सीरत-उन-नबी: आधुनिक ज़िंदगी में भी एक मार्गदर्शन — मेरी दृष्टि से विस्तृत विश्लेषण

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सीरत-उन-नबी: आधुनिक ज़िंदगी में भी एक मार्गदर्शन — मेरी दृष्टि से विस्तृत विश्लेषण निर्मल कुमार   जब मैं पैग़म्बर मुहम्मद के जीवन पर सोचता हूँ, तो मुझे यह महसूस होता है कि उनकी ज़िंदगी इतिहास की कोई पुरानी किताब नहीं, बल्कि आज भी हमारा मार्गदर्शक है। उनकी बोली, उनके विचार, उनके व्यक्तिगत और सामाजिक रिश्ते — सब कुछ ऐसे हैं कि अगर हम उन्हें समझें, तो हमारी जिन्दगी बदल सकती है। उन्होंने दिखाया कि इंसानियत, दया, न्याय, सहानुभूति, नैतिकता — ये सिर्फ अच्छे विचार नहीं, बल्कि व्यवहार का हिस्सा हैं। उनके जीवन की शुरुआत भी बहुत सहज और कई मायनों में कठिन थी। वे एक सामान्य परिवार में पैदा हुए, पिता पहले ही गुज़र चुके थे, और बचपन में ही मां का साया उठ गया। फिर भी उन्होंने कभी हालात के आगे हथियार नहीं डाले। उनका जीवन हमें यह समझाता है कि कठिनाई किसी को बड़ा बनने से रोकती नहीं, बल्कि बड़ा बनाती है, अगर इंसान टूटने के बजाय सीखने का रास्ता चुने।   उनकी ईमानदारी इतनी मशहूर थी कि लोग उन्हें अल-अमीन कहते थे। यह विश्वास अचानक नहीं मिला, बल्कि उनके काम, उनके व्यवहार और उनकी सत्यनिष्ठा ने समाज के दिल में जगह बनाई। किसी भी रिश्ते की जड़ भरोसा होता है, और यह भरोसा उन्होंने शब्दों से नहीं बल्कि कर्मों से कमाया। यही बात आज के समय पर भी लागू होती है — कि पहचान और सम्मान दिखावे या उपाधि से नहीं, बल्कि सिद्धांतों और व्यवहार से बनते हैं।   फिर जब उन्हें पैग़म्बरी मिली, उन्होंने सिर्फ़ इबादत का पैग़ाम नहीं दिया, बल्कि इंसानी जीवन का संतुलित मॉडल पेश किया। उन्होंने बताया कि मजबूत विश्वास वही है जो व्यवहार में दिखे, जो घर में भी उतना ही चमके जितना मस्जिद में, जो बाज़ार के सौदे में भी उतना ही स्पष्ट हो जितना सजदे में। उनकी शिक्षा इबादत के साथ ईमानदारी, रिश्तों के साथ संतुलन, शक्ति के साथ करुणा और न्याय के साथ विनम्रता जोड़ती थी।   उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि जो लोग उनके विरोधी थे वे भी उनकी न्यायप्रियता की गवाही देते थे। उन्होंने कभी नफरत को भाषा नहीं बनने दिया। उन्होंने दिखाया कि बदले की जगह माफी बड़ा रास्ता खोलती है। मक्का की फतह इसका सबसे भव्य उदाहरण है। उन लोगों पर पूरा अधिकार था जिन्होंने उन्हें सताया, अपमानित किया, पत्थर बरसाए, पर उन्होंने तलवार नहीं, क्षमा चुनी। यह केवल इतिहास की घटना नहीं, बल्कि आज के विश्व नेतृत्व के लिए चरित्र की परिभाषा है। अगर राष्ट्र और समाज आज भी उससे सीखें, तो युद्ध की जगह संवाद, टकराव की जगह समाधान और विभाजन की जगह सह-जीवन संभव हो सकेगा।   उनके जीवन में महिलाओं की स्थिति को लेकर भी बड़ा संदेश मिलता है। उन्होंने बेटी का सम्मान किया, पत्नी से सलाह ली, महिलाओं के अधिकार घोषित किए और उन्हें शिक्षा, सामाजिक सहभागिता और आर्थिक भागीदारी का दर्जा दिया। आज जब हम “जेंडर इक्विटी” की बात आधुनिक विचार के रूप में करते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि यह सच एक ऐतिहासिक नमूने के रूप में पहले ही दिया जा चुका है। अगर समाज उस सीख को फिर से पहचान ले, तो घरेलू हिंसा, असमानता और पक्षपात जैसी समस्याएँ काफी कम हो सकती हैं। बराबरी सिर्फ़ कानून नहीं, व्यवहार से आती है — और यही सीरत का सार है।   अब जब हम आधुनिक समाज पर नजर डालते हैं, तो रिश्तों में दरारें, सामाजिक अविश्वास, राजनीतिक ध्रुवीकरण और आध्यात्मिक खालीपन नजर आता है। सीरत-उन-नबी हमें यह एहसास कराती है कि समाधान नए सिद्धांत खोजने में नहीं, बल्कि पुराने सिद्धांतों को जीने में है। मनुष्य तभी संतुलित जीवन जी सकता है जब उसकी नैतिकता और ज़िम्मेदारी उसके विश्वास के बराबर मजबूत हों। सिर्फ़ धार्मिक पहचान काफी नहीं, धार्मिक चरित्र जरूरी है। बरकत वहीं होती है जहाँ धर्म सिद्धांत नहीं, व्यवहार बनकर उतरे।   अगर परिवारों में मामूली बातों पर नाराज़गी टूटने की बजाए बातचीत और क्षमा के रूप में बदल जाए, अगर समाज में कटुता की जगह सम्मान और सुनने की संस्कृति विकसित हो, अगर युवा यह समझें कि ईमानदारी सफलता का दुश्मन नहीं बल्कि नींव है, और अगर राष्ट्र यह याद रखे कि शक्ति शासन का साधन है शासन का चरित्र नहीं — तो दुनिया बदली जा सकती है। और इसका खाका पहले से मौजूद है, बस हमें उसे अपनाना है।   सीरत केवल एक शरीयत या नियम-पुस्तिका नहीं, बल्कि जीवन-कला है। यह सिखाती है कि धार्मिक व्यक्ति वह नहीं जो सिर्फ़ नमाज़ पढ़े या रोज़े रखे, बल्कि वह जो सच बोले, वादा निभाए, भरोसा दे सके, मदद करे, क्षमा करे, ईर्ष्या से बचे, और अपने से कमजोर को अधिकार दे। यह जीवन का वह रूप है, जिसे अपनाकर मनुष्य अपने आप में भी शांति पाता है और समाज को भी देता है। यही चरित्र यदि आज जनमानस में फिर जीवित हो जाए, तो धार्मिक संघर्ष, सामाजिक टूटी हुई संरचनाएँ और नैतिक अवसाद स्वभाविक रूप से कम हो जाएँ।   मेरी दृष्टि में यह विषय सिर्फ़ मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए उपयोगी है। क्योंकि इंसाफ़, सद्भाव, विनम्रता, दया, वचन-पालन, पड़ोस का हक़, स्त्री-पुरुष सम्मान, आर्थिक ईमानदारी — ये किसी एक समाज की जरूरत नहीं, पूरे विश्व की है। नबी ﷺ ने अपने जीवन से सिखाया कि सच्ची क्रांति तलवार से नहीं, चरित्र से आती है। आज भी जितनी हमें प्रौद्योगिकी, विकास और बुद्धि की आवश्यकता है, उतनी ही हमें इंसानियत, धैर्य, संवाद और संवेदनशीलता की भी है।   इसलिए मैं चाहता हूँ कि सीरत पढ़ी भी जाए और जी भी जाए। यह सिर्फ़ शब्द नहीं, आचरण बने। यह सिर्फ़ किताब नहीं, संस्कृति बने। यह सिर्फ़ आदर्श नहीं, अभ्यास बने। उसी दिन समाज शांत होगा, परिवार मजबूत होंगे, मनुष्य संतुलित होगा और धर्म सुंदरतम रूप में सामने आएगा — व्यवहार में, चरित्र में, और इंसानियत में। नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं

आलेख : विविधता में एकता – राष्ट्र निर्माण में संस्कृति, कला और परंपराओं की भूमिका

