लोकतांत्रिक व्यवस्था में मुस्लिम राष्ट्रवाद का दुष्प्रभाव: हिज्ब-उत-तहरीर

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निर्मल कुमार हिज्ब-उत-तहरीर (Hizb-ut-Tahrir) एक अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संगठन है, जिसका उद्देश्य वैश्विक इस्लामी ख़िलाफ़त की स्थापना करना है। 1953 में फ़िलिस्तीन के तकीउद्दीन नबहानी द्वारा स्थापित इस संगठन का दावा है कि यह राजनीतिक और वैचारिक तरीकों से इस्लामी शासन स्थापित करेगा। हालाँकि, इसके उद्देश्यों और कार्यप्रणाली ने इसे दुनिया के कई देशों में विवादास्पद बना दिया है। भारत सहित कई देशों ने इसे सुरक्षा के लिए गंभीर ख़तरा मानते हुए प्रतिबंधित कर दिया है। हिज्ब-उत-तहरीर के भारत में सक्रिय होने की खबरों ने सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया है, और इसे हाल ही में भारत सरकार ने आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया। भारत में हिज्ब-उत-तहरीर की चुनौतियाँ हिज्ब-उत-तहरीर का वैचारिक उद्देश्य भारत की धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था के सीधे विरोध में है। यह संगठन संविधान को चुनौती देते हुए जिहाद के माध्यम से इस्लामी ख़िलाफ़त स्थापित करना चाहता है। भारत में सुरक्षा एजेंसियों ने हिज्ब-उत-तहरीर पर युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और संविधान-विरोधी विचारधारा फैलाने का आरोप लगाया है। यह संगठन अपनी गुप्त गतिविधियों से समाज में विघटन और अलगाववाद को बढ़ावा देता है। इसके कार्य न केवल भारतीय संविधान बल्कि इस्लामी शिक्षाओं के भी विरुद्ध हैं। इस्लामी सिद्धांत और हिज्ब-उत-तहरीर की विचारधारा इस्लाम न्याय, शांति और व्यवस्था को प्राथमिकता देता है। पैगंबर मोहम्मद ने सामाजिक विघटन (फ़ितना) और अराजकता से बचने का संदेश दिया। किसी भी वैध इस्लामी शासन को सामुदायिक समर्थन और न्यायपूर्ण प्रक्रिया के माध्यम से स्थापित किया जाना चाहिए। बिना वैध प्रक्रिया के शासन का आह्वान करना इस्लामी शिक्षाओं के विरुद्ध है। हिज्ब-उत-तहरीर का विचारधारा के नाम पर युवाओं को उकसाना, अराजकता फैलाना और सामाजिक शांति को भंग करना, इस्लामी उसूलों के बिल्कुल विपरीत है। इस्लाम में व्यवस्था का महत्व सर्वोपरि है। यह समाज में एकता और न्याय सुनिश्चित करने पर बल देता है। पैगंबर ने स्पष्ट कहा है कि मुस्लिम समुदाय को स्थापित व्यवस्था के तहत शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में विश्वास रखना चाहिए। विद्रोह या अराजकता इस्लाम में निषिद्ध है क्योंकि यह समाज को विखंडित करता है और शांति को खतरे में डालता है। हिज्ब-उत-तहरीर जैसी विचारधाराएँ इन इस्लामी सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं और मुसलमानों को गुमराह करती हैं। मुस्लिम युवाओं पर हिज्ब-उत-तहरीर का प्रभाव हिज्ब-उत-तहरीर की सबसे चिंताजनक पहलुओं में से एक है युवा मुसलमानों को भ्रमित करना। एक काल्पनिक ख़िलाफ़त का वादा कर यह संगठन उन्हें कट्टरपंथ की ओर धकेलता है। कई बार युवा इसके प्रभाव में आकर ऐसी गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं जो भारतीय कानून के तहत अपराध हैं। परिणामस्वरूप, वे गिरफ़्तारी, जेल, और समाज से अलगाव का शिकार हो जाते हैं। उनका भविष्य, जो समाज और समुदाय के निर्माण में योगदान दे सकता था, कट्टरपंथ और अलगाव में उलझकर बर्बाद हो जाता है। यह जरूरी है कि मुस्लिम युवाओं को समझाया जाए कि इस्लाम न केवल शांति और न्याय का पैगाम देता है, बल्कि ऐसे कार्यों को भी मना करता है जो समाज में विघटन और अशांति फैलाते हैं। उन्हें यह भी बताया जाना चाहिए कि भारत का संविधान उनके अधिकारों की रक्षा करता है और उनके विकास के लिए अवसर प्रदान करता है। भारतीय लोकतंत्र और मुस्लिम समुदाय भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और समानता के सिद्धांतों पर आधारित है। यह सभी नागरिकों को उनके धर्म, जाति, या पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना समान अधिकार प्रदान करता है। मुस्लिम समुदाय, जो भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे का अभिन्न हिस्सा है, को यह समझना चाहिए कि संविधान उन्हें अपने धर्म का पालन करने, शिक्षा प्राप्त करने और राजनीतिक भागीदारी में शामिल होने की पूरी स्वतंत्रता देता है। हिज्ब-उत-तहरीर जैसी विभाजनकारी विचारधाराओं को खारिज करना और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में सक्रिय भागीदारी करना ही सही रास्ता है। इससे न केवल समुदाय का उत्थान होगा, बल्कि एक समावेशी और समृद्ध समाज का निर्माण भी संभव होगा। सामुदायिक नेतृत्व और सकारात्मक भूमिका मुस्लिम विद्वानों, नेताओं और सामाजिक संगठनों को चाहिए कि वे हिज्ब-उत-तहरीर जैसी गुमराह करने वाली विचारधाराओं के खिलाफ़ एकजुट होकर आवाज़ उठाएँ। उन्हें समुदाय को यह समझाना चाहिए कि इस्लामी मूल्यों के साथ-साथ भारत का संविधान भी उनके अधिकारों और न्याय की रक्षा करता है। युवाओं को यह दिशा दिखाने की आवश्यकता है कि उनके सपनों को साकार करने का रास्ता शिक्षा, कौशल विकास और सकारात्मक सामुदायिक भागीदारी में है, न कि कट्टरपंथी संगठनों के झूठे वादों में। भारत के लोकतंत्र में, हर नागरिक को समान अवसर और अधिकार प्राप्त हैं। यह संविधान के प्रति निष्ठा और समाज में न्यायपूर्ण भागीदारी के माध्यम से ही संभव है। करना ये चाहिए हिज्ब-उत-तहरीर जैसे संगठन भारत की शांति और प्रगति के लिए गंभीर खतरा हैं। उनका उद्देश्य न केवल संविधान और कानून के विरुद्ध है, बल्कि इस्लाम के मूलभूत सिद्धांतों का भी उल्लंघन करता है। मुस्लिम समुदाय को इन संगठनों से सतर्क रहते हुए संविधान और इस्लामी मूल्यों के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखनी चाहिए। शिक्षा, सामाजिक भागीदारी और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से ही समुदाय का उत्थान और देश का विकास संभव है। (लेखक आर्तिक सामाजिक मामलों के जानकार है।यह उनके निजी विचार हैं )

