अधिकार से परिणाम की ओर: मनरेगा को VBGRAM-G से बदलने का तर्क

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(अधिकार से परिणाम की ओर: मनरेगा को VBGRAM-G से बदलने का तर्क)   नीरवा मेहता के विचार   सार्वजनिक नीतियों का मूल्यांकन भावना, पुरानी यादों या राजनीतिक प्रतीकों के आधार पर नहीं, बल्कि उनके वास्तविक परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। मनरेगा को विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण अधिनियम, 2025 (VB GRAM G) से बदलने के निर्णय पर स्वाभाविक रूप से विरोध हुआ है। आलोचकों का कहना है कि यह नया कानून अधिकारों को कमजोर करता है, राज्यों पर बोझ डालता है, केंद्र के हाथों में सत्ता का केंद्रीकरण करता है और महात्मा गांधी की विरासत को मिटा देता है। लेकिन ये आपत्तियाँ नीति के वास्तविक स्वरूप से अधिक राजनीतिक मानसिकता को दर्शाती हैं।   VB GRAM G पर सबसे बड़ा आरोप यह है कि यह अधिकार आधारित ढाँचे को तोड़ देता है। यह तर्क इस गलत मान्यता पर आधारित है कि कानूनी अधिकार अपने आप सशक्तिकरण में बदल जाता है। मनरेगा के लगभग दो दशकों के अनुभव ने इस सोच की सीमाओं को उजागर कर दिया है। मजदूरी में लगातार देरी, काम की अधूरी मांग, खराब गुणवत्ता की परिसंपत्तियाँ और असमान क्रियान्वयन ने धीरे-धीरे उस अधिकार को खोखला कर दिया, जिसे न्यायसंगत माना गया था। जो अधिकार समय पर, व्यापक स्तर पर और निरंतर रूप से लागू ही न हो सके, वह व्यवहार में अधिकार नहीं रह जाता। VB GRAM G राज्य की रोज़गार उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी खत्म नहीं करता, बल्कि उसे नए तरीके से संरचित करता है—समयसीमा तय करके, परिणामों से वित्त पोषण जोड़कर और जवाबदेही को संस्थागत रूप देकर। यह अधिकारों का कमजोर होना नहीं, बल्कि उनकी व्यावहारिक सुधार प्रक्रिया है।   इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह नया कानून भारत की विकास सोच में एक आवश्यक बदलाव को दर्शाता है। मनरेगा को तीव्र ग्रामीण संकट के दौर में एक राहत योजना के रूप में तैयार किया गया था। लेकिन यदि संकट आधारित रोज़गार को स्थायी नीति बना दिया जाए, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ठहराव को सामान्य बना देता है। VB GRAM G अल्पकालिक रोज़गार को आजीविका निर्माण, कौशल विकास और उत्पादक परिसंपत्तियों से जोड़ता है। केवल काम के दिनों की गिनती से हटकर स्थायी आय और आजीविका पर जोर देना इस सच्चाई को स्वीकार करता है कि गरिमा केवल काम मिलने से नहीं, बल्कि आय की स्थिरता, उत्पादकता और सामाजिक उन्नति से आती है। जो कल्याणकारी व्यवस्था खुद को समय के साथ नहीं बदलती, वह गरीबी खत्म करने के बजाय निर्भरता को बढ़ावा देती है।   राज्यों पर बढ़ते वित्तीय बोझ की चिंता भी गहराई से देखने पर टिकती नहीं। पुराने ढाँचे में राज्यों को केंद्रीय फंड में देरी, अनियोजित देनदारियों और लागत साझा करने के विवादों का सामना करना पड़ता था। VB GRAM G स्पष्ट वित्तीय भूमिकाएँ, मध्यम अवधि की योजना और परिणाम आधारित वित्तपोषण लाता है। वास्तविक वित्तीय संघवाद की नींव ही पूर्वानुमेयता है। इससे राज्यों को संकट प्रबंधन के बजाय योजनाबद्ध ढंग से काम करने का अवसर मिलता है, जिससे उनकी प्रशासनिक स्वायत्तता मजबूत होती है।   