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आलेख : विविधता में एकता – राष्ट्र निर्माण में संस्कृति, कला और परंपराओं की भूमिका भारत की एकता केवल संविधान या कानूनों से संचालित नहीं होती, बल्कि यह हमारे जीवन के हर पहलू में रची-बसी है। यह एकता हमारे त्योहारों, लोककला, संगीत, भाषा, परिधान, भोजन और परंपराओं में सांस लेती है। भारत की सच्ची ताकत उसकी विविधता में छिपी है—जहाँ अलग-अलग धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ मिलकर एक ऐसा रंगीन मोज़ेक बनाती हैं जो दुनिया में अद्वितीय है। राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर हमें यह स्मरण करना चाहिए कि हमारी सांस्कृतिक विविधता केवल पहचान नहीं, बल्कि हमारे राष्ट्र की आत्मा है। कश्मीर की सूफियाना कव्वालियों से लेकर कन्याकुमारी के भरतनाट्यम तक, राजस्थान के लोकगीतों से लेकर नागालैंड के जनजातीय नृत्यों तक, भारत का हर क्षेत्र अपनी विशिष्टता में चमकता है। यह विविधता विभाजन नहीं लाती, बल्कि एक-दूसरे के अनुभवों और भावनाओं को जोड़ती है। जब हम किसी और क्षेत्र के त्योहार में शामिल होते हैं या किसी अन्य भाषा का गीत गुनगुनाते हैं, तब हम अपने राष्ट्र की एकता को और गहराई से महसूस करते हैं। मेले, उत्सव और स्थानीय परंपराएँ केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि वे आपसी मेल-जोल और सांस्कृतिक संवाद के पुल हैं। भारतीय समाज में महिलाओं की भूमिका इस सांस्कृतिक निरंतरता का केंद्र बिंदु है। वे घर से लेकर समाज तक परंपराओं की संवाहक और एकता की प्रतीक हैं। किसी भी त्योहार की तैयारी, लोककला का संरक्षण, पारिवारिक रस्मों का निर्वाह या समुदायिक समन्वय—हर स्तर पर महिलाओं का योगदान अद्वितीय है। वे लोककथाएँ सुनाकर, लोकगीत सिखाकर और बच्चों में परंपरागत मूल्यों को रोपित करके न केवल संस्कृति को जीवित रखती हैं, बल्कि सामाजिक एकजुटता को भी सशक्त बनाती हैं। वास्तव में, महिलाएँ उस अदृश्य शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं जो समाज को भीतर से जोड़ती है। भारत की कला और संगीत केवल सौंदर्य की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के उपकरण हैं। शास्त्रीय नृत्य की लय, लोकगीतों की आत्मा, नाटकों का संदेश और चित्रकला की भावनाएँ – सब मिलकर नागरिकों में साझा चेतना का निर्माण करती हैं। जब कोई बच्चा स्कूल में भांगड़ा और भरतनाट्यम दोनों सीखता है, या जब किसी कार्यक्रम में कथक और ओडिसी साथ प्रस्तुत होते हैं, तब यह केवल कला नहीं होती – यह एकता की भाषा होती है। यही कारण है कि एकता दिवस जैसे अवसरों पर बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ हमारे राष्ट्रीय चरित्र की जीवंत झलक पेश करती हैं। त्योहार भारत के समाज को जोड़ने वाली सबसे बड़ी शक्ति हैं। दीवाली की रोशनी, ईद का सेवरीं, पोंगल का भात या बैसाखी की फसल – हर त्योहार अपने भीतर साझेदारी और पारस्परिक सम्मान का संदेश रखता है। इन अवसरों पर जब समाज के लोग साथ मिलकर उत्सव मनाते हैं, तो धर्म, भाषा और क्षेत्र की दीवारें स्वतः गिर जाती हैं। ऐसे साझा अनुभव सामाजिक जिम्मेदारी, सहिष्णुता और सहयोग की भावना को जन्म देते हैं। यही भावना भारत को एक ऐसा राष्ट्र बनाती है जहाँ भिन्नताएँ टकराती नहीं, बल्कि मिलकर नई पहचान बनाती हैं। संस्कृति की यह एकता केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि संस्थागत भी है। जहाँ संस्कृति लोगों को जोड़ती है, वहीं शासन और नीतियाँ उस एकता की रक्षा करती हैं। प्रशासनिक संस्थाएँ, कानून व्यवस्था और नीतिगत ढाँचे यह सुनिश्चित करते हैं कि हर नागरिक को अपनी संस्कृति और परंपरा को सुरक्षित रखने की स्वतंत्रता मिले। जब सरकार कला, संगीत, नाटक, लोककला और सांस्कृतिक त्योहारों को प्रोत्साहन देती है, तो वह न केवल कलाकारों का सम्मान करती है, बल्कि समाज की एकजुटता को भी सशक्त बनाती है। भारत की एकता का ताना-बाना कानून और जीवन दोनों के धागों से बुना गया है। संस्कृति, कला, संगीत और विविधता वह सामाजिक गोंद हैं जो हमें एक साथ बाँधते हैं, जबकि संस्थाएँ इस एकता को सुरक्षा और संरचना प्रदान करती हैं। राष्ट्रीय एकता दिवस का यह संदेश हमें याद दिलाता है कि एकता और विविधता विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक मूल्य हैं। राष्ट्र निर्माण केवल साझा शासन से नहीं, बल्कि साझा भावनाओं, परंपराओं और मूल्यों से संभव होता है। जब हम हर संस्कृति को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, तब हम न केवल भारत की आत्मा को समझते हैं, बल्कि उसे और मजबूत भी बनाते हैं। यही वह दृष्टिकोण है जो भारत को एक जीवंत, सशक्त, सामंजस्यपूर्ण और दूरदर्शी राष्ट्र के रूप में स्थापित करता है।

विशेष लेख : एकता दिवस का महत्व : भारत की एकता और अखंडता की आधारशिला को नमन (निर्मल कुमार)