शिक्षा के माध्यम से सशक्तिकरण: मुस्लिम समुदाय के लिए स्वर्णिम युग का प्रारंभ

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निर्मल कुमार (लेखक आर्थिक,सामाजिक मामलों के स्तम्भकार हैं।यह उनके निजी विचार हैं।) हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय में अल्पसंख्यक समुदायों को अपने शैक्षिक संस्थान स्थापित करने और संचालित करने के संवैधानिक अधिकार को पुनः स्पष्ट और सुदृढ़ किया है। यह निर्णय भारतीय संविधान की मूल भावना और लोकतंत्र के तीन स्तंभों—कानून के समक्ष समानता, संवैधानिक सर्वोच्चता और अल्पसंख्यकों की जिम्मेदारी—का प्रभावशाली उदाहरण है। विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के लिए, यह निर्णय शिक्षा के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित करने और समाज के सर्वांगीण विकास में योगदान देने का एक अद्वितीय अवसर प्रदान करता है। यह ऐतिहासिक फैसला केवल संवैधानिक अधिकारों को स्थापित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समुदाय को इस अधिकार का उपयोग करते हुए शिक्षा के माध्यम से अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाने की प्रेरणा भी देता है। यह समय है कि मुस्लिम समुदाय, अपने इतिहास, वर्तमान और भविष्य की जरूरतों को समझते हुए, शिक्षा को अपनी प्राथमिकता बनाए और इसे सामाजिक सशक्तिकरण का सबसे प्रभावी साधन बनाए। शिक्षा किसी भी समाज की प्रगति और विकास का मूल मंत्र होती है। इतिहास गवाह है कि कोई भी समुदाय या राष्ट्र तब तक उन्नति नहीं कर सकता, जब तक उसके नागरिक शिक्षित न हों। मुस्लिम समुदाय के पास शिक्षा की समृद्ध परंपरा है। इतिहास में नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों से लेकर इस्लामी स्वर्ण युग के दौरान विज्ञान, चिकित्सा, गणित और खगोल विज्ञान में योगदान देने वाले मुस्लिम विद्वानों तक, शिक्षा की शक्ति ने हमेशा समाज को ऊंचाई प्रदान की है। आधुनिक भारत में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू), जामिया मिलिया इस्लामिया (जेएमआई) और अन्य संस्थान समुदाय के लिए गौरव का प्रतीक हैं। इन संस्थानों ने उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करते हुए लाखों छात्रों को समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए तैयार किया है। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय इस परंपरा को और आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है। आज शिक्षा की भूमिका केवल साक्षरता तक सीमित नहीं है। यह आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का एक शक्तिशाली माध्यम बन चुकी है। मुस्लिम समुदाय को न केवल पारंपरिक विषयों बल्कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, चिकित्सा (STEM) और उद्यमिता जैसे आधुनिक क्षेत्रों में अधिक संस्थानों की स्थापना करनी चाहिए। उन्नत संस्थानों जैसे इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज, अनुसंधान केंद्र और प्रौद्योगिकी आधारित विश्वविद्यालयों का निर्माण समय की मांग है। महिला शिक्षा पर विशेष ध्यान देना भी आवश्यक है ताकि समाज के उस हिस्से को सशक्त किया जा सके जो किसी भी प्रगति में बराबर का योगदान दे सकता है। कौशल विकास केंद्र स्थापित करके युवाओं को रोजगार के लिए तैयार किया जा सकता है। मौजूदा विश्वविद्यालयों और स्कूलों को वैश्विक मानकों के अनुरूप आधुनिक बनाना अत्यंत आवश्यक है। अनुसंधान केंद्रों की स्थापना से छात्रों को नवीनतम तकनीकों और वैश्विक विकास से जोड़ा जा सकता है। भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ साझेदारी से छात्रों और शिक्षकों को अंतरराष्ट्रीय अनुभव और ज्ञान मिलेगा। आज के डिजिटल युग में, ऑनलाइन पाठ्यक्रम और डिजिटल शिक्षण उपकरण का उपयोग शिक्षा को और अधिक सुलभ और प्रभावशाली बना सकता है। आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए छात्रवृत्ति योजनाएं और शिक्षा ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। इससे यह गारंटी होगी कि किसी भी छात्र की शिक्षा आर्थिक सीमाओं के कारण बाधित न हो। शिक्षा के इस अभियान को सफल बनाने के लिए केवल समुदाय के नेता और बुद्धिजीवी ही नहीं, बल्कि हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। माता-पिता को अपने बच्चों, विशेष रूप से लड़कियों, की शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। यह मानसिकता बदलनी होगी कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन है। शिक्षा बच्चों को आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और समाज में सम्मानजनक स्थान प्रदान करती है। वहीं शिक्षकों को न केवल शिक्षण सामग्री पर ध्यान देना चाहिए, बल्कि छात्रों को नैतिक, सामाजिक और व्यावसायिक दृष्टिकोण से भी मजबूत बनाना चाहिए। सामुदायिक संगठन, गैर-सरकारी संस्थान (एनजीओ) और अन्य समूह कार्यशालाओं, करियर काउंसलिंग और कौशल विकास कार्यक्रम आयोजित कर सकते हैं। ये प्रयास छात्रों और उनके परिवारों को शिक्षा के महत्व और इसके लाभों से परिचित कराने में सहायक होंगे। शिक्षा का महत्व केवल व्यक्तिगत और सामुदायिक प्रगति तक सीमित नहीं है। यह राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता का भी साधन है। शिक्षित व्यक्ति अधिक सहिष्णु, विचारशील और समावेशी होता है। मुस्लिम समुदाय यदि शिक्षा को प्राथमिकता देता है, तो यह अन्य समुदायों के साथ संवाद और सहयोग के नए रास्ते खोलेगा। इसके अलावा, शिक्षा उन सामाजिक विभाजनों को भी कम कर सकती है, जो अक्सर गलतफहमियों और पूर्वाग्रहों के कारण उत्पन्न होते हैं। आज का यह निर्णय मुस्लिम समुदाय के लिए एक सुनहरा अवसर है। अब समय आ गया है कि समुदाय अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए शिक्षा के क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करे। नए शैक्षिक संस्थानों की स्थापना, उच्च शिक्षा में अधिक भागीदारी, आधुनिक शिक्षा प्रणाली का विकास और महिला शिक्षा को प्राथमिकता देना—यह सब मिलकर समुदाय को न केवल प्रगति की ओर ले जाएगा, बल्कि इसे एक आत्मनिर्भर और सशक्त समूह में बदल देगा। यह निर्णय एक आह्वान है कि शिक्षा को सामाजिक और आर्थिक समानता प्राप्त करने का माध्यम बनाया जाए। यह केवल मुस्लिम समुदाय के विकास का मार्ग नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणा है। शिक्षा केवल भविष्य का निर्माण नहीं करती, यह समाज और राष्ट्र की आत्मा को आकार देती है। अब यह समुदाय पर निर्भर करता है कि वह इस अवसर का किस प्रकार उपयोग करता है। शिक्षा के माध्यम से न केवल अपनी पीढ़ियों का भविष्य संवारें, बल्कि भारत की समृद्धि और एकता में भी अपना योगदान दें।

