेरी केवल एक इच्छा है कि भारत एक अच्छा उत्पादक बने और देश में कोई भूखा न रहे, किसी की आँखों में आँसू न हों।” — सरदार पटेल उनका यह विचारशील राष्ट्रवाद सेवा और एकता पर आधारित नेतृत्व का सर्वोत्तम उदाहरण है। एकता की अमर विरासत   राष्ट्रीय एकता दिवस केवल स्मरण का दिन नहीं है — यह उस शक्ति की याद दिलाता है जो एकता से आती है। यह भारत के संविधान, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र, और उस कालातीत विचार का प्रतिबिंब है कि एकता ही राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति है।   एक विभाजित होती दुनिया में पटेल का उदाहरण हमें अनुशासन, एकजुटता और सामूहिक नियति में विश्वास का संदेश देता है। हर वर्ष 31 अक्टूबर को जब भारत एकता दिवस मनाता है, तब यह हमें याद दिलाता है कि पटेल की कल्पित एकता कोई स्थिर अवधारणा नहीं, बल्कि एक जीवंत शक्ति है। “कार्य ही पूजा है, श्रम ही ईश्वर है, और जो व्यक्ति सही भावना से कार्य करता है, वह सदा शांत और प्रसन्न रहता है।” — सरदार वल्लभभाई पटेल ये वचन हर पीढ़ी को राष्ट्र की प्रगति और एकता में योगदान देने का आह्वान करते हैं। सरदार पटेल की विरासत इतिहास से परे है — वह भारत की आत्मा में सजीव है। हर वर्ष एकता दिवस यह सुनिश्चित करता है कि यह भावना कभी मंद न पड़े, भारत सदैव एक रहे, और पटेल का सुदृढ़ सामंजस्य सदा हमारा मार्गदर्शक बना रहे। (लेखक निर्मल कुमार सामाजिक,आर्थिक मुद्दों के जानकार हैं।यह उनके निजी विचार हैं।)

जशपुर में 15 अक्टूबर को होगा फिल्म अर्पण का पोस्टर विमोचन, डॉ हरविंदर मांकड़ और आदेश शर्मा रहेंगे विशेष अतिथि

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जशपुर में 15 अक्टूबर को होगा फिल्म अर्पण का पोस्टर विमोचन, डॉ हरविंदर मांकड़ और आदेश शर्मा रहेंगे विशेष अतिथि जशपुर,12 अक्टूबर 2025/ जशपुर की धरती एक बार फिर बड़ी सांस्कृतिक और प्रेरणादायक घटना की साक्षी बनने जा रही है। क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ ग्रेस कुजूर के संघर्षपूर्ण जीवन पर आधारित फिल्म अर्पण का भव्य पोस्टर विमोचन समारोह 15 अक्टूबर को जशपुर में आयोजित होगा। पॉपकॉर्न फ्लिक्स इंडिया के प्रोडक्शन हेड संतोष चौधरी ने बताया कि इस अवसर पर एपीजे अब्दुल कलाम पर पुस्तक लिखने वाले प्रसिद्ध लेखक और लोटपोट पत्रिका के मोटू पतलू के क्रिएटर, सुप्रसिद्ध कार्टूनिस्ट डॉ हरविंदर मांकड़ तथा बालाजी फिल्म्स इंडिया के संस्थापक आदेश शर्मा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे। खास बात है कि पॉपकॉर्न फ्लिक्स इंडिया की फिल्म अर्पण में नायिका की भूमिका स्वयं डॉ ग्रेस कुजूर ने निभाई है। कार्यक्रम में पूर्व सैनिक भी विशेष रूप से आमंत्रित हैं, क्योंकि डॉ ग्रेस के पिता स्वर्गीय स्तानिसलास कुजूर भारतीय सेना के वीर सैनिक रहे हैं, जिन्होंने चार लड़ाइयां, 1962, 1965, 1971 तथा गोवा मुक्ति संग्राम में अपनी वीरता का प्रदर्शन किया था। डॉ हरविंदर मांकड़ ने कहा कि “जशपुर की खूबसूरत और अनछुई वादियाँ मुझे दोबारा खींच लाई हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जी की स्वच्छ पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता अनुकरणीय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक पेड़ माँ के नाम अभियान की सफलता देखकर यह फिल्म उसी भावना को समर्पित है।” वहीं, आदेश शर्मा ने भी डॉ ग्रेस के कार्यों से प्रभावित होकर समारोह में शामिल होने की सहमति दी है। वे पिछले 35 वर्षों से मीडिया और फिल्म निर्माण के क्षेत्र में सक्रिय हैं और तथास्तु इंडिया, वायदूत न्यूज नेटवर्क, बालाजी फिल्म्स के संस्थापक होने के साथ ही दूरदर्शन स्ट्रिंगर फेडरेशन ऑफ इंडिया के संयुक्त सचिव के रूप में कार्यरत हैं। यह समारोह न केवल जशपुर की कला और सौंदर्य को राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने वाला साबित होगा, बल्कि डॉ ग्रेस कुजूर के प्रेरक जीवन की कहानी को भी जन-जन तक पहुँचाने का माध्यम बनेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्म दिवस पर होगा पौधा रोपण,कौशल्या साय ने हर घर में दीप जलाने की अपील की

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जशपुर,15 सितंबर 2025 – सत्रह सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की धर्मपत्नी श्रीमती कौशल्या साय प्रातः 9 बजे बगिया के श्री फलेश्वर नाथ मंदिर परिसर में पौधा रोपण करेंगी एवं सांय 6 बजे कुनकुरी के छठ घाट में शहरवासियों के साथ दीप प्रज्वलन कर उनके उज्जवल भविष्य की कामना कर राष्ट्र प्रगति की कामना करेंगी। इस मौके पर भव्य कार्यक्रम के साथ छठ घाट को दीपों से सजा कर रोशन किया जाएगा।कुनकुरी के नगरवासियों ने इस आयोजन की तैयारी उत्साहपूर्वक शुरू कर दी है। श्रीमती कौशल्या साय ने समस्त प्रदेश वासियों से अपील किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस 17 सितंबर को सभी लोग अपने घरों में पौधारोपण कर शाम को दीपक जला कर एकजुटता का संदेश दें और राष्ट्र प्रगति की कामना करें। उन्होनें आगे कहा कि प्रधानमंत्री श्री मोदी बीते 11 साल से लगातार देश के विकास के लिए पूरे समर्पण भाव से काम कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में भारत विश्व गुरू बनने की ओर अग्रसर है। देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा मजबूत हुई है। देश का आर्थिक विकास एक नई उंचाई को छू रहा है। अंर्तराष्ट्रीय मंच में भारत की उपस्थिति पहले से अधिक मजबूत हुई है। बीते दो साल में नक्सल मुक्ति की ओर छत्तीसगढ़ ने तेजी से कदम बढ़ाया है।ऐसे में हम सब प्रदेश वासियों का दायित्व है कि हम जन्म दिवस के शुभ अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एकजुटता का संदेश देकर उनका उत्साहवर्द्वन करे ताकि वे एक नई उर्जा के साथ देश और देशवासियों की सेवा कर सकें।