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विशेष लेख : एकता दिवस का महत्व : भारत की एकता और अखंडता की आधारशिला को नमन (निर्मल कुमार) हर साल 31 अक्टूबर को भारत राष्ट्रीय एकता दिवस (Rashtriya Ekta Diwas) मनाता है, ताकि सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती का सम्मान किया जा सके — एक ऐसे महान नेता जिनकी दूरदृष्टि और दृढ़ निश्चय ने एक एकीकृत भारत की नींव रखी। “भारत के लौह पुरुष” के रूप में प्रसिद्ध पटेल के नेतृत्व में स्वतंत्रता के बाद 560 से अधिक रियासतों का एकीकरण हुआ, जिसने आज के इस अखंड, संप्रभु राष्ट्र को जन्म दिया। एकता दिवस केवल उनकी विरासत को श्रद्धांजलि नहीं है — यह भारत की विविधता में एकता की स्थायी प्रतिबद्धता की पुनर्पुष्टि है। लौह पुरुष और भारत का एकीकरण 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब देश को 560 से अधिक रियासतों का जटिल ताना-बाना विरासत में मिला — प्रत्येक रियासत की अपनी स्वायत्तता और अलग निष्ठाएँ थीं। सरदार पटेल ने इन रियासतों को भारतीय संघ में सम्मिलित करने की चुनौती स्वीकार की — एक ऐसा कार्य जिसके लिए अद्वितीय कूटनीति, साहस और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता थी। उनकी स्थिर दृष्टि और अटूट निश्चय ने उन्हें “लौह पुरुष” का ख़िताब दिलाया। राजनैतिक समझदारी और व्यवहारिकता के संयोजन से पटेल ने हैदराबाद, जूनागढ़ और जम्मू-कश्मीर जैसी महत्वपूर्ण रियासतों का विलय कराया, जिससे भारत की क्षेत्रीय अखंडता सुनिश्चित हुई। “एकता के बिना मनुष्यबल कोई शक्ति नहीं है; जब तक वह उचित रूप से संगठित न हो जाए, तब तक वह एक आध्यात्मिक शक्ति नहीं बन सकता।” — सरदार वल्लभभाई पटेल पटेल के लिए राष्ट्र की सच्ची शक्ति केवल सीमाओं में नहीं, बल्कि उसके लोगों की एकता में निहित थी। राष्ट्रीय एकता दिवस की शुरुआत वर्ष 2014 में भारत सरकार ने सरदार पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। इसका उद्देश्य नागरिकों में एकता की भावना को पुनर्जीवित करना और पटेल की “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की दृष्टि को सम्मानित करना है। इस दिन देशभर में Run for Unity, सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रदर्शनियाँ, और शपथ समारोह आयोजित किए जाते हैं — स्कूलों, कॉलेजों, सरकारी संस्थानों से लेकर सेना और समुदायों तक। मुख्य समारोह गुजरात के एकता नगर स्थित “Statue of Unity” (182 मीटर ऊँची पटेल की भव्य प्रतिमा) पर आयोजित होता है, जो भारत की शक्ति, साहस और सामूहिक संकल्प का प्रतीक है। एक दृष्टि जो समय से परे है सरदार पटेल की राजनीतिक बुद्धिमत्ता और दूरदृष्टि आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी स्वतंत्रता के समय थी। उनका सामाजिक समरसता और समावेशिता में विश्वास आज के विभाजित विश्व में भी प्रेरणा देता है। “सत्य और न्याय के मार्ग पर चलो — क्योंकि वही सभी के लिए सही मार्ग है।” — सरदार पटेल ये शब्द हमें याद दिलाते हैं कि भारत के सामाजिक ताने-बाने में न्याय, परस्पर सम्मान और शांति बनाए रखना हमारी साझा जिम्मेदारी है। एकता दिवस उस भारत की भावना को पुनर्स्थापित करता है जो अपनी विविधता में फलता-फूलता है, न कि उसके बावजूद। यह हर नागरिक को राष्ट्र की एकता के प्रति समर्पण की याद दिलाता है और भाषा, क्षेत्र और धर्म के बीच मजबूत बंधन बनाने का आह्वान करता है। आधुनिक भारत में एकता दिवस का महत्व आज जब भारत क्षेत्रीय असमानताओं, सामाजिक विभाजनों और वैचारिक मतभेदों जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब एकता दिवस का संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यह केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सामूहिक प्रगति की भावना का पुनर्जागरण है। हर वर्ष Statue of Unity पर आयोजित समारोह देशभक्ति और गर्व की भावना को फिर से प्रज्वलित करता है। यह संदेश देता है कि भारत चाहे जितना विशाल और विविध क्यों न हो — उसका दिल और आत्मा एक है। “मेरी केवल एक इच्छा है कि भारत एक अच्छा उत्पादक बने और देश में कोई भूखा न रहे, किसी की आँखों में आँसू न हों।” — सरदार पटेल उनका यह विचारशील राष्ट्रवाद सेवा और एकता पर आधारित नेतृत्व का सर्वोत्तम उदाहरण है। एकता की अमर विरासत   राष्ट्रीय एकता दिवस केवल स्मरण का दिन नहीं है — यह उस शक्ति की याद दिलाता है जो एकता से आती है। यह भारत के संविधान, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र, और उस कालातीत विचार का प्रतिबिंब है कि एकता ही राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति है।   एक विभाजित होती दुनिया में पटेल का उदाहरण हमें अनुशासन, एकजुटता और सामूहिक नियति में विश्वास का संदेश देता है। हर वर्ष 31 अक्टूबर को जब भारत एकता दिवस मनाता है, तब यह हमें याद दिलाता है कि पटेल की कल्पित एकता कोई स्थिर अवधारणा नहीं, बल्कि एक जीवंत शक्ति है। “कार्य ही पूजा है, श्रम ही ईश्वर है, और जो व्यक्ति सही भावना से कार्य करता है, वह सदा शांत और प्रसन्न रहता है।” — सरदार वल्लभभाई पटेल ये वचन हर पीढ़ी को राष्ट्र की प्रगति और एकता में योगदान देने का आह्वान करते हैं। सरदार पटेल की विरासत इतिहास से परे है — वह भारत की आत्मा में सजीव है। हर वर्ष एकता दिवस यह सुनिश्चित करता है कि यह भावना कभी मंद न पड़े, भारत सदैव एक रहे, और पटेल का सुदृढ़ सामंजस्य सदा हमारा मार्गदर्शक बना रहे। (लेखक निर्मल कुमार सामाजिक,आर्थिक मुद्दों के जानकार हैं।यह उनके निजी विचार हैं।)

वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला: संवैधानिकता, पारदर्शिता और न्याय की मजबूती

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लेखक : निर्मल कुमार 15 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जो इस कानून की संवैधानिक वैधता को मजबूत करता है। मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की खंडपीठ ने पूरे अधिनियम पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, हालांकि कुछ विशिष्ट प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाई। यह फैसला वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्वजनिक हितों की रक्षा को प्राथमिकता देता है, जबकि मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों को बरकरार रखता है। इस लेख में हम इस फैसले के आधार पर वक्फ संशोधन अधिनियम की आवश्यकता और इसके सकारात्मक पहलुओं पर चर्चा करेंगे, जिसमें भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और अतिक्रमण के उदाहरण शामिल हैं। यह अधिनियम मुस्लिम समुदाय की संपत्तियों को सुरक्षित रखते हुए राष्ट्रीय एकता और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देता है। वक्फ संपत्तियां भारत में मुस्लिम समुदाय की एक महत्वपूर्ण धरोहर हैं, जो धार्मिक, शैक्षणिक और सामाजिक कल्याण के लिए समर्पित हैं। देश में लगभग 9.4 लाख वक्फ संपत्तियां पंजीकृत हैं, जिनकी अनुमानित कीमत लाखों करोड़ रुपये है। हालांकि, पुराने वक्फ अधिनियम 1995 में कमियां होने से इन संपत्तियों में भ्रष्टाचार और अतिक्रमण की घटनाएं बढ़ी हैं। उदाहरण के लिए, तेलंगाना में ‘वक्फ बाय यूजर’ की अवधारणा का दुरुपयोग कर 5,000 से अधिक सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण किया गया। इसी तरह, कर्नाटक में वक्फ बोर्ड घोटाले में लाखों एकड़ भूमि का गबन हुआ, जहां अधिकारियों ने अवैध हस्तांतरण किए। ये मामले दर्शाते हैं कि बिना सुधार के, वक्फ संपत्तियां समुदाय के बजाय कुछ व्यक्तियों के लाभ का माध्यम बन रही हैं। वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 इन कमियों को दूर करने के लिए लाया गया, और सुप्रीम कोर्ट का फैसला इसकी जरूरत को प्रमाणित करता है। सुप्रीम कोर्ट ने संसद द्वारा पारित कानूनों की संवैधानिकता की मजबूत धारणा को दोहराया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को यह साबित करना होता है कि अधिनियम संवैधानिक प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन करता है, जो वे नहीं कर सके। यह फैसला अधिनियम की वैधता को मजबूत करता है, क्योंकि विधायिका को जनता की जरूरतों का बेहतर ज्ञान होता है। अदालत ने ऐतिहासिक संदर्भ और सामान्य ज्ञान को ध्यान में रखते हुए कहा कि कानून की संवैधानिकता पर संदेह तभी उठाया जा सकता है जब स्पष्ट प्रमाण हों। यह दृष्टिकोण न केवल वक्फ अधिनियम को बल देता है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रक्षा करता है। अदालत ने ‘वक्फ बाय यूजर’ की अवधारणा को अक्सर दुरुपयोग का माध्यम मानते हुए, इसकी समाप्ति को बरकरार रखा। यह प्रावधान सरकारी भूमि पर बिना उचित दस्तावेज के दावे करने की अनुमति देता था, जिससे सार्वजनिक संपत्तियों को खतरा था। उदाहरणस्वरूप, तेलंगाना में 5,000 से अधिक सरकारी संपत्तियां ‘वक्फ बाय यूजर’ के नाम पर कब्जा की गईं। अधिनियम में इसकी सीमा तय करने से सार्वजनिक संपत्तियां सभी नागरिकों के लिए सुरक्षित होंगी। अदालत ने सेक्शन 3सी को बरकरार रखा, जो सरकारी संपत्तियों की जांच की अनुमति देता है, हालांकि कुछ उप-प्रावधानों पर रोक लगाई ताकि जांच के दौरान संपत्ति की स्थिति बनी रहे। यह बदलाव भ्रष्टाचार को रोकते हुए न्याय सुनिश्चित करता है। अधिनियम में सभी वक्फों का अनिवार्य पंजीकरण सुनिश्चित किया गया है, जो जवाबदेही, पारदर्शिता और दुरुपयोग की रोकथाम करता है। अदालत ने इस प्रावधान को बरकरार रखा, नोट करते हुए कि 1923 से विभिन्न समितियों ने गैर-पंजीकरण और दुरुपयोग को उजागर किया है।यह बदलाव वास्तविक वक्फ लाभार्थियों की रक्षा करता है, क्योंकि डिजिटल रिकॉर्ड और सार्वजनिक नोटिस से आम लोग आपत्ति दर्ज करा सकेंगे। पहले की अनियमितताएं, जैसे उत्तर प्रदेश वक्फ बोर्ड में अवैध बिक्री, अब कम होंगी। अदालत ने केंद्रीय वक्फ काउंसिल और राज्य वक्फ बोर्डों में 2-4 गैर-मुस्लिम सदस्यों (ज्यादातर पदेन अधिकारी) की शामिली को बरकरार रखा। यह धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप नहीं करता, बल्कि वित्तीय, प्रशासनिक और धर्मनिरपेक्ष निगरानी को मजबूत करता है। यह विविधता, समावेशिता और बेहतर शासन को बढ़ावा देता है, बिना मुस्लिम धार्मिक अधिकारों को कमजोर किए। अदालत ने कहा कि काउंसिल की भूमिका मुख्यतः सलाहकारी है, जो आर्थिक और वित्तीय गतिविधियों को नियंत्रित करती है। अधिनियम में अनुसूचित जनजाति भूमि और पुरातात्विक स्मारकों पर वक्फ दावों को रोकने के प्रावधानों को अदालत ने संवैधानिक दायित्व मानते हुए बरकरार रखा। यह जनजातीय अधिकारों और भारत की सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करता है, साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता को बनाए रखता है। उदाहरण के लिए, पुरातत्व सर्वेक्षण ऑफ इंडिया को समानांतर प्रबंधन की समस्याओं से राहत मिलेगी। यह सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक संरक्षण को प्राथमिकता देता है। अदालत ने देखा कि वक्फ ट्रिब्यूनल को विवादों के निर्णय के लिए व्यापक शक्तियां हैं, और अपील हाई कोर्ट तक जा सकती है। इससे वक्फ ‘उपचारहीन’ नहीं रहते; बल्कि एक संरचित न्यायिक उपचार वैध हितों की रक्षा करता है। यह प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष है, जो पहले की अनियमितताओं को दूर करती है। फैसले में स्पष्ट किया गया कि अधिनियम केवल धर्मनिरपेक्ष प्रशासन (भूमि, संपत्ति, वित्त) को नियंत्रित करता है, न कि धार्मिक अनुष्ठानों को। इसलिए, अनुच्छेद 25 और 26 (धार्मिक स्वतंत्रता) बरकरार रहते हैं। यह संवैधानिक सिद्धांत से मेल खाता है कि धार्मिक दान के धर्मनिरपेक्ष पहलुओं को नियंत्रित किया जा सकता है। यह फैसला वक्फ संशोधन अधिनियम को एक सकारात्मक दिशा देता है, जो भ्रष्टाचार को रोकते हुए समुदाय की उन्नति सुनिश्चित करता है। महिलाओं और बच्चों के उत्तराधिकार अधिकारों की रक्षा, डिजिटल प्रक्रियाएं और सरकारी निगरानी से वक्फ संपत्तियां अधिक उत्पादक बनेंगी। निष्कर्षतः, यह अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट का फैसला राष्ट्रीय एकता और न्याय की दिशा में एक मील का पत्थर है, जो मुस्लिम समुदाय को सशक्त बनाएगा। नोट: यह लेख एशिया महाद्वीप के सामाजिक,आर्थिक मामलों के जानकार हैं।यह उनके निजी विचार हैं।  