गंगा-जमुनी तहज़ीब: भारतीय समाज में सद्भाव और एकता का प्रतीक

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निर्मल कुमार (लेखक अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक आर्थिक मुद्दों के जानकार हैं।यह उनके निजी विचार हैं।) उत्तरप्रदेश के बहराइच जिले में हाल ही में हुई सांप्रदायिक हिंसा ने एक बार फिर भारत की सामाजिक एकता की बुनियाद को चुनौती दी है। ये घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था के लिए खतरा नहीं हैं, बल्कि उस साझा सांस्कृतिक विरासत के लिए भी खतरा हैं जिसने सदियों से भारत की पहचान को परिभाषित किया है। ऐसे समय में, हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों को अपने साझा अतीत को याद करते हुए उन मूल्यों को अपनाने की आवश्यकता है जिन्होंने कभी उन्हें एक-दूसरे से जोड़ा था। भारत का उपमहाद्वीप धार्मिक और सांस्कृतिक मेल-जोल की एक अनमोल धरोहर का घर है। विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार में गंगा-जमुनी तहज़ीब की संस्कृति, जो हिंदू-मुस्लिम परंपराओं का अनोखा संगम है, इस साझी विरासत का प्रतीक है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जो चीजें हमें जोड़ती हैं, वे उन चीजों से कहीं अधिक मजबूत हैं जो हमें बांटती हैं। गंगा-जमुनी तहज़ीब वह भावना है जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों ने मिलकर पर्व-त्योहार मनाए, और एक-दूसरे के रीति-रिवाजों का सम्मान किया। दिवाली और ईद का मिलकर मनाना, सूफी संतों और भक्ति कवियों के प्रति साझा श्रद्धा, यह सब हमारी संस्कृति में पारस्परिक सम्मान और सह-अस्तित्व का प्रतीक हैं। यह सिर्फ एक साझा अतीत नहीं है बल्कि एक ऐसा भविष्य भी दर्शाता है जहां विविधता को बांटने का कारण नहीं बल्कि एकता का आधार माना जाए। सदियों से हिंदू और मुस्लिम समुदायों ने एक साथ रहते हुए भाषा, कला, संगीत, भोजन और जीवनशैली को साझा किया है। यह सांस्कृतिक मिलन इन दोनों समुदायों की समृद्धि का स्रोत रहा है और इस धरोहर को हमें हर हाल में संजोकर रखना चाहिए, चाहे हालात कैसे भी हों। धर्म के प्रति सम्मान: शांति और सद्भाव की बुनियाद है ऐसे कठिन समय में, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि एक-दूसरे के धार्मिक विश्वासों का सम्मान ही शांति और सामाजिक सौहार्द की बुनियाद है। मंदिरों और मस्जिदों के प्रति आदर, त्योहारों और रीति-रिवाजों का सम्मान, यही वह नींव है जो हमें एकजुट रखती है। सच्चा धर्म तभी होता है जब हम इस विविधता का सम्मान करें, इसे बांटने के साधन के रूप में नहीं बल्कि समाज को जोड़ने के एक सशक्त माध्यम के रूप में देखें। हिंदू और मुस्लिम समुदायों ने हमेशा एक-दूसरे की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में भाग लिया है। सूफी परंपराओं में हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र और हिंदू मंदिरों में इस्लामी वास्तुकला का प्रभाव इस गहरी सांस्कृतिक बुनावट के जीवंत उदाहरण हैं। बहराइच, जो सूफी संत सैयद सालार मसूद गाज़ी से जुड़ा हुआ है, वहां इस साझी विरासत का विशेष महत्व है। लेकिन हाल की घटनाओं ने इस विरासत को चुनौती दी है। इस समय यह जरूरी है कि हम उन तत्वों से सावधान रहें जो नफरत और बंटवारे का खेल खेलते हैं। ये लोग, चाहे राजनीतिक स्वार्थ के लिए हों या कट्टरपंथी एजेंडा के लिए, समाज में विभाजन पैदा करके ही अपना लाभ देखते हैं। उनके नफरत भरे भाषण, अफवाहें और प्रचार केवल हिंसा को बढ़ावा देते हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में जहां सही-गलत जानकारी तेजी से फैलती है, यह जरूरी है कि हम इन कोशिशों को समझें और इनसे बचें। हमारी असली ताकत नफरत की इन आवाजों को अस्वीकार करने में है। हमें हिंसा के बजाय संवाद, सहानुभूति और समझ का रास्ता अपनाना चाहिए। इस हिंसा के बाद एक और जरूरी सबक यह है कि कानून पर भरोसा बनाए रखें। किसी भी सभ्य समाज में न्याय की प्राप्ति कानून के जरिए ही होनी चाहिए, न कि भीड़ के गुस्से से। भीड़तंत्र केवल अराजकता और विभाजन को गहरा करता है। भारत का न्यायिक तंत्र, हालांकि इसमें सुधार की गुंजाइश है, फिर भी सभी नागरिकों के लिए न्याय और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बना है। अगर हम हिंसा का रास्ता चुनते हैं, तो न केवल कानूनी प्रक्रिया कमजोर होती है, बल्कि समाज में अराजकता भी बढ़ती है। हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वे कानून में भरोसा रखें और जहां जरूरी हो उसे सुधारने की दिशा में काम करें, न कि खुद कानून अपने हाथ में लें। जब हम कानूनी रास्ता अपनाते हैं, तो यह सुनिश्चित होता है कि किसी भी अपराध के लिए उचित न्याय मिले और हिंसा भड़काने वालों को सजा दी जाए। किसी भी शिकायत का समाधान हिंसा से करना किसी भी शांतिपूर्ण समाज का रास्ता नहीं है और न ही यह हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के मूल्यों का सही प्रतिनिधित्व करता है। बहराइच हिंसा के बाद, यह जरूरी है कि दोनों समुदाय न केवल घावों को भरें बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए भी एकजुट हों। गंगा-जमुनी तहज़ीब की धरोहर को केवल अतीत की याद के रूप में नहीं बल्कि एक जीवंत आदर्श के रूप में फिर से अपनाना जरूरी है जो हमारे वर्तमान और भविष्य को दिशा दे सके। दोनों धार्मिक समुदायों के नेताओं को संवाद के माध्यम से विश्वास का निर्माण करना चाहिए और अपने अनुयायियों को उन सांस्कृतिक धरोहरों की याद दिलानी चाहिए जो उन्हें जोड़ती हैं। नागरिक समाज, मीडिया और शैक्षिक संस्थानों को भी विभाजनकारी कथाओं का मुकाबला करने और एकता की कहानियों को बढ़ावा देने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जो चीजें हमें जोड़ती हैं, वे उन चीजों से कहीं अधिक मजबूत हैं जो हमें बांटती हैं। हिंदू और मुस्लिम समुदायों ने मिलकर सदियों में एक समृद्ध सांझा विरासत बनाई है और एक घटना या हिंसा का दौर इसे खत्म नहीं कर सकता। शांति, सम्मान और कानून पर भरोसे का रास्ता चुनकर हम न केवल अपने अतीत का सम्मान करते हैं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर भविष्य भी सुनिश्चित करते हैं। आज, गंगा-जमुनी तहज़ीब के मूल्यों को अपनाने और हमें बांटने की कोशिश करने वाली शक्तियों को अस्वीकार करने का समय है। (इस लेख में छपी तस्वीर गूगल से हैदराबाद खबर से ली गई है।ख़बर ज़नपक्ष आभार व्यक्त करता है।)

इंटरनेट के युग में मुस्लिम युवाओं के कट्टरपंथीकरण को रोकने में मुस्लिम धर्मगुरुओं की भूमिका

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 निर्मल कुमार (लेखक सामाजिक,आर्थिक मुद्दों के जानकार हैं।यह लेख उनके निजी विचार हैं।) आज इंटरनेट हमारी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, जिससे हम न केवल सूचना प्राप्त करते हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। इसके जरिए लोग शिक्षा लेते हैं, संवाद करते हैं, और समाज का हिस्सा बनते हैं। हालांकि, सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने कई समस्याएं भी खड़ी की हैं। इनमें से एक गंभीर चुनौती है – इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से मुस्लिम युवाओं में कट्टरपंथ का प्रसार। कई अतिवादी संगठन जैसे इस्लामिक स्टेट (ISIS) और अल-कायदा ने इन प्लेटफार्मों का उपयोग कर युवा मुस्लिमों को अपने विचारों से आकर्षित किया है, जिससे वे हिंसक विचारधाराओं की ओर मुड़ जाते हैं। इन संगठनों ने धार्मिक भावनाओं का दुरुपयोग कर, इस्लाम के संदेशों को विकृत रूप में प्रस्तुत कर युवाओं को कट्टरपंथी बनने के लिए प्रेरित किया है। कट्टरपंथ का सामना करने में मुस्लिम धर्मगुरुओं का दायित्व इस चुनौतीपूर्ण स्थिति में मुस्लिम धर्मगुरुओं (उलेमा) और इस्लामी संगठनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। धर्मगुरुओं के पास वह धार्मिक ज्ञान और सामुदायिक प्रभाव होता है, जो युवाओं को सही राह दिखाने और कट्टरपंथी विचारधाराओं का मुकाबला करने के लिए आवश्यक है। उनके पास समुदाय के बीच एक ऐसा विश्वास है, जो युवाओं को सही संदेश देने में सहायक होता है। धर्मगुरुओं का सबसे प्रमुख कार्य यह है कि वे इस्लाम की उन अवधारणाओं की सही व्याख्या करें, जिन्हें आतंकवादी संगठन अपने उद्देश्य के लिए तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं। विशेषकर “जिहाद” और “शहादत” जैसे शब्दों का सही अर्थ सामने रखना जरूरी है। असल में, जिहाद का मतलब आत्म-सुधार और समाज की भलाई के लिए संघर्ष करना है, न कि हिंसा फैलाना। धर्मगुरु और इस्लामी विद्वान, कुरान के शांति, सहिष्णुता और आपसी भाईचारे के संदेशों को लोगों तक पहुंचाकर कट्टरपंथ का प्रभाव कम कर सकते हैं। इस्लाम का असली संदेश शांति, समानता और मानवता के प्रति प्रेम का है, जिसे कट्टरपंथी संगठन अपनी सुविधा अनुसार तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं। धर्मगुरु कुरान की उस आयत पर विशेष जोर दे सकते हैं, जिसमें कहा गया है कि एक निर्दोष की हत्या पूरी मानवता की हत्या के समान है (कुरान 5:32)। साथ ही, वे पैगंबर मुहम्मद साहब के जीवन से जुड़े किस्सों का उदाहरण देकर भी दिखा सकते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में कितनी बार सहिष्णुता, दया और मानवता का संदेश दिया। सोशल मीडिया पर सकारात्मक संवाद की आवश्यकता धर्मगुरुओं को यह समझना चाहिए कि आज के युवा ज्यादातर सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर ही सक्रिय रहते हैं। इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि धर्मगुरु और इस्लामी संगठन उन ऑनलाइन स्थानों पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं, जहां अतिवादी संगठन युवाओं को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। यदि हम कट्टरपंथ का मुकाबला करना चाहते हैं, तो सोशल मीडिया पर युवाओं के बीच धर्मगुरुओं की एक सक्रिय उपस्थिति होनी चाहिए। इसके लिए धर्मगुरुओं को छोटे वीडियो, ब्लॉग, इन्फोग्राफिक्स और अन्य डिजिटल सामग्री बनानी चाहिए जो इस्लाम के वास्तविक संदेश को सरल और आकर्षक तरीके से युवाओं के सामने रखे। दुनियाभर में कई सफल प्रयास हो चुके हैं, जहां डिजिटल प्लेटफार्म का उपयोग कर कट्टरपंथ को चुनौती दी गई है। उदाहरण के लिए, यूके में क्विलियम फाउंडेशन कट्टरपंथ के खिलाफ काम कर रहा है और सोशल मीडिया के जरिए युवाओं तक शांति और सहिष्णुता का संदेश पहुंचा रहा है। इसी प्रकार, सऊदी अरब का सकीना कैंपेन सोशल मीडिया पर कट्टरपंथी विचारों का विरोध कर रहा है, और संयुक्त अरब अमीरात में सवाब सेंटर आईएसआईएस के प्रचार का सामना कर रहा है। ऐसे प्रयासों को और भी बढ़ाने की जरूरत है, ताकि युवाओं को उनके भाषा और संस्कृति के अनुसार उचित और संतुलित जानकारी मिल सके। कट्टरपंथ के सामाजिक कारण और धर्मगुरुओं की भूमिका कट्टरपंथ केवल धार्मिक मुद्दा नहीं है, इसके कई सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारण भी होते हैं। बेरोजगारी, भेदभाव, गरीबी, शिक्षा की कमी और समाज में हाशिए पर होने का अहसास, ये सब कारण हैं जिनकी वजह से युवा कट्टरपंथ की ओर खिंच सकते हैं। धर्मगुरुओं और इस्लामी संगठनों को चाहिए कि वे इन मुद्दों को भी ध्यान में रखें और युवाओं को केवल धार्मिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि समाज में सशक्त बनाने के अवसर भी प्रदान करें। धर्मगुरुओं और स्थानीय मस्जिदों के साथ-साथ समुदायिक केंद्रों को भी चाहिए कि वे युवाओं के लिए रोजगार, शिक्षा और मानसिक सहयोग की सुविधाएं उपलब्ध कराएं। मस्जिदों को एक ऐसा स्थान बनाया जाना चाहिए जहां पर युवाओं को मेंटरशिप, करियर काउंसलिंग और मनोरंजन के अवसर मिल सकें। इससे न केवल उनका आत्म-सम्मान बढ़ेगा, बल्कि वे कट्टरपंथी विचारों से भी दूर रहेंगे। इसके साथ ही, इस्लामी संगठनों और धर्मगुरुओं को सरकारी एजेंसियों, शैक्षणिक संस्थानों और नागरिक संगठनों के साथ मिलकर काम करना चाहिए। एक समग्र डी-रेडिकलाइजेशन रणनीति बनाई जानी चाहिए, जिसमें युवाओं के लिए रोजगार, मानसिक स्वास्थ्य और समाज में अपनापन महसूस कराने की योजनाएं शामिल हों। अंतर-धार्मिक संवाद का आयोजन भी कट्टरपंथ का प्रभाव कम करने में सहायक हो सकता है। इससे विभिन्न समुदायों के बीच समझ और सौहार्द्र बढ़ता है, जो अतिवादी संगठनों के नकारात्मक संदेशों का सामना करने में सहायक हो सकता है। धर्मगुरुओं की भूमिका: भविष्य की ओर एक कदम मुस्लिम युवाओं का सोशल मीडिया के जरिए कट्टरपंथ की ओर बढ़ना एक गंभीर चुनौती है। इसे केवल कानून और सुरक्षा एजेंसियों के बल पर नहीं रोका जा सकता। इसके लिए धार्मिक और सामुदायिक नेताओं को जिम्मेदारी के साथ आगे आना होगा। प्रामाणिक इस्लामी शिक्षाओं का प्रचार करके, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहकर और युवाओं के सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को सुलझाने का प्रयास करके, मुस्लिम नेता और धर्मगुरु युवा मुस्लिमों को कट्टरपंथी विचारधाराओं से दूर रखने में मदद कर सकते हैं। यह लड़ाई केवल आतंकवाद को रोकने की नहीं है, बल्कि मुस्लिम समाज के सुरक्षित भविष्य की रक्षा करने की भी है। इससे युवा मुस्लिम समाज का सकारात्मक हिस्सा बन सकेंगे और एक बेहतर और समझदारी से भरी दुनिया में अपनी जगह बना सकेंगे।

