वक्फ संपत्तियों की मुक्ति: जब संरक्षक ही लुटेरे बन जाएं

निर्मल कुमार

भारत में वक्फ संपत्तियाँ एक ऐसी अमूल्य धरोहर हैं, जिनका मूल उद्देश्य था—गरीबों की सहायता, अनाथों और विधवाओं का संरक्षण, छात्रों को छात्रवृत्ति, और समुदाय के लिए स्कूल, अस्पताल, मदरसे तथा सामुदायिक केंद्रों की स्थापना। ये संपत्तियाँ इस्लामी परंपरा में ‘अल्लाह की अमानत’ मानी जाती हैं—ऐसी संपत्तियाँ जिन्हें एक बार वक्फ कर दिया जाए, तो फिर उनका उपयोग सिर्फ सार्वजनिक भलाई के लिए ही हो सकता है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज यह पूरी व्यवस्था भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और अवसरवादी राजनीति की शिकार हो चुकी है।

आज वक्फ संपत्तियों की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि बाहरी लोग उन्हें हड़प रहे हैं, बल्कि यह है कि जिन्हें इन संपत्तियों की रक्षा करनी थी—खुद वक्फ बोर्ड और उनके अधिकारी—वही इनकी लूट में सबसे आगे हैं। ये लोग, जिन्हें समुदाय ने ट्रस्टी मानकर अधिकार सौंपे थे, आज उन अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए संपत्तियों को सस्ते दामों पर पट्टे पर दे रहे हैं, अवैध कब्जों को नजरअंदाज कर रहे हैं, और किसी भी प्रकार की पारदर्शिता से मुँह मोड़ रहे हैं। यह विश्वासघात केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और धार्मिक भी है।

आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 8 लाख वक्फ संपत्तियाँ और 6 लाख एकड़ भूमि वक्फ के अधीन हैं, जिनका आर्थिक मूल्य लाखों करोड़ रुपये में आँका गया है। कर्नाटक में 59 लाख एकड़, मध्य प्रदेश में 6.79 लाख एकड़ और तमिलनाडु में 6.55 लाख एकड़ भूमि वक्फ के तहत है। लेकिन विडंबना यह है कि इतनी अपार संपदा के बावजूद देश के अधिकांश मुस्लिम गरीब, अनपढ़ और सुविधाहीन हैं। अगर वक्फ संपत्तियों का सदुपयोग होता, तो हजारों स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और छात्रावास खड़े हो सकते थे। लेकिन वास्तविकता यह है कि अनेक स्थानों पर वक्फ ज़मीनें कुछ रुपये महीना किराए पर पट्टे पर दी गई हैं, जिन पर मॉल, होटल और कमर्शियल टावर खड़े कर दिए गए हैं—और इनसे होने वाली कमाई या तो बोर्ड के पास नहीं आती, या फिर उसका कोई हिसाब नहीं होता।

खुद वक्फ बोर्डों की भूमिका संदेह के घेरे में है। राज्य वक्फ बोर्डों पर राजनीतिक दखलंदाज़ी, भाई-भतीजावाद और अनियमित नियुक्तियाँ आम हो गई हैं। ऑडिट रिपोर्ट सालों तक लंबित रहती हैं, और जब कोई घोटाला उजागर होता भी है, तो कार्रवाई अक्सर या तो सांप्रदायिकता के नाम पर टाल दी जाती है या फिर कानूनी उलझनों में दबा दी जाती है। ज़मीनी स्तर पर लोग शिकायत करते हैं कि बोर्ड के दफ्तरों में पारदर्शिता की भारी कमी है, रजिस्टर गायब हैं, फाइलें बदल दी जाती हैं और पट्टों में हेराफेरी आम बात है।

इस पृष्ठभूमि में वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 एक आशा की किरण के रूप में उभरा है। यह विधेयक वक्फ संपत्तियों के डिजिटलीकरण, GIS मैपिंग, समयबद्ध ऑडिट, ऑनलाइन शिकायत निवारण प्रणाली, और किसी भी संपत्ति लेनदेन के लिए केंद्रीय अनुमति प्रक्रिया जैसी व्यवस्थाओं को कानूनी रूप देगा। इससे न केवल वक्फ संपत्तियों की पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही भी तय होगी।

सरकार ने पहले ही “कौमी वक्फ बोर्ड तरक्कियाती योजना” और “शहरी वक्फ सम्पत्ति विकास योजना” जैसे कार्यक्रम शुरू किए हैं, जो वक्फ संपत्तियों के बेहतर उपयोग और बोर्डों की आधुनिकता की दिशा में प्रयास कर रहे हैं। परंतु जब तक इन योजनाओं को विधायी मजबूती नहीं मिलेगी, तब तक बदलाव अधूरा रहेगा। विधेयक 2025 इस बदलाव की कुंजी है।

लेकिन यह भी सच है कि इस विधेयक का विरोध हो रहा है—और यह विरोध गरीबों, इमामों, अनाथों या विद्यार्थियों की ओर से नहीं है। यह विरोध उन लोगों से आ रहा है जिनकी सत्ता और लाभ की संरचना इस भ्रष्ट वक्फ व्यवस्था पर टिकी हुई है। वे धार्मिक भावनाओं की आड़ में विधेयक को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि असल में उन्हें अपनी पोल खुलने का डर सता रहा है।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति फखरुद्दीन इस विधेयक को “एक ऐसा निर्णायक मोड़” कहते हैं, जो वक्फ शासन को नीयत और नीति से जोड़ता है। वहीं वक्फ मामलों की विशेषज्ञ डॉ. सबीना अहमद स्पष्ट रूप से कहती हैं कि “यह केवल एक कानूनी सुधार नहीं, बल्कि समुदाय के सम्मान की पुनर्प्राप्ति है।”

अब वक्त आ गया है कि मुस्लिम समाज इस विधेयक का समर्थन खुले मन से करे। यह किसी सरकार या राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, आत्मनिर्भरता और सम्मान का सवाल है। अगर हम चाहते हैं कि हमारी वक्फ संपत्तियाँ सचमुच ‘अल्लाह की अमानत’ बनी रहें, तो हमें पहले उन्हें भ्रष्ट संरक्षकों से मुक्त कराना होगा।

यह संघर्ष अब केवल कागज़ी नहीं है—यह एक नैतिक युद्ध है। अतीत की ग़लतियों को पहचानकर अगर हम आज कार्रवाई नहीं करेंगे, तो हमारी आने वाली नस्लें हमें कभी माफ नहीं करेंगी। इसलिए, वक्त आ गया है कि हम इस विधेयक के साथ खड़े हों—सिर्फ सरकार के लिए नहीं, बल्कि इंसाफ के लिए।

वक्फ संशोधन विधेयक 2025 का समर्थन करें—अपने भविष्य के लिए, अपने समाज के लिए, और उस न्याय के लिए, जो अब तक सिर्फ वादों में कैद रहा है।

(लेखक आर्थिक -समाजिक मुद्दों पर लिखते रहते हैं।यह उनके निजी विचार हैं।)