भारत के राष्ट्रीय अध्यापक विनोबा भावे की जयंती पर विशेष लेख,पढ़ें विनायक से विनोबा तक का सफर

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आचार्य विनोबा भावे / जयंती पर विशेष आलेख जन्म : 11 सितंबर 1895 मृत्यु : 15 नवंबर 1982   आज भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और गांधीवादी नेता, संत विनोबा भावे को उनकी जयंती पर कोटि-कोटि नमन। इन्हें महात्मा गांधी का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माना जाता है, और भारत का राष्ट्रीय अध्यापक भी कहा जाता है, जिस कारण लोग संत विनोबा भावे को आचार्य कहकर भी संबोधित करते हैं।   आचार्य विनोबा भावे का जन्म 11 सितंबर, 1895 को महाराष्ट्र के कोलाबा ज़िले के गागोड गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम ‘विनायक नरहरि भावे’ था। उनके पिता का नाम नरहरि शंभू राव व माता का नाम रुक्मिणी देवी था। उनकी माता एक विदुषी महिला थी। आचार्य विनोबा भावे का ज़्यादातर समय धार्मिक कार्य व आध्यात्म में बीतता था। बचपन में वह अपनी मां से संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर और भगवत् गीता की कहानियां सुनते थे। इसका प्रभाव, उनके जीवन पर काफी गहरा पड़ा और इस वजह से उनका रुझान, आध्यात्म की तरफ बढ़ गया।   आगे चलकर विनोबा भावे ने रामायण, कुरान, बाइबल, गीता जैसे अनेक धार्मिक ग्रंथों का, गहन अध्ययन किया। वह एक कुशल राजनीतिज्ञ, और अर्थशास्त्री भी थे। उनका संपूर्ण जीवन साधू, सन्यासियों व तपस्वी की तरह बीता। इसी कारण, उनको संत कहकर संबोधित किया जाने लगा।   वह इंटर की परीक्षा देने के लिए 25 मार्च, 1916 को मुंबई जाने वाली रेलगाड़ी में सवार हुए, परंतु उस समय उनका मन स्थिर नहीं था। उन्हें लग रहा था कि वह जीवन में जो करना चाहते हैं, वह डिग्री द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। उनके जीवन का लक्ष्य, कुछ और ही था।   अभी उनकी गाड़ी सूरत पहुंची ही थी कि उनके मन में हलचल होने लगी। गृहस्थ जीवन या सन्यास, उनका मन दोनों में से किसी एक को नहीं चुन पा रहा था। तब थोड़ा विचार करने के बाद, उन्होंने संन्यासी बनने का निर्णय लिया, और हिमालय की ओर जाने वाली गाड़ी में सवार हो गए।   1916 में मात्र 21 वर्ष की आयु में, उन्होंने घर छोड़ दिया और साधु बनने के लिए, काशी नगरी पहुंच गए। वहां पहुंचकर, उन्होंने महान पंडितों के सानिध्य में, शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। उस समय, स्वतंत्रता आंदोलन भी अपनी चरम सीमा पर था।   महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटकर भारत आ गए थे। तब विनोबा जी ने अहमदाबाद के कोचरब आश्रम में, गांधी जी से पहली मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद उनका जीवन बदल गया और उन्होंने अपना पूरा जीवन गांधीजी को समर्पित कर दिया।   1921 से 1942 तक, वह अनेकों बार जेल गए। उन्होंने 1922 में नागपुर में सत्याग्रह किया, जिसके बाद उनको गिरफ्तार कर लिया गया। 1930 में विनोबा जी ने, गांधीजी के नेतृत्व में नमक सत्याग्रह को अंजाम दिया। 11 अक्टूबर, 1940 को प्रथम सत्याग्रही के रूप में गांधी जी ने विनोबा भावे को चुना।   समय के साथ गांधीजी और विनोबा जी के संबंध काफी मज़बूत होते गए। वह गांधी जी के आश्रम में रहने लगे, और वहां की गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे। आश्रम में ही उनको विनोबा नाम मिला।   विनोबा भावे ने गरीबी को खत्म करने के लिए, काम करना शुरू किया। 1950 में उन्होंने, सर्वोदय आंदोलन आरंभ किया। इसके तहत, उन्होंने ‘भूदान आंदोलन’ की शुरुआत की। 1951 में, जब वह आंध्रप्रदेश का दौरा कर रहे थे, तब उनकी मुलाकात, कुछ हरिजनों से हुई, जिन्होंने विनोबा जी से 80 एकड़ भूमि उपलब्ध कराने की विनती की।   विनोबा जी ने ज़मींदारों से आगे आकर अपनी ज़मीन दान करने का निवेदन किया, जिसका काफी ज़्यादा असर देखने को मिला और कई ज़मींदारों ने अपनी ज़मीनें दान में दीं। वहीं इस आंदोलन को पूरे देश में प्रोत्साहन मिला। 17 सितम्बर 1992 को हज़ारीबाग़ में इनके नाम पर “विनोबा भावे विश्वविद्यालय” इनके भूदान आंदोलन से प्राप्त जमीन पर स्थापित किया गया। विनोबा भावे जी को भूदान आंदोलन में सबसे ज्यादा जमीन हज़ारीबाग़ में मिली थी।   1959 में उन्होंने, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए, ब्रह्म विद्या मंदिर की स्थापना की। स्वराज शास्त्र, गीता प्रवचन और तीसरी शक्ति उनकी लिखी किताबों में से प्रमुख है।   नवंबर 1982 में विनोबा भावे गंभीर रूप से बीमार हो गए और उन्होंने अपने जीवन को त्यागने का फैसला किया। उन्होंने जैन धर्म के संलेखना-संथारा के रूप में भोजन और दवा को त्याग दिया और इच्छा पूर्वक मृत्यु को अपनाने का निर्णय लिया। 15 नवंबर, 1982 को विनोबा भावे ने दुनिया को अलविदा कह दिया।