*वक्फ संपत्तियों का अधूरा उपयोग और दुरुपयोग: सुधारों की आवश्यकता*

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(निर्मल कुमार) वक्फ, एक इस्लामी संस्था है जो परोपकारी संपत्तियों के दान के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका उद्देश्य संपत्ति या संपत्ति को अल्लाह की सेवा और जनता के लाभ के लिए समर्पित करना है। एक बार संपत्ति को वक्फ घोषित कर दिया जाता है, तो इसे धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए सौंप दिया जाता है और इसे रद्द, बेचा या बदला नहीं जा सकता। इन संपत्तियों से प्राप्त आय का उपयोग कब्रिस्तानों, मस्जिदों, मदरसों, अनाथालयों, अस्पतालों और शैक्षिक संस्थानों जैसी आवश्यक जन सेवाओं के लिए किया जाता है, जो सभी समुदायों की सेवा करते हैं। हालांकि, भारत में वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग और अधूरी उपयोगिता को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जा रही है, जिसमें भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और अतिक्रमण के आरोप लगातार लगते रहे हैं। उत्तर प्रदेश (यूपी), जहां वक्फ संपत्तियों की विशाल होल्डिंग है, इस संस्था के कुप्रबंधन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। राज्य में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड 1.5 लाख से अधिक संपत्तियों का प्रबंधन करता है, जबकि शिया वक्फ बोर्ड के तहत 12,000 से अधिक संपत्तियां आती हैं, सितंबर 2022 तक। इन संपत्तियों के बावजूद, इनका प्रबंधन कई विवादों में उलझा रहा है। यूपी और झारखंड वक्फ बोर्डों के प्रभारी सैयद एजाज अब्बास नकवी के नेतृत्व वाली एक तथ्य-खोज समिति ने गंभीर अनियमितताओं का खुलासा किया। उदाहरण के लिए, यह आरोप लगाया गया कि मंत्री आज़म खान ने अपने पद का दुरुपयोग करके वक्फ फंड को एक निजी ट्रस्ट में स्थानांतरित कर दिया, जिसे उन्होंने स्थापित किया था। रिपोर्ट में किराया संग्रह रिकॉर्ड में विसंगतियों की ओर भी इशारा किया गया और इस बात पर प्रकाश डाला गया कि यूपी के सुन्नी और शिया वक्फ बोर्ड दोनों वक्फ संपत्तियों को अवैध रूप से बेचने और स्थानांतरित करने में शामिल थे। इसका परिणाम 2019 में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा मामले की जांच में हुआ, जिससे भ्रष्टाचार की व्यापकता पर प्रकाश डाला गया। यूपी और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित दारगाह बाबा कपूर की वक्फ संपत्ति, जो 550 गांवों में फैली हुई है, इन समस्याओं का एक और उदाहरण है। इस संपत्ति से होने वाली आय वक्फ बोर्ड तक नहीं पहुंचती, जिससे जनता में असंतोष पैदा होता है। एक अन्य उदाहरण में, दफनाने के उद्देश्य से आरक्षित वक्फ भूमि को एक मॉल बनाने के लिए स्थानीय राजनेताओं को बेच दिया गया, जिससे मुस्लिम समुदाय में आक्रोश फैल गया। यूपी में जो स्थिति है वह अकेली नहीं है। पूरे भारत में, वक्फ संपत्तियों को डेवलपर्स, राजनेताओं, नौकरशाहों और तथाकथित “भू-माफिया” द्वारा निशाना बनाया गया है। वक्फ भूमि अचल होती है, फिर भी कई संपत्तियां कम दरों पर लीज़ पर दी गईं या बेची गईं, और आय भ्रष्ट अधिकारियों की जेबों में चली गई। इसके अलावा, कई राज्य बोर्डों पर अवैध किकबैक के बदले वक्फ भूमि को निजी खरीदारों को बेचने का आरोप है, जो रियल एस्टेट की बढ़ती मांग से प्रेरित है। जैसे-जैसे भूमि अधिक मूल्यवान होती जा रही है, वक्फ संपत्तियां, जो जन कल्याण के लिए होती हैं, भ्रष्टाचार के प्राथमिक लक्ष्य बन रही हैं। अगस्त 2024 में, भारतीय सरकार ने वक्फ बोर्डों को सुव्यवस्थित करने और संपत्तियों के अधिक प्रभावी प्रबंधन को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दो विधेयक पेश किए, वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 और मुसलमान वक्फ (निरसन) विधेयक, 2024। प्रस्तावित प्रमुख संशोधनों में से एक वक्फ संपत्तियों का अनिवार्य पंजीकरण है, जो जिला कलेक्टर को यह निर्धारित करने का अधिकार देता है कि कोई संपत्ति वक्फ है या नहीं। हालांकि, यह प्रावधान जिला कलेक्टर के कार्यालय पर अतिरिक्त बोझ डाल सकता है, जिससे पंजीकरण प्रक्रिया धीमी हो सकती है। पारदर्शिता और जवाबदेही के नाम पर एक निजी इकाई के नियमन में अत्यधिक सरकारी हस्तक्षेप वक्फ बोर्डों की धार्मिक स्वायत्तता को कमजोर कर सकता है। एक अन्य विवादास्पद परिवर्तन यह है कि वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के लिए मुस्लिम होना अनिवार्य नहीं है। आलोचकों का तर्क है कि इस तरह के संशोधन वक्फ बोर्डों की धार्मिक स्वायत्तता का उल्लंघन करते हैं, जैसा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में निहित है। भारत में वक्फ संपत्तियों का मुद्दा तुरंत और निष्पक्ष रूप से समाप्त किया जाना चाहिए। भ्रष्टाचार और अतिक्रमण को रोकने के लिए सरकारी हस्तक्षेप आवश्यक है, लेकिन इसे वक्फ बोर्डों की धार्मिक स्वायत्तता को बनाए रखने की आवश्यकता के साथ संतुलित किया जाना चाहिए। अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करके, इन संपत्तियों से उत्पन्न आय का उपयोग मुस्लिम समुदाय को उठाने के लिए किया जा सकता है, जैसे कि अधिक कब्रिस्तानों, स्कूलों और कॉलेजों का निर्माण। वक्फ संपत्तियों का दुरुपयोग और उनका अधूरा उपयोग न केवल इन संपत्तियों के परोपकारी उद्देश्यों के साथ विश्वासघात है, बल्कि सामाजिक विकास के लिए एक खोया हुआ अवसर भी है। वक्फ बोर्डों को प्रभावी ढंग से कार्य करने के लिए, उनके संचालन को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा, और सुधारों को ईमानदारी से लागू किया जाना चाहिए। तभी वक्फ संपत्तियां वास्तव में जनता के हित में काम कर सकेंगी, जैसा कि उनका उद्देश्य था। (लेखक सामाजिक,आर्थिक मामलों के जानकार हैं।यह उनके निजी विचार हैं।)

विचार : असाध्य को साधने के लिए राम को भी शक्ति साधना का अनुष्ठान करना पड़ा

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असाध्य को साधने के लिए राम को भी शक्ति साधना का अनुष्ठान करना पड़ा और आज हम शक्ति की महत्ता को नकारते जा रहे हैं। रावण अतुल बलशाली और अत्यन्त ज्ञानी पुरुष था… उसके पास साधारण व्यक्तियों की तुलना में दस व्यक्तियों के बराबर बुद्धि थी… परंतु असाधारण बुद्धि होने के उपरांत भी वह विवेकशून्य था! रावण त्रिकालदर्शी महाकाल महादेव का अनन्य भक्त था… जनश्रुति अनुसार रावण जब महादेव की पूजा के कैलाश जाता था तो अहंकारी स्वभाव वश स्वयं शीश नवाकर महादेव को नमन करने के बजाय महादेव को कैलाश सहित उठाकर अपने शीश पर रख लेता था… रावण के अनुसार दोनों बातें एक ही थी… कि चाहें महादेव के चरणों में वह अपना शीश नवाए या महादेव के चरण उठाकर अपने शीश पर धर लें! क्योंकि उसके पास ज्ञान तो बहुत था पर विवेक जिसे हम कॉमनसेंस कहते हैं, नहीं था। क्योंकि जब आप किसी के दरवाजे कुछ मांगने जाते हैं या उससे मात्र मिलने ही जाते हैं तो आपके स्वभाव में मृदुलता और सौम्यता होनी चाहिए… रावण सुरों और वाद्य यंत्रों का कुशल ज्ञाता था इसलिए रावण जब कैलाश के प्रांगण में प्रवेश करता था वो वह नानाप्रकार से महादेव की स्तुति करके महादेव को प्रसन्न करता था… उसकी सारी प्रार्थनाएं ध्वनि और स्वरों पर आधारित थी। आज भी उसकी गायी स्तुतियां पढ़ते, सुनते या गाते समय शरीर में विभिन्न प्रकार की ओज शक्ति और आनंद का भान होता है… लेकिन यह ऊर्जा नकारात्मकता से भरी हुई हैं। रावण की गाई हुई स्तुतियों में रावण का अहंकार और दम्भ स्पष्ट झलकता है। परंतु राम विनीत भाव से अत्यन्त सरल मना होकर करबद्ध निवेदन की भंगिमा में महादेव की स्तुति करते हैं। जिससे प्रसन्न होकर महादेव कहते हैं… “रावण जैसा भी है… परंतु मेरा अनन्य भक्त है.. मैं रावण के विपक्ष में खड़ा नहीं हो सकता इसलिए मैं आपको विजय का आशीर्वाद नहीं दे सकता” अब जिस पक्ष में स्वयं देवों के देव स्वयं महादेव खड़े हो उस पक्ष से जीत पाना कठिन नहीं वरन असम्भव है। तब राम महादेव के कहने पर शक्ति की साधना करते हैं! परंतु शक्ति की विशेषता है कि वह सदैव योग्य पात्र का ही चयन करती हैं। शक्ति महादेव की वामांगी हैं इसलिए राम से उच्चतर पात्र और कौन हो सकता है, जिसके पक्ष में वह खड़ी हों! कोई भी व्यक्ति मात्र एक लोटा जल चढ़ाकर भी महादेव को अपने पक्ष में कर सकता है परन्तु शक्ति बिना योग्यता का परीक्षण किये किसी के पक्ष में नहीं जाती हैं। नौ दिवस के अन्तिम दिवस के शक्ति अनुष्ठान में एक कमलपुष्प कम होने पर कमलनयन राम अपनी आंख निकालकर चढ़ाने का प्रयोजन करते है तभी शक्ति प्रकट होकर उन्हें विजय का आशीर्वाद देती हैं। जिस पक्ष में शक्ति है, स्त्री है वह पक्ष स्वयं ही बहुत बलशाली हो जाता है। शक्ति के समक्ष जब महादेव करबद्ध प्रणाम कर रहे हैं तो शक्ति की महिमा पर संदेह ही नहीं उठता है। लेकिन वर्तमान में पुरुष इतना दंभी है कि वह शक्ति को ही नकार रहा है… या शक्ति को ही प्रताड़ित कर रहा है! अब ऐसी परिस्थितियों में आप कैसे विजय और सफल होगें यह निर्णय आप स्वयं कीजिए! *विजयदशमी की शुभकामनाएं* 🚩 यह विचार मेरे प्रिय भाई अभिषेक बनारसी ने मेरे व्हाट्सएप में भेजा।उनका यह विचार आज के समय मे जब धर्म की मजबूती चारों ओर दिखाई दे रही है लेकिन धर्म जीवनचर्या में नहीं दिखने पर उपजा है। खबर जनपक्ष अपने पाठकों से अपील करता है कि आपके विचार सम्समयिकजनसरोकर से जुड़े हों तो हमें भी अवगत कराएं।हमारे पोर्टल के माध्यम से आपके विचार भी जनमानस तक पहुंचाने का काम करेंगे। 8103015433 पर व्हाट्सएप करें।