21वीं सदी में सूफीवाद: भारत के हृदय का आध्यात्मिक धड़कन

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लेखक निर्मल कुमार हमारी अति-जुड़ी हुई दुनिया की भागदौड़ में, जहाँ एल्गोरिदम इच्छाओं को निर्देशित करते हैं और पहचानों को लेकर संघर्ष छिड़ा हुआ है, प्राचीन आध्यात्मिक मार्गों की ओर मुड़ना एक गहरी ज़मीनी पहचान है। इस्लाम की रहस्यमयी धड़कन, सूफीवाद, आज अतीत के अवशेष के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत ज्ञान के रूप में गूंजता है जो सीधे हमारी खंडित आत्माओं से बात करता है। यह बात भारत से ज़्यादा कहीं और स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जो वैश्विक सूफीवाद का केंद्र है, जहाँ यह एक विविध और अक्सर अशांत समाज के ताने-बाने में गहराई से समाया हुआ है। सूफीवाद की शिक्षाएँ न केवल सांत्वना प्रदान करती हैं, बल्कि समकालीन जीवन की अराजकता से निपटने के लिए एक क्रांतिकारी खाका भी प्रस्तुत करती हैं। यह एक ऐसी आध्यात्मिकता है जो हठधर्मिता से परे है, और प्रेम, आंतरिक शांति और मानवीय जुड़ाव पर ज़ोर देती है, ऐसे युग में जहाँ इन तीनों की सख्त ज़रूरत है।   भारत में सूफीवाद की यात्रा सदियों पहले शुरू हुई थी, जो मध्यकाल में फारसी रहस्यवाद की हवाओं के साथ आगे बढ़ी। भौतिक अतिरेक और सामाजिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रारंभिक इस्लामी जगत में उत्पन्न सूफीवाद ने तप, ध्यान और कविता के माध्यम से ईश्वर से सीधा संवाद स्थापित करने का प्रयास किया। जब यह 12वीं शताब्दी के आसपास उपमहाद्वीप में पहुँचा, तो इसने स्वयं को थोपा नहीं; बल्कि, हिंदू भक्ति और बौद्ध चिंतन जैसी स्थानीय परंपराओं के साथ घुल-मिलकर, इसे अपनाया। यह समन्वयवाद कोई संयोग नहीं था। सूफी संतों, या पीरों, ने भारत के सामाजिक-धार्मिक और आध्यात्मिक परिदृश्य में ईश्वर की सार्वभौमिक खोज को पहचाना। इस सम्मिश्रण का प्रतीक अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती द्वारा स्थापित चिश्ती सम्प्रदाय था। ख्वाजा भारत में किसी विजेता या किसी अभियान के सदस्य के रूप में नहीं, बल्कि एक साधक और आरोग्यदाता के रूप में आए थे, और उन्होंने एक ऐसी दरगाह की स्थापना की जिसने सार्वभौमिक प्रेम और मानवता की सेवा के अपने संदेश से हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों को समान रूप से आकर्षित किया। उनकी शिक्षाओं ने फ़ना (अहंकार का विनाश) और बक़ा (ईश्वर में अस्तित्व) की अवधारणाओं को लोकप्रिय बनाया, तथा अनुयायियों से जाति, पंथ, रंग या विश्वास प्रणाली की परवाह किए बिना प्रत्येक प्राणी में ईश्वर को देखने का आग्रह किया।   अन्य विभूतियों ने भी इसी दृष्टिकोण का अनुसरण किया, और प्रत्येक ने इसमें नई परतें जोड़ीं जिससे भारत धार्मिक सहिष्णुता और भाईचारे का एक समृद्ध ताना-बाना बन गया। दिल्ली में चिश्ती उत्तराधिकारी निज़ामुद्दीन औलिया ने दृष्टांतों, संगीत और भक्ति के माध्यम से शिक्षा दी और एक ऐसा वातावरण तैयार किया जहाँ गरीब और शक्तिशाली सभी आध्यात्मिक समानता में घुल-मिल गए। उन्होंने अपने शिष्यों को ईश्वर की खोज करने और स्वयं को उसका जीवंत अवतार बनाने की शिक्षा दी, क्योंकि ईश्वर का प्रकाश प्रत्येक उत्कृष्ट रचना में चमकता है। अमीर खुसरो ने कव्वाली का आविष्कार किया, जो एक ऐसा भावपूर्ण भक्ति संगीत है जो फ़ारसी कविता को भारतीय रागों के साथ मिलाता है और अमूर्त धर्मशास्त्र को परमानंदपूर्ण अनुभव में बदल देता है। पंजाब में बाबा फ़रीद ने अपनी कविता के माध्यम से सिख गुरु ग्रंथ साहिब को प्रभावित किया और इस्लाम को उभरते सिख धर्म के साथ मिश्रित किया। ये संत अलग-थलग तपस्वी नहीं थे; वे समाज से जुड़े, शासकों को सलाह देते, भूखों को भोजन कराते और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देते थे। उन्होंने सामाजिक निर्भरता, विश्वास और परस्पर निर्भरता की शिक्षा दी – ऐसे मूल्य जिन्हें समग्र रूप से मानवता ने काफी हद तक खो दिया है। सूफीवाद का सबसे प्रभावशाली प्रभाव यह था कि इसने इस्लामी रूढ़िवाद के कठोर पहलुओं को नरम किया और अंतर्धार्मिक संवाद, सद्भाव और सह-अस्तित्व को बढ़ावा दिया। इसने एक ऐसी मिश्रित संस्कृति को जन्म दिया जिसमें एक हिंदू उपचार के लिए सूफी दरगाह में प्रार्थना कर सकता था, जबकि एक मुसलमान एकता के वेदान्तिक विचारों से प्रेरणा ले सकता था।समकालीन समय में, भारतीय सूफी ज्ञान हमारे विचारों और श्रीनगर, दिल्ली, अजमेर, लखनऊ और मुंबई जैसे शहरों में रचा-बसा, अनुकूलित और व्यावहारिक लगता है। ज़रूरत इस बात की है कि हम अस्तित्वगत वियोग, असामंजस्य, विभाजनकारी आख्यानों, डिजिटल अलगाव और भौतिकवाद से दूर हटें। इन मुद्दों ने हमारे उद्देश्य की भावना को कुचल दिया है, लोगों को वैचारिक रूप से विभाजित किया है और हिंसा और संशयवाद को बढ़ावा दिया है। सूफीवाद को सभी प्राणियों के प्रति सार्वभौमिक प्रेम और करुणा, जिसे धार्मिक या सामाजिक भेदों के बावजूद ईश्वर के प्रतिबिंब के रूप में देखा जाता है। यह कर्मकांडीय मतभेदों के बजाय साझा आध्यात्मिक अनुभवों पर ज़ोर देता है। सूफी संतों ने सिखाया कि ईश्वर के प्रति भक्ति का सर्वोच्च रूप मानव जाति, विशेष रूप से गरीबों और दलितों की सेवा करना है। यह सिद्धांत दान के व्यावहारिक कार्यों, भूखों को भोजन कराने, पीड़ितों को सांत्वना प्रदान करने और हाशिए पर पड़े समुदायों के उत्थान में परिवर्तित होता है। ज़िक्र (ईश्वर का स्मरण) और समा (संगीतमय ध्यान) के माध्यम से आंतरिक शांति की खोज, भारत की सांस्कृतिक विरासत के साथ मिलकर, एक समन्वयात्मक वातावरण का निर्माण करती है और एक साझा सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा देती है। अजमेर शरीफ़ या मुंबई के हाजी अली जैसी दरगाहों पर होने वाले उत्सव हर साल लाखों लोगों को आकर्षित करते हैं, न केवल अनुष्ठानों के लिए, बल्कि सामुदायिक उपचार के लिए भी – ये ऐसे स्थान हैं जहाँ विविध समूह साझा मानवता में सांत्वना पाते हैं।   यह प्रासंगिकता व्यापक सामाजिक मुद्दों तक फैली हुई है। सूफीवाद का सुलह-ए-कुल (सार्वभौमिक शांति) पर जोर, ऐतिहासिक रूप से विभाजन को पाटता रहा है, और आज यह अतिवाद के खिलाफ एक दीवार के रूप में खड़ा है। बढ़ते इस्लामोफोबिया और सांप्रदायिक तनावों से जूझ रहे भारत में, सूफी नेता अंतरधार्मिक पहल को बढ़ावा देते हैं, इस शिक्षा को दोहराते हुए कि सच्ची भक्ति सीमाओं को मिटा देती है। उदाहरण के लिए, अखिल भारतीय सूफी परिषद सक्रिय रूप से कट्टरपंथी आख्यानों का विरोध करती है, इस सिद्धांत पर आधारित सहिष्णु इस्लाम की वकालत करती है कि एक व्यक्ति की हत्या करना पूरी मानवता की हत्या करने के समान है। वैश्विक स्तर पर, भारतीय सूफीवाद धर्म या संप्रदायवाद के नाम पर अतिवाद, कट्टरपंथ और संघर्षों को अस्वीकार करता है। जलवायु चिंता … Read more