विश्लेषण : *सड़कों से गांवों तक पहुंचने की कोशिश, यह कोई बुरी बात तो नहीं*

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बरुण सखाजी (लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं) बीते कुछ वर्षों से विपरीत दलों की सरकारों में आपसी अदावत (कटुता) बढ़ी है। इस अदावत के लिए कौन जिम्मेदार हैं, सब जानते हैं। हर दल अपने आपको लोकतंत्र का पहरूआ बता रहा है लेकिन इस अहंकार को नहीं छोड़ पा रहा कि वह विपक्ष में भी बैठ सकता है। 2014 के बाद से ऐसी अदावतें बढ़ी हैं। इसका कारण साफ है, सदा सत्ता मे रहने का अहंकार। जनता की राय का अपमान। साठ साल तक राज करके ऐसा स्वभाव हो जाना स्वभाविक भी है, किंतु चुनावी लोकतंत्र में इसे जितने जल्दी हो समझ लेना चाहिए। आज हैं, कल नहीं हैं, कल रहेंगे परसों नहीं होंगे। जनता जिसे चाहेगी वही बैठेगा और वह वैसा ही करेगा जैसा करने के लिए उसे चुना गया है। छत्तीसगढ़ में इस बात को ठीक से समझ लिया गया है। जमीन पर महसूस किया जा रहा है। कहीं कोई चूक न हो पाए इसलिए जनता को सबसे ऊपर जानकर उससे किए वादों को पूरा किया जा रहा है। आलोचना की जा सकती है, किंतु धैर्यपूर्वक देखेंगे तो समझ आएगा आलोचना बेवजह है। चूंकि जो कहा वह करना और वह करके दिखाना ही सफल सियासत और राजनेता की पहचान है। बदले हुए दौर में समझ लेना होगा, लोगों को गुमराह करना अब संभव नहीं है। साल 2023 के विधानसभा चुनावों में छत्तीसगढ़ में भाजपा की विजय वास्तव में बदले जनमत का ही प्रमाण है। इसमें भी सरकार संचालन के लिए ऐसे व्यक्तित्व का चयन बड़ी चुनौती थी, जिसकी स्वीकार्यता, अनुभव, विनम्रता, मिलनसारता, सियासत की समझ, विकास के कार्यों के प्रति सकारात्मक रवैया और टीम को लेकर चलने का हुनर हो। इस मामले में मोदी की गारंटी और मोदी का चयन दोनों को मानना ही पड़ेगा। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का महकमा यूं तो देशभर में सड़कों की सुंदरता, मजबूती और सुलभता के लिए जाना जाता है। लेकिन इसमें भी छत्तीसगढ़ के लिए दिल खोल देना महत्वपूर्ण बात है। सड़कों का निर्माण एक सतत प्रक्रिया है। 2018 तक प्रदेश में सड़कों का निर्माण सामान्यतः अच्छी रफ्तार से चल रहा था, किंतु बाद के कुछ वर्ष जैसे काम रुक गया। न गलियों में निर्माण हो रहा था, न गांवों में। जो नेशनल हाईवे भी बन रहे थे तो उन्हें भी स्टेट लेवल के क्लीयरेंस गैर प्राथमिकता में मिलता था। यानि मिल गया तो मिल गया नहीं तो किसी को पड़ी नहीं थी। परंतु अब ऐसा नहीं है। *नए* दौर में सड़कों को लेकर सरकार आंतरिक रूप से स्पष्ट है। वह मानती है, भले ही कितनी ही रफ्तार से समाज में बदलाव हो रहे हों, लेकिन सड़क, बिजली, पानी मूलभूत जरूरतें बनी रहेंगी। जो भी सरकार इनसे खिलवाड़ करेगी, उसे भुगतना पड़ेगा। इस बात को जो राजनीतिक दल सत्ता में रहते ही समझ जाए वह समझदार, अन्यथा अहंकार तो कोई भी कुर्सियों पर विराजते ही पाल ही लेते हैं। प्रदेश की दुखती रग रहा है जशपुर, पत्थलगांव रोड, केशकाल का घंटो जाम को मजबूर टेढ़ामेढ़ा रास्ता, बस्तर को और दूर करता धमतरी-जगदलपुर का रास्ता। बस्तर के अन्य आंतरिक रास्ते, सरगुजा के भीतरी इलाकों के रोड, बिलासपुर संभाग में आने वाले जिलों की सड़कें। यह सब चीख-चीखकर कह रही हैं इनका निर्माण जरूरी है। वर्तमान सरकार ने सारी बातों को मजबूती से रखा। मुख्यमंत्री ने पूरी सच्चाई से गडकरी से सहयोग मांगा। विभागीय मंत्री ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी। पैसा भी मिला, समय-सीमा का वादा भी मिला और प्रदेश की ओर से वचनबद्धता भी दी गई। यही होना चाहिए। केंद्र बड़प्पन दिखाता है और प्रदेश अपने गरिमा और आवश्यकता के अनुरूप काम करते हैं। वाद-विवाद की कोई जगह नहीं होती। छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ वर्षों से विवाद ने स्थान लिया था। असहमतियों का भ्रम खड़ा किया गया। संकुचित राजनीतिक सोच के चलते टकराव पैदा किए गए। अब यह सब खत्म हो गए हैं। नतीजे में प्रदेश को हजारों करोड़ की सड़कें मिल रही हैं। यह सड़कें एक ही दल की केंद्र और प्रदेश में सरकार होने के कारण भी मिल रही हैं। संभवतः इसे ही डबल इंजन की सरकार कहा गया था। सड़कों के जरिए गांवों तक पहुंचने की कोशिश, कोई बात बुरी तो नहीं है। क्या इसकी भी आलोचना करेंगे आप? sakhajee.blogpsot.com (यह लेखक के निजी विचार हैं।)

(समसामयिक लेख) विष्णु सरकार का सुशासन : कहीं फेल तो कहीं पास

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(समसामयिक लेख) कल छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य से जुड़ी सुशासन पर दो खबरों ने मुझे काफी प्रभावित किया एक – बीजापुर-सुकमा से आई वह खबर जिसमें 108 एम्बुलेंस के दोनों कर्मचारियों ने 18 किमी पहुंचविहीन गांव से मरीज को अपने कंधों में ढोकर एम्बुलेंस तक लाया।दो – जशपुर जिले में पक्की सड़क पर अपने घर से मरीज को चार कंधों में ढोकर अस्पताल तक पहुंचाया। यहां दोनों जगह सिस्टम खाट पर और कंधे के सहारे दिखा।मतलब एक जगह सरकार पहुंच नहीं पाई तो एम्बुलेंस के दो कर्मचारी खटिया पर मरीज को डाले और अपने कंधों पर उठाकर 18 किलोमीटर पैदल चले।दूसरी जगह सिस्टम खुद कंधे पर चलता दिखा।अब इसमें एक ओर 108 के कर्मचारियों के कारण विष्णु के सुशासन का झंडा बुलंद हुआ तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री के गांव में पक्की सड़क पर भी 108 एम्बुलेंस का नहीं पहुंचना,सुशासन के गाल पर तमाचे जैसा लगा। ये दोनों घटना सोशल मीडिया में खूब चल रही हैं।बीजापुर के पत्रकार युकेश चंद्राकर ने 108 के कर्मचारियों के जज्बे को सलाम करते हुए लिखा – ‘अशक्त मरीज को खाट पे रखा, कंधे पर उठाया और 18 किलोमीटर पैदल चलकर एंबुलेंस तक पहुंचाया एंबुलेंस कर्मचारियों ने । माओवाद प्रभावित बीजापुर-सुकमा के सरहदी इलाके की तस्वीर देखिए और राय दीजिए कि माओवादी गतिविधियों के कारण नहीं बन सकी हैं कई इलाकों में सड़कें या कोई और कारण है ? मीडियम पांडू नाम के युवक को पेट और कमर में दर्द की सूचना मिली थी एंबुलेंस कर्मचारियों को । EMT रोहित ताड़पल्ली और पायलट दिलीप बोयना ने मरीज को कंधे पर उठाकर एंबुलेंस तक पहुंचाया और एंबुलेंस से हॉस्पिटल तक लाया । सलाम है दोनों भाइयों को 🙏❤️ Gyanendra Tiwari Vijay Sharma CMO Chhattisgarh’ वहीं सीएम के गृह जिले जशपुर ,ऊपर से उनकी ही विधानसभा कुनकुरी की फरसाबहार तहसील में कांग्रेस जिलाध्यक्ष मनोजसागर यादव ने खाट पर सिस्टम को चार कंधे पर जाते हुए दिखाया।जिसमें चार कंधों में एक कंधा गरीब परिवार की महिला को देते हुए देखकर सरकार के होने का एहसास कराना खुद सरकार को मुश्किल हो गया है।विपक्षी पार्टी के जिलाध्यक्ष मनोजसागर अपने फेसबुक पोस्ट पर लिखते हैं – जशपुर जिले मे स्वास्थ्य व्यवस्था कैसी है यह अब तक आपने सीएम कार्यालय बगिया तथा भाजपा आईटी सेल के जरिए जाना है आइए हम आपको जमीनी हकीकत दिखाते हैं, इस विडीओ के माध्यम से। ‘इस खाट मे पड़ी महिला का नाम मुन्नू बाई है जो कि ग्राम बनगांव निवासी गंभीर रूप से बीमार है, दो दिन से इनके परिजनो ने 108 मे कॉल किया हर बार जवाब मिला एम्बुलेंस मौजुद नही है, आने पर भेजा जाएगा, परिजनों ने महसुस किया ऐसे तो मरीज मर जाएगा, ऐसे में उन्होंने तत्कालिक फैसला लेते हुऎ सन 1910 वाला तरीका अपनाया मरीज को चारपाई पर डाला चारों कोनों में चार लोग उठाकर उक्त बीमार महिला को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र फरसा बाहर लेकर गए। एक और सीएम साहब जिनका स्वंय का विधान सभा क्षेत्र है , दूसरी ओर सुपर सीएम साहिबा तीसरी ओर बगिया कैंप कार्यालय जहाँ से लगभग 10 कि. मी. की दुरी का मामला,चौथी ओर कुनकुरी सेवा सदन के साथ विधानसभा से 2 निज सचिव उसके बाद ऐसी अव्यवस्था, कहाँ हैं आप सीएम साहब। जनता अब कहने लगी हैं सीएम साहब से ज्यादा बेहतर विधायक यू डी मिंजऔर भूपेश सरकार था जिनके राज में किसी को कोई समस्या नहीं थी उनके लोग हर जगह हर समस्या के लिए जनता के साथ खड़े मौजूद होते थे । Bhupesh Baghel Deepak Baij Indian National Congress – Chhattisgarh’ ये दो तस्वीरें और उनपर लिखे दो पोस्ट पढ़कर लगता है कि सरकार के स्वास्थ्य सिस्टम को 108 एम्बुलेंस चला रही है।जो कहीं पास है तो कहीं फेल। असल में 108 एम्बुलेंस या तो मरीजों के हिसाब से पर्याप्त नहीं है या फिर सिस्टम में बैठे लोग लापरवाही से मरीज को समय पर एम्बुलेंस नहीं दे पाते हैं।यह सरकार को देखना होगा। इससे ठीक एक दिन पहले जशपुर जिले के बगीचा में श्रद्धालुओं से भरी पिकप पलट गई जिसमें दर्जनभर से ज्यादा लोग घायल हो गए। 4 गम्भीर घायलों में 2 का रायपुर में सरकारी सिस्टम से बेहतर इलाज चल रहा है।इस दर्दनाक घटना में घायल फरसाबहार के फरदबहार गांव के कई लोग सीएम साय के रिश्तेदार थे और श्रद्धालुओं के काफिले में भाजपा के कार्यकर्ता भी बड़ी संख्या में थे।पुख्ता जानकारी है कि घटना के बाद 108 एम्बुलेंस ने आने में बहुत देर कर दी,तब तक एक मीडियाकर्मी और सोनगेरसा की पूर्व सरपंच श्रीमती गणेश्वरी बाई पैंकरा के सहयोग से घायलों को निजी गाड़ियों में बगीचा अस्पताल भेजा गया।बाद में शाम 6 बजे बतौली से आये एम्बुलेंस में कम घायलों को ले जाया गया।अब यह पढ़कर चौंकिए कि मीडिया की सुर्खियां बनते ही घटनास्थल पर रात दस बजे तक दो एम्बुलेंस खड़ी थी जबकि करीब 4:30 बजे यह हादसा हुआ। वहीं सीएमएचओ डॉ. जी.एस. जात्रा पता नहीं कौन सी यात्रा में थे जिन्होंने मीडियाकर्मियों का फोन तक नहीं उठाया। अब जशपुर जिले में 108 एम्बुलेंस के ताजा आंकड़ों की बात करें तो यहां 24 एम्बुलेंस हैं।जिसमें से 3 एम्बुलेंस गैरेज में मरम्मत कराने खड़ी है।21 एम्बुलेंस एक दिन में यानी 19 सितंबर को 3283 किलोमीटर चली जिसका औसत निकालें तो हर एम्बुलेंस ने 156 किलोमीटर की दूरी तय की है। मेरे 108 से जुड़े सूत्र बताते हैं कि सीएम डिस्ट्रिक्ट होने के नाते ,ऊपर से सीएम सीट कुनकुरी के वोटर होने के नाते 8 से 10 एम्बुलेंस मरीजों को सीधे रायपुर ले जाने में व्यस्त रहते हैं।इसमें से ज्यादातर सीधे सीएम कार्यालय बगिया के निर्देश पर बिना रेफरल मरीज होते हैं,जो बस से भी सफर कर सकते हैं।इसका मतलब यदि एम्बुलेंस में अब तक जाने वाले मरीजों का मर्ज जानने की ईमानदार कोशिश की जाय तो आंखें फ़टी-की-फ़टी रह जाएंगी। बहरहाल,सिस्टम के सुसंचालन हेतु स्वास्थ्य मंत्री हैं लेकिन वे अपने उन कामों को लेकर ज्यादा सुर्खियों में हैं जो उन्हें नहीं करना चाहिए।रही बात मुखिया की तो सवाल मुखिया से करना होता है और जवाब भी मुखिया को ही देना होता है। ऐसे में एक सवाल जनता की ओर से ये है कि क्या मुख्यमंत्री अपनी विधानसभा के उन चार मतदाता को सम्मानित करेंगे जिन्होंने सरकारी अस्पताल में इलाज़ कराने के लिए मरीज … Read more