“प्रत्येक भारतीय, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण भारतीय है” – मौलाना आज़ाद

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“प्रत्येक भारतीय, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण भारतीय है” – मौलाना आजाद भारतीय पहचान और राष्ट्रवाद से जुड़े गहन विमर्श में, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के शब्द, विशेष रूप से उनकी यह प्रभावशाली घोषणा, स्थायी प्रासंगिकता के साथ गूंजती है: “प्रत्येक भारतीय, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण, एक भारतीय है।” भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर दिया गया यह प्रभावशाली कथन, राजनीतिक बयानबाजी से ऊपर उठकर, एक बहुलवादी और सामंजस्यपूर्ण राष्ट्र के लिए एक बुनियादी सिद्धांत को स्पष्ट करता है।   स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रखर नेता और गहन इस्लामी अध्ययन के विद्वान, उन्होंने भारत का एक ऐसा दृष्टिकोण प्रस्तुत किया जहाँ धार्मिक पहचान, महत्वपूर्ण होते हुए भी, साझा भारतीय राष्ट्रवाद के सर्वव्यापी ध्वज के अंतर्गत समाहित थी। उन्होंने उस समय के अलगाववादी आख्यानों, विशेषकर द्वि-राष्ट्र सिद्धांत, का दृढ़ता से खंडन किया, जिसके बारे में उनका मानना था कि यह भारत की साझी संस्कृति के मूल ढांचे के लिए खतरा है। उन्होंने तर्क दिया कि सदियों के सह-अस्तित्व और साझा अनुभवों ने भारत में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक अटूट बंधन का निर्माण किया है, जिसने एक साझा भाषा, साहित्य, कला, परंपराओं और यहाँ तक कि दैनिक जीवन को भी आकार दिया है। उनका मानना था कि यह साझा विरासत ही भारतीय राष्ट्रवाद का सच्चा आधार है, जो संकीर्ण धार्मिक या सांस्कृतिक भेदभावों से कहीं आगे है। हिंदू-मुस्लिम एकता में आज़ाद का विश्वास कोई राजनीतिक स्वार्थ नहीं था, बल्कि इस्लाम की उनकी गहन धार्मिक समझ में गहराई से निहित था। उन्होंने इस्लाम की सार्वभौमिक भावना और इस्लाम के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया। धर्म (दीन) और कर्मकांडों व सामाजिक कानूनों (शरिया) में उसकी बाहरी अभिव्यक्तियाँ। उनके लिए, इस्लाम सहित सभी धर्मों का सार सार्वभौमिक सत्य, एकेश्वरवाद, न्याय, करुणा और धार्मिकता की खोज में निहित है। उनका मानना था कि ये मूल्य अंतर्धार्मिक सद्भाव की नींव रखते हैं। उन्होंने इस दृष्टिकोण को कुरान में ही प्रमाणित पाया, जहाँ उन्होंने इसकी आयतों की व्याख्या धार्मिक प्रथाओं की स्पष्ट विविधता के पीछे ईश्वरीय उद्देश्य की एकता पर ज़ोर देने के लिए की।   इस धार्मिक बहुलवाद ने आज़ाद को एक समावेशी भारतीय पहचान की वकालत करने में सक्षम बनाया, जहाँ लोग गर्व से अपनी धार्मिक मान्यताओं को अपना सकें और साथ ही खुद को भारतीय भी मान सकें। उन्होंने इसे भारत के ऐतिहासिक विकास का स्वाभाविक परिणाम माना, जहाँ विविध धार्मिक समुदायों ने एक-दूसरे की संस्कृतियों को समृद्ध किया और एक अद्वितीय समन्वयकारी सभ्यता में योगदान दिया। उनकी दृष्टि उन लोगों से बिल्कुल अलग थी जो भारतीय राष्ट्रवाद को संकीर्ण धार्मिक दृष्टिकोण से परिभाषित करना चाहते थे, चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम।   आज़ादी और दुखद विभाजन के बाद भी, जिसका उन्होंने कड़ा विरोध किया था, आज़ाद एक अखंड और धर्मनिरपेक्ष भारत के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर अडिग रहे। भारत के पहले शिक्षा मंत्री के रूप में, उन्होंने देश की शिक्षा नीतियों पर गहरा प्रभाव डाला और प्रगति, बहुलवाद और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए डिज़ाइन की गई एक आधुनिक प्रणाली की नींव रखी। उन्होंने सार्वभौमिक शिक्षा, समान अवसर और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का समर्थन किया और एक जागरूक और सहिष्णु नागरिक वर्ग के निर्माण में इनके महत्व को पहचाना। उन्होंने वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति को बढ़ावा देने के साथ-साथ भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में शिक्षा की भूमिका पर ज़ोर दिया। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और विभिन्न सांस्कृतिक अकादमियों जैसी संस्थाओं की स्थापना ने एक जीवंत और दूरदर्शी राष्ट्र के उनके दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित किया।   आज़ाद का संदेश आज भी प्रासंगिक है। बढ़ते सांप्रदायिक तनाव और राष्ट्रवाद पर बहस के दौर में, एकता और विविधता के सम्मान का उनका आह्वान, एक बहुलवादी समाज के रूप में भारत की ताकत का मार्गदर्शक है। उनके विचारों से दोबारा जुड़ने से एक विविध राष्ट्र में पहचान की जटिलताओं से निपटने और भारत के स्वतंत्रता संग्राम की विशेषता रही एकता और सद्भाव की भावना को फिर से जगाने में मददगार सलाह मिल सकती है। उनकी विरासत इस विश्वास में अडिग है कि भारत का भविष्य धर्मनिरपेक्षता, समावेशिता और लोकतंत्र को कायम रखने में निहित है – जहाँ विविधता में एकता केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक जीवंत वास्तविकता है। लेखक – निर्मल कुमार  (लेखक आर्थिक सामाजिक मामलों के जानकार हैं।यह उनके निजी विचार हैं।)

जाति जनगणना: भारत में सामाजिक न्याय को पुनर्परिभाषित करना

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निर्मल कुमार (लेखक आर्थिक,सामाजिक मामलों के जानकार हैं।समसामयिक घटनाक्रम पर उनके लेख सराहे जाते हैं।यह उनके निजी विचार हैं।) एक ऐतिहासिक कदम के तहत, भारत सरकार ने आगामी राष्ट्रीय जनगणना में जाति गणना को शामिल करने को मंजूरी दे दी है, जो स्वतंत्रता के बाद बंद कर दी गई एक प्रथा की महत्वपूर्ण वापसी को दर्शाता है। समाज सुधारकों, विद्वानों और नीति निर्माताओं द्वारा लंबे समय से मांगे जा रहे इस निर्णय को देश में समानता को बढ़ावा देने और सामाजिक न्याय की जड़ों को गहरा करने की दिशा में एक परिवर्तनकारी कदम के रूप में सराहा जा रहा है। ऐसे समय में जब समावेशी विकास राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र है, जाति जनगणना, डेटा-संचालित नीति निर्माण के एक युग की शुरुआत करने का वादा करती है जो वास्तव में भारत के जटिल सामाजिक ताने-बाने को दर्शाती है। जाति जनगणना राष्ट्रीय गणना अभ्यास के हिस्से के रूप में व्यक्ति की जातिगत पहचान पर डेटा का व्यवस्थित संग्रह है। इसका लक्ष्य विभिन्न जाति समूहों के सामाजिक-आर्थिक वितरण की सटीक और विस्तृत समझ हासिल करना है, जिससे सरकार को लक्षित नीतियों को तैयार करने में मदद मिले जो सबसे वंचितों का उत्थान करें। ऐतिहासिक रूप से, 1931 तक औपनिवेशिक प्रशासन द्वारा जाति के आंकड़े नियमित रूप से एकत्र किए जाते थे। हालाँकि, स्वतंत्रता के बाद, जाति की गणना अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) तक सीमित थी, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और अन्य को व्यापक राष्ट्रीय डेटासेट से बाहर रखा गया था। इस अंतर को पाटने का आखिरी प्रयास, 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (एसईसीसी) विसंगतियों और डेटा की अविश्वसनीयता से प्रभावित हुई थी, जिसका मुख्य कारण एक मानकीकृत जाति सूची का अभाव था। भारत ने ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े समुदायों के उत्थान के लिए संवैधानिक प्रतिबद्धताएं की हैं, लेकिन जाति पर विश्वसनीय डेटा के बिना जनसांख्यिकी के अनुसार, सकारात्मक कार्रवाई की नीतियाँ अक्सर अंधेरे में काम करती हैं। वर्तमान में, ओबीसी के लिए आरक्षण नीतियाँ 1931 की जनगणना के अनुमानों पर आधारित हैं, जिसमें ओबीसी की आबादी 52% आंकी गई थी। हालाँकि, बिहार के 2023 जाति सर्वेक्षण जैसे राज्य-स्तरीय सर्वेक्षणों से पता चला है कि ओबीसी और अत्यंत पिछड़े वर्ग राज्य की आबादी का 63% से अधिक हिस्सा हैं। ऐसे निष्कर्ष कल्याणकारी लाभों और आरक्षण के समान वितरण को सुनिश्चित करने के लिए एक अद्यतन राष्ट्रीय जाति डेटाबेस की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करते हैं। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने एसईसीसी 2011 की खामियों को दूर करने के लिए एक परिष्कृत गणना तंत्र की जोरदार वकालत की है, जहां ओपन-एंडेड जाति रिपोर्टिंग के कारण 46 लाख से अधिक अलग-अलग प्रविष्टियां और 8 करोड़ से अधिक त्रुटियां हुईं। आगामी जाति जनगणना का उद्देश्य अधिक संरचित और सत्यापन योग्य डेटा संग्रह प्रक्रिया के माध्यम से इन चुनौतियों को दूर करना है। पहचान सत्यापन के लिए आधार को एकीकृत करना, शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना और छंटाई और वर्गीकरण के लिए एआई उपकरणों का लाभ उठाना अभ्यास की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए प्रस्तावित उपायों में से हैं। जाति जनगणना सिर्फ़ एक संख्यात्मक अभ्यास से कहीं ज़्यादा है, इसका सामाजिक समानता और शासन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। विभिन्न समुदायों के वास्तविक जनसांख्यिकीय प्रसार को उजागर करके, यह पिछड़े समूहों के उप-वर्गीकरण की अनुमति देता है, जैसे कि न्यायमूर्ति रोहिणी आयोग द्वारा अनुशंसित ओबीसी के भीतर। यह सुनिश्चित करता है कि आरक्षण का लाभ सबसे वंचितों तक पहुँचे, न कि प्रमुख उप-समूहों द्वारा एकाधिकार किया जाए। इसी तरह, सटीक जाति डेटा राजनीतिक प्रतिनिधित्व को संतुलित करने, ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े लोगों को आवाज़ देकर लोकतंत्र को मज़बूत करने में सहायक हो सकता है। इस कदम के महत्व को भारत के संवैधानिक दृष्टिकोण के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। अनुच्छेद 340 राज्य को पिछड़े वर्गों के कल्याण की पहचान करने और उन्हें बढ़ावा देने का अधिकार देता है, और जाति जनगणना इस जनादेश के अनुरूप है। यह अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 के लक्ष्यों को प्रतिध्वनित करता है, जो भेदभाव को प्रतिबंधित करते हैं और अवसर की समानता की गारंटी देते हैं। हालांकि, विश्वसनीय डेटा के बिना, इन संवैधानिक आदर्शों को प्रतीकात्मक इशारों में कमजोर किए जाने का जोखिम है। हालांकि इस बात पर चिंता जताई गई है कि जाति जनगणना जातिगत पहचान को मजबूत कर सकती है या राजनीतिक शोषण का साधन बन सकती है, लेकिन पारदर्शी, नैतिक और विवेकपूर्ण कार्यान्वयन के माध्यम से ऐसे जोखिमों को कम किया जा सकता है। जाति जनगणना को राजनीतिक के बजाय विकास के साधन के रूप में मानना इसे समावेशी विकास के उत्प्रेरक में बदल सकता है। निगरानी तंत्र, कानूनी सुरक्षा उपाय और नीति मूल्यांकन अवश्य होने चाहिए।यह सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत रूप दिया गया है कि डेटा केवल सामाजिक न्याय के लिए काम करे न कि चुनावी अंकगणित के लिए। इसके अलावा, आय स्तर, शिक्षा और बहुआयामी गरीबी जैसे सामाजिक-आर्थिक संकेतकों के साथ जाति के आंकड़ों को पूरक बनाने से समग्र कल्याण कार्यक्रमों को तैयार करने में मदद मिल सकती है। यह क्षेत्रीय असमानताओं को संबोधित करने और स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्रों में अंतराल को पाटने के लिए अनुकूलित हस्तक्षेप की अनुमति देता है जहां जाति-आधारित असमानताएं बनी रहती हैं। निष्कर्ष रूप में, जाति जनगणना कराने का निर्णय भारत की अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण समाज की ओर यात्रा में एक महत्वपूर्ण क्षण है। यह सकारात्मक कार्रवाई को फिर से मापने, कल्याण लक्ष्यीकरण को परिष्कृत करने और हमारे संविधान में निहित समानता के प्रति प्रतिबद्धता को पुनर्जीवित करने का अवसर है। इस डेटा-संचालित दृष्टिकोण को ईमानदारी और सावधानी से अपनाकर, भारत संरचनात्मक असमानताओं को खत्म करने और एक ऐसे राष्ट्र के निर्माण की दिशा में एक निर्णायक कदम उठा सकता है, जहाँ प्रत्येक नागरिक की प्रगति में समान हिस्सेदारी हो।

समसामयिक लेख : झूठ की क़ीमत: ग़लत जानकारी का प्रभाव और समाज पर उसका संकट

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निर्मल कुमार आज की डिजिटल दुनिया में, जहां जानकारी एक क्लिक में फैल जाती है, वहाँ गलत जानकारी (misinformation) का प्रसार एक वैश्विक संकट बन चुका है। फोटोशॉप की गई तस्वीरें, झूठी खबरें और षड्यंत्र के सिद्धांत — इन सबने न केवल जनविश्वास को चोट पहुंचाई है, बल्कि लोगों की जान खतरे में डाली है और सामाजिक स्थिरता को भी गंभीर नुकसान पहुँचाया है। ये झूठ जितनी तेजी से फैलते हैं, उन्हें उतनी ही मुश्किल से सुधारा जा सकता है। लोकतांत्रिक देशों में यह गलत जानकारी चुनाव परिणामों की वैधता पर सवाल उठाने और हिंसा भड़काने का जरिया बन जाती है, जबकि अधिनायकवादी शासन इस जानकारी को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं — असहमति को दबाने और जनता की सोच को नियंत्रित करने के लिए। इस पूरी प्रक्रिया में सच सबसे बड़ा शिकार बन जाता है। गलत जानकारी कई स्रोतों से जन्म ले सकती है। कई बार यह अज्ञानता, अधूरी जानकारी या गलतफहमी का परिणाम होती है। लेकिन वर्तमान समय में अधिकतर झूठ योजनाबद्ध ढंग से फैलाए जाते हैं — सोच-समझकर, किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए। राजनीतिक दल इसका उपयोग जनमत को मोड़ने या विरोधियों को बदनाम करने के लिए करते हैं। विदेशी ताकतें इसे दूसरे देशों को अस्थिर करने के लिए इस्तेमाल करती हैं। कुछ प्रभावशाली व्यक्ति, स्वयंभू विशेषज्ञ या सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर अपने प्रसिद्धि, प्रभाव या आर्थिक लाभ के लिए झूठी जानकारी फैलाते हैं। चाहे मंशा कुछ भी हो, परिणाम एक जैसे होते हैं — सच्चाई का क्षरण, समाज का विभाजन और लोकतंत्र की नींव पर प्रहार। भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद देशभर में झूठी खबरों का सिलसिला चल पड़ा। सोशल मीडिया, यूट्यूब चैनलों, कुछ तथाकथित समाचार पोर्टलों और प्रभावशाली व्यक्तियों द्वारा फैलाया गया यह भ्रम था कि देश में मुस्लिमों और कश्मीरी नागरिकों पर बदले की भावना से हमले किए जा रहे हैं। कुछ वीडियो और तस्वीरें वायरल की गईं, जिनमें मारपीट या हमले के दृश्य थे, और उन्हें हालिया आतंकवादी घटना से जोड़ दिया गया। लेकिन जब इन दावों की गहराई से पड़ताल की गई — कई स्वतंत्र फैक्ट-चेकिंग प्लेटफ़ॉर्म्स और पुलिस रिपोर्ट्स द्वारा — तो ज़्यादातर घटनाएं या तो पुरानी निकलीं, या उनका आतंकवाद से कोई संबंध नहीं था। कुछ मामले निजी दुश्मनी, संपत्ति विवाद या सामान्य आपराधिक गतिविधियों से जुड़े हुए थे। इन झूठी खबरों ने भारत की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नुकसान पहुंचाया और आंतरिक सामाजिक तनाव को हवा दी। इस तरह की गलत जानकारी न केवल अफवाह फैलाती है, बल्कि समाज में संदेह और नफरत का ज़हर भी घोलती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जानबूझकर फैलाए गए झूठ के बीच की रेखा बहुत बारीक होती है। लेकिन जब कोई व्यक्ति या संस्था बार-बार झूठी जानकारी फैलाए, और उसके कारण समाज में भय या हिंसा उत्पन्न हो, तो उनकी जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए। ऐसे लोगों को सामाजिक और कानूनी स्तर पर ज़िम्मेदार ठहराया जाना ज़रूरी है। सरकार और न्यायपालिका को भी चाहिए कि वे जानबूझकर फैलाई गई गलत जानकारी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करें, विशेषकर जब वह राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाए। परंतु यह कार्रवाई विचारों की अभिव्यक्ति को दबाने के रूप में नहीं, बल्कि हानिकारक आचरण को रोकने के रूप में की जानी चाहिए। विचार का विरोध तब आवश्यक है जब वह विचार किसी व्यक्ति या समुदाय के विरुद्ध नफरत फैलाता है या हिंसा को प्रोत्साहित करता है। फर्जी खबरों का खंडन करना तो आवश्यक है ही, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है उन व्यक्तियों और संस्थाओं की पहचान करना जो बार-बार समाज को भ्रमित करने का प्रयास करते हैं। जब हम ऐसे झूठ फैलाने वालों को चुनौती देते हैं, तब हम सिर्फ तथ्यों की नहीं, बल्कि लोकतंत्र, सहिष्णुता और सत्यनिष्ठा की रक्षा करते हैं। झूठे विमर्शों से जूझना आज एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी बन चुका है। तकनीक के इस युग में जहां एक झूठ लाखों लोगों तक मिनटों में पहुंच सकता है, वहीं सच की रक्षा करने के लिए जागरूकता, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता की भी उतनी ही आवश्यकता है। आज जब भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में खड़ा है, तब यह और अधिक आवश्यक हो गया है कि हम सत्य के पक्ष में खड़े हों। झूठ से लड़ना केवल एक सूचना युद्ध नहीं, यह संविधान, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता की रक्षा का कार्य है । (लेखक निर्मल कुमार वैश्विक आर्थिक व सामाजिक मामलों के जानकर हैं।यह उनके निजी विचार हैं।)

आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता: पहलगाम की त्रासदी और भारत की इंसानियत

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निर्मल कुमार 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुआ आतंकवादी हमला न केवल एक भयावह त्रासदी है, बल्कि मानवता के खिलाफ किया गया एक गहन अपराध भी है। इस हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की जान चली गई और 20 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए। आतंकियों ने सेना की वर्दी पहनकर हिन्दू तीर्थयात्रियों को निशाना बनाया और पीड़ितों की पहचान धर्म पूछकर की। यह घटना केवल एक समुदाय पर हमला नहीं थी, बल्कि पूरे भारत की साझा संस्कृति, भाईचारे और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर किया गया प्रहार थी। इस कायराना हरकत ने न केवल भारत की एकता को चुनौती दी, बल्कि इस्लाम जैसे शांतिप्रिय धर्म की भी गलत तस्वीर प्रस्तुत की। यह समझना बेहद आवश्यक है कि आतंकवादियों की इस नृशंसता का इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है। क़ुरान स्पष्ट रूप से कहता है — “जो लोग तुमसे लड़ते हैं, उनसे तुम भी अल्लाह की राह में लड़ो, लेकिन ज़्यादती मत करो, निस्संदेह अल्लाह ज़्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता” (क़ुरान 2:190)। इस्लाम में निर्दोषों की हत्या को सबसे बड़ा गुनाह माना गया है — चाहे वो हिन्दू हो, मुस्लिम, सिख, ईसाई या किसी भी अन्य धर्म के अनुयायी। भारत में 17 करोड़ से अधिक मुस्लिम नागरिक रहते हैं — वे कोई बाहरी नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का अभिन्न हिस्सा हैं। उन्होंने बार-बार आतंकवाद के खिलाफ आवाज़ उठाई है, भाईचारे को बढ़ावा दिया है और राष्ट्रभक्ति की मिसाल पेश की है। पहलगाम हमले के दौरान कश्मीरी मुसलमानों का व्यवहार इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है। जब गोलियों की गूंज और चीख-पुकार के बीच आतंकियों ने धर्म देखकर लोगों की जान ली, तब कई स्थानीय मुसलमान युवकों ने अपनी जान की परवाह किए बिना घायल तीर्थयात्रियों की मदद की। घायलों को उठाकर अस्पताल पहुँचाने से लेकर, रक्तदान करने और उन्हें ढाढ़स बंधाने तक, हर कदम पर उन्होंने दिखा दिया कि इंसानियत किसी मज़हब की मोहताज नहीं होती। कुछ मामलों में तो स्थानीय लोगों ने अपने घरों को अस्थायी चिकित्सा केंद्र बना दिया, ताकि समय पर उपचार मिल सके। उन्होंने साबित किया कि कश्मीर का दिल अमन के लिए धड़कता है, और असली कश्मीरी आतिथ्य कभी मर नहीं सकता। देश की प्रमुख मुस्लिम धार्मिक संस्थाओं और नेताओं ने भी इस आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की है। ऑल इंडिया इमाम ऑर्गेनाइजेशन के प्रमुख इमाम उमर अहमद इलियासी ने देश भर की 5.5 लाख मस्जिदों में आतंकवाद के खिलाफ विशेष दुआओं की अपील की और साफ कहा कि जो निर्दोषों की हत्या करते हैं, उन्हें भारत की धरती पर दफनाने का कोई हक नहीं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मौलाना अर्शद मदनी ने इन आतंकियों को “दरिंदे” कहा, जबकि जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के प्रमुख सैयद सादतुल्लाह हुसैनी ने पीड़ितों को जल्द न्याय दिलाने की मांग की। हमारे संविधान की आत्मा धर्मनिरपेक्षता है, और भारत की असली ताक़त इसकी विविधता में निहित है। यह ज़रूरी है कि हम इस घटना को बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के नजरिए से न देखें। आतंकवाद न किसी धर्म को मानता है, न किसी राष्ट्र को। जो लोग निहत्थे लोगों की हत्या करते हैं, उनकी तुलना किसी धर्म के अनुयायियों से करना सरासर नाइंसाफी है। क़ुरान की आयतें आतंकियों के दावों को सिरे से खारिज करती हैं: “धर्म के मामले में कोई ज़बरदस्ती नहीं है” (क़ुरान 2:256) और “दुश्मनी के बावजूद भी इंसाफ करो, यही अल्लाह का तक़वा है” (क़ुरान 5:8)। आज जब कुछ तत्व नफरत फैलाकर देश को बांटना चाहते हैं, तब भारत के नागरिकों को पहले से कहीं ज़्यादा एकजुट होने की आवश्यकता है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कुछ आतंकवादियों की कायरता के कारण करोड़ों भारतीय मुस्लिमों को शक की नजर से न देखा जाए। हमें ये समझना होगा कि आतंकवादियों की कोई कौम नहीं होती, उनका कोई धर्म नहीं होता — वे केवल हत्यारे होते हैं। हमारा जवाब नफरत नहीं, इंसानियत होनी चाहिए। पहलगाम का रक्तपात हमें डराने के लिए था, लेकिन हमें और मज़बूती से यह दिखाना होगा कि भारत न झुकता है, न बंटता है। हर वह भारतीय जो अमन, इंसाफ और भाईचारे में विश्वास करता है — वही सच्चा देशभक्त है। भारत की आत्मा एक है, और आतंकवाद उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। पहलगाम के घाव अभी भरे नहीं हैं, लेकिन वहां दिखी इंसानियत की रोशनी हमें अंधेरे से बाहर निकालने की ताक़त देती है। इस मुश्किल घड़ी में यह आवश्यक है कि हम धर्म के नाम पर किसी भी नफरत को अपने बीच जगह न दें। अंत में हम सभी को यह याद रखना होगा: आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। (लेखक निर्मल कुमार आर्थिक व सामाजिक मुद्दों के स्तंभकार हैं।यह उनके निजी विचार हैं।)