*वक्फ बोर्ड सुधार: एक मुस्लिम महिला की आवाज से सशक्त होगा समुदाय*

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  हालांकि सरकार के प्रस्तावित संशोधन सही दिशा में एक कदम हैं, फिर भी वक्फ बोर्डों की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए और कदम उठाए जा सकते हैं। निर्मल कुमार (लेखक अंतर्राष्ट्रीय समाजिक,आर्थिक मामलों के जानकार हैं।यह उनके निजी विचार हैं।) वक्फ बोर्ड, जो 1995 के वक्फ अधिनियम के तहत स्थापित किए गए थे, का उद्देश्य इस्लामी कानून के अनुसार धार्मिक, परोपकारी, और पवित्र उद्देश्यों के लिए संपत्तियों का प्रबंधन और सुरक्षा करना था। हालांकि, हाल के वर्षों में इन बोर्डों की शक्तियों के दुरुपयोग, पारदर्शिता की कमी, और प्रबंधन में असफलता को लेकर आलोचना की गई है। इसके चलते सुधार की मांग उठी है, और सरकार ने इन मुद्दों को सुलझाने के लिए वक्फ अधिनियम में महत्वपूर्ण संशोधन प्रस्तावित किए हैं। ये संशोधन सरकार की उस प्रतिबद्धता को भी दर्शाते हैं, जो लंबे समय से उठे हुए मुद्दों को हल करने और सचर समिति की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए वक्फ बोर्डों का दायरा बढ़ाने की दिशा में है। वर्तमान वक्फ बोर्डों की एक मुख्य समस्या उनकी “असीमित शक्तियाँ” हैं, जो उन्हें बिना उचित निगरानी या सत्यापन के किसी भी भूमि को वक्फ संपत्ति घोषित करने की अनुमति देती हैं। इस कारण से वक्फ बोर्डों द्वारा संपत्ति हड़पने और वक्फ अधिनियम के प्रावधानों का दुरुपयोग करने की कई शिकायतें मिली हैं। कुछ मामलों में बोर्डों ने याचिकाकर्ताओं को न्यायपालिका से न्याय प्राप्त करने से भी रोका है, जिससे कानून का उल्लंघन हुआ है। संपत्तियों को वक्फ संपत्ति घोषित करने की प्रक्रिया में उचित सत्यापन की कमी और मनमाने ढंग से संपत्तियों को वक्फ घोषित करना आम जनता और विभिन्न मुस्लिम समुदायों में असंतोष को बढ़ा रहा है। इन चिंताओं के जवाब में, सरकार ने वक्फ अधिनियम में संशोधन के कई प्रस्ताव दिए हैं, जिनका उद्देश्य जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ाना है। इन संशोधनों में केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य वक्फ बोर्डों की संरचना को पुनर्गठित करने का प्रावधान है ताकि बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके, जिसमें महिलाओं का अनिवार्य समावेश भी शामिल है। एक महत्वपूर्ण संशोधन में यह प्रावधान है कि किसी भूमि को वक्फ संपत्ति घोषित करने से पहले उसका अनिवार्य सत्यापन किया जाएगा। यह मनमाने और अनुचित घोषणाओं को रोकने के लिए किया गया है, जो विवाद और दुरुपयोग का कारण बने हैं। प्रस्तावित बदलावों में विवादित संपत्तियों की न्यायिक जांच का प्रावधान भी है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उन्हें उचित और पारदर्शी तरीके से वक्फ संपत्ति घोषित किया जाए। इसके अलावा, विधेयक में उन धाराओं को निरस्त करने का प्रावधान है जो बोर्डों को अत्यधिक शक्तियाँ देती हैं, जिससे उनके द्वारा इन शक्तियों के दुरुपयोग को रोका जा सके। ये संशोधन वक्फ बोर्डों के कामकाज को अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनाने के व्यापक प्रयास का हिस्सा हैं। सरकार ने इन सुधारों के लिए मुस्लिम बुद्धिजीवियों और संगठनों से सुझाव भी प्राप्त किए हैं। हालांकि सरकार के प्रस्तावित संशोधन सही दिशा में एक कदम हैं, फिर भी वक्फ बोर्डों की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए और कदम उठाए जा सकते हैं। सभी वक्फ संपत्तियों के लिए एक डिजिटल रिकॉर्ड-कीपिंग सिस्टम लागू कर पारदर्शिता बढ़ाई जा सकती है। इन रिकॉर्डों तक जनता की पहुँच होने से ज्यादा निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित होगी। एक स्वतंत्र निगरानी समिति की स्थापना, जिसमें कानूनी विशेषज्ञ, सामुदायिक नेता, और सरकारी प्रतिनिधि शामिल हों,जो वक्फ बोर्डों की गतिविधियों की निगरानी कर सकती है और कानून का पालन सुनिश्चित कर सकती है। यह वक्फ बोर्ड के सदस्यों और कर्मचारियों के लिए नियमित प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रम करते हुए उनके कानूनी, वित्तीय, और प्रशासनिक पहलुओं की समझ को सुधार सकता है, जिससे वक्फ संपत्तियों का बेहतर प्रबंधन हो सके। स्थानीय समुदाय की भागीदारी को बढ़ावा देने से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन समुदाय की जरूरतों और आकांक्षाओं के अनुरूप हो। सरकार द्वारा केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य वक्फ बोर्डों में महिलाओं के अनिवार्य समावेश के प्रस्ताव के अलावा, इन भूमिकाओं में महिलाओं को सशक्त और समर्थन करने के लिए विशेष कार्यक्रम और पहल बनाना महत्वपूर्ण होगा। इसमें नेतृत्व प्रशिक्षण, मेंटरशिप कार्यक्रम और यह सुनिश्चित करना कि महिलाओं को वक्फ प्रबंधन के सभी पहलुओं में भाग लेने के बराबर अवसर मिलें, शामिल हो सकते हैं। प्रस्तावित संशोधनों ने मुस्लिम महिलाओं की आवाज को सशक्त किया है, वक्फ बोर्डों में मुस्लिम महिलाओं के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करके उनकी सशक्तिकरण की दिशा में कदम उठाया है। केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य वक्फ बोर्डों में महिलाओं का समावेश लैंगिक समानता और समावेशी निर्णय-निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इन सुधारों के साथ-साथ महिलाओं की भागीदारी और सामुदायिक सहभागिता को बढ़ाने के लिए अतिरिक्त उपाय भी महत्वपूर्ण हैं, ताकि वक्फ प्रणाली में विश्वास बहाल हो सके और यह निष्पक्ष और न्यायपूर्ण ढंग से संचालित हो, जिससे हमारे समाज के सभी सदस्यों को लाभ हो।

छात्रों की लड़ाई में पिसता प्रिंसिपल,आत्मानन्द में हुई मारपीट के पीछे की सच और साजिश की क्या है कहानी?

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जशपुर/कुनकुरी – बीते 28 अगस्त को स्वामी आत्मानन्द विशिष्ट अंग्रेजी मीडियम हाईस्कूल कुनकुरी में छात्रों के बीच हुई मारपीट के मामले में पड़ी धुंध हटती जा रही है।पुलिसिया और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच खबर जनपक्ष को ऐसी जानकारियां मिलीं हैं, जिन्हें पाठकों के सामने रखना जरूरी समझा। क्यों हुई मारपीट? यह बताने से पहले हम छात्रों के बदले हुए नाम से सच्ची कहानी बताते हैं – इसमें चांद,सूरज और पृथ्वी तीन किरदार हैं।दरअसल,उस दिन और दिनों की तरह पढाई चल रही थी।रेसिस टाईम में करीब 10:10 बजे सुबह चांद और सूरज के बीच छात्र चुनाव को लेकर बहस होने लगी।जिसमें बात बढ़ते-बढ़ते हाथापाई पर उतर आई।पृथ्वी ने बताया कि सबसे पहले सूरज ने चांद के चेहरे पर मुक्का मारा,फिर चांद ने मुक्का मारा जो सूरज को नहीं लगा,दुबारा मुक्का मारा जो सूरज के कान के पीछे पड़ा,जिससे सूरज के सिर से खून बहने लगा।चांद ने फाइटर से मारा हालांकि चांद का कहना है पृथ्वी पूरा सच नहीं बता रहा है,मैंने अंगूठी पहनी थी,जिससे सूरज को चोट लगी है।खून निकलता देख सूरज का दोस्त पृथ्वी अपने दो-तीन दोस्तों के साथ बीच-बचाव किया।तब तक स्कूल के टीचर दीपक यादव, वाइस प्रिंसिपल चौहान स्टेज के पीछे हो-हल्ला सुनकर पहुंचे।उन्होंने घायल सूरज को अस्पताल पहुंचाया।जहां सिर में टांके लगने के बाद सूरज वापस स्कूल आ गया। घटना के समय प्रिंसिपल इकबाल खान कहाँ थे? इस घटना के दौरान स्कूल के प्रिंसिपल इकबाल खान आवश्यक बैठक में जशपुर कलेक्ट्रेट में थे।जैसे ही उन्हें पता चला वे बैठक से निकल गए।तब तक इधर मामला थाने तक जा पहुंचा।सूरज अपने साथियों के साथ थाने में और चांद सीधे घर।प्रिंसिपल सीधे थाने पहुंचे और घायल सूरज से मिले।मामला सुलझाने और समझौता करने-कराने की बात पर समय निकलता गया।छात्रों की लड़ाई में दो समुदाय का तड़का लगते ही एफआईआर हो गया।माहौल में गर्मी बढ़ता देख प्रिंसिपल इकबाल घर चले गए क्योंकि चांद तो उनका ही बेटा था।दूसरे दिन इस बात पर चिल्लम-चिल्ली होती रही कि चांद ने फाइटर से मारकर सिर फोड़ा है या चांद की अंगूठी से लगकर सूरज को गहरी चोट आई है। कलेक्टर के निर्देश पर जांच फिर प्रिंसिपल पर गिरी गाज मामला सुर्खियों में आने के बाद जिला शिक्षाधिकारी पी.के.भटनागर ने स्कूल में एक जांच टीम भेजी।जांच टीम ने सम्बंधित पक्षों उनके पालकों, शिक्षकों और छात्रों के बयान लिए और प्रतिवेदन बनाकर डीईओ श्री भटनागर को सौंप दिया गया।डीईओ ने इसे कलेक्टर डॉ. रवि मित्तल के समक्ष प्रशासनिक कार्यवाही के लिए रखा।जिसका अवलोकन करने के बाद इस घटना में प्रिंसिपल की घोर लापरवाही पाई गई।जिसमें प्रमुख कारण यह माना गया कि अपने स्कूल में सक्षम प्राधिकारी के बिना अनुमति बाहरी स्कूल के 2 छात्रों को प्रवेश दिया गया।तीन दिन का समय देकर कारण बताओ नोटिस प्रिंसिपल को दिया गया। कैसा रहा है प्रिंसिपल इकबाल खान का शिक्षकीय व प्रशासकीय सफर? एक नजर —– 1988 से अपने शिक्षकीय जीवन की शुरुआत करनेवाले इकबाल अहमद खान नारायणपुर थाना अंतर्गत दाराखरिका गांव से आते हैं।इनके बारे में जब हमने जानकारी जुटानी शुरू की तो 36 वर्षों के शिक्षकीय,गैर शिक्षकीय व प्रशासनिक कार्यों में बेदाग रहे।ये राज्यपाल, मुख्यमंत्री व जिला कलेक्टरों द्वारा 2021 से अब तक अपनी कुशल अध्यापन व प्रशासनिक दक्षता से सम्मानित होते आये हैं।इन्होंने मानवता की मिसाल पेश करते हुए 3 नवम्बर 2013 को खेत से लौटते हुए एक बेसुध वृद्ध महिला को देखा,जिसके पैर में बड़ा घाव जिसमें कीड़े रेंग रहे थे।इकबाल उसे अपने घर ले गए और सेवा करने लगे।घाव से कीड़े खुद साफ करते,खाना खिलाते।इसका घर में विरोध भी हुआ लेकिन उन्होंने उसकी सेवा करते हुए उसे ठीक कर दिया।वृद्ध महिला की याददाश्त चली गई थी तो वह इकबाल को ही अपना बेटा मानकर घर में ही रही। सरबकोम्बो हाईस्कूल में प्रिंसिपल के पद पर रहते हुए अपने भाई सुल्तान से 51,000/- रुपये दान में लेकर छात्रों के लिए सायकिल स्टैंड बनवाया।वहीं हाईस्कूल के लिए रास्ते के लिए जनप्रतिनिधियों से बार-बार मांग कर रास्ता तैयार कराया।वर्ष 2022 में राज्य शासन से इन्हें प्रतिनियुक्ति में स्वामी आत्मानन्द उत्कृष्ट अंग्रेजी विद्यालय का प्रिंसिपल बनाया।आत्मानन्द स्कूल के शिक्षकों ने इनके कार्यकाल को अनुशासन व अध्ययन-अध्यापन के लिए स्वर्णिम काल बताया है।वहीं 28 तारीख की घटना के बाद प्रिंसिपल खान के स्थानान्तरण की आशंका से कई विद्यार्थी और उनके अभिभावकों में निराशा है और अब बीच सत्र में ही टीसी लेकर दूसरे स्कूलों में जाने का मन बना रहे हैं। बहरहाल, दो छात्रों की लड़ाई में गैरहाजिर रहे प्रिंसिपल इकबाल खान पिसते नजर आ रहे हैं।जानकारों की मानें तो जब संकल्प कोचिंग के छात्र दूसरे स्कूल के छात्र हो सकते हैं तो प्रिंसिपल के बेटे-भतीजे अनुमति लेकर दूसरे स्कूल में पढ़ रहे हैं तो इसमें इतना बवाल क्यों? अब देखना होगा कि जो आरोप उनके ऊपर लगे हैं वो कितना सही है।