इसी तरह, अत्यधिक केंद्रीकरण का आरोप राष्ट्रीय मानकों और सूक्ष्म प्रबंधन के बीच के अंतर को समझने में चूक करता है। इतने बड़े पैमाने की योजना में पारदर्शिता, पात्रता और निगरानी के लिए एकसमान मानक जरूरी हैं। स्थानीय संस्थाएँ अब भी कार्यों की पहचान करेंगी, परियोजनाएँ लागू करेंगी और क्रियान्वयन की निगरानी करेंगी। फर्क सिर्फ इतना है कि अब प्रदर्शन और जवाबदेही पर जोर दिया गया है। इतिहास बताता है कि बिना निगरानी के विकेंद्रीकरण का लाभ अक्सर श्रमिकों से ज्यादा बिचौलियों को मिला है। VB GRAM G इसी संरचनात्मक दोष को ठीक करने की कोशिश करता है।   सबसे भावनात्मक आलोचना महात्मा गांधी का नाम हटाने को लेकर है। यह तर्क नीति की वास्तविक प्रभावशीलता के बजाय प्रतीकवाद को प्राथमिकता देता है। गांधी की आर्थिक सोच उत्पादक श्रम, आत्मनिर्भरता, विकेंद्रीकृत विकास और नैतिक जिम्मेदारी पर आधारित थी। उनके नाम को बनाए रखते हुए प्रणालीगत अक्षमताओं को स्वीकार करना उनकी विरासत का सम्मान नहीं है। इसके विपरीत, टिकाऊ सामुदायिक परिसंपत्तियों, स्थानीय उद्यम और आजीविका की स्थिरता पर आधारित कार्यक्रम गांधीवादी सिद्धांतों के कहीं अधिक अनुरूप है, बजाय इसके कि केवल जीविका-भर काम को अंतिम लक्ष्य मान लिया जाए।   हर सुधार का विरोध होता है, खासकर जब वह जमी-जमाई राजनीतिक धारणाओं को चुनौती देता है। लेकिन सामाजिक नीति को समय में जकड़कर नहीं रखा जा सकता। भारत की जनसंख्या संबंधी दबाव, वित्तीय सीमाएँ और विकास की आकांक्षाएँ ऐसे साधनों की मांग करती हैं जो मापनीय और ठोस परिणाम दें। VB GRAM G ग्रामीण रोज़गार नीति को इनपुट आधारित अधिकार से हटाकर परिणाम आधारित गारंटी की ओर ले जाने का एक सचेत प्रयास है। इस बदलाव के लिए सतर्कता, निरंतर सुधार और अनुशासित क्रियान्वयन जरूरी होगा। लेकिन सुधार का विरोध करना उससे भी बड़ी विफलता होगी।   असल विकल्प करुणा और दक्षता या अधिकार और सुधार के बीच नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या हम ऐसी कल्याणकारी व्यवस्था चाहते हैं जो बदलती वास्तविकताओं के साथ खुद को ढाले, या फिर ऐसी जो पुरानी संरचनाओं से चिपकी रहे, भले ही उनकी सीमाएँ उजागर हो चुकी हों। VB GRAM G सोच के इसी विकास का संकेत है। इसका लक्ष्य सार्वजनिक खर्च को टिकाऊ ग्रामीण समृद्धि में बदलना है। राष्ट्रीय बहस की दिशा राजनीतिक नॉस्टैल्जिया नहीं, बल्कि यही लक्ष्य तय करना चाहिए। लेखक के बारे में: निरवा मेहता एक राजनीतिक विश्लेषक और स्तंभकार हैं, जो सार्वजनिक नीति, शासन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर लिखती हैं। उनका लेखन सत्ता संरचनाओं, राज्य के व्यवहार और भारत तथा वैश्विक संदर्भ में नीतिगत फैसलों के दीर्घकालिक प्रभावों पर केंद्रित रहता है।

*मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में जशपुर में स्वास्थ्य क्रांति, दो वर्षों में बदली जिले की तस्वीर, आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की मिली बड़ी सौगात….*

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*मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में जशपुर में स्वास्थ्य क्रांति, दो वर्षों में बदली जिले की तस्वीर, आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की मिली बड़ी सौगात….* जशपुर, 19 दिसंबर 2025/मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में बीते दो वर्षों में जशपुर जिले की स्वास्थ्य सेवाओं ने ऐतिहासिक परिवर्तन का साक्षी बना है। कभी सीमित संसाधनों और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझने वाला यह जिला आज आधुनिक चिकित्सा ढांचे, सुदृढ़ आपात सेवाओं और जनकल्याणकारी योजनाओं के कारण प्रदेश के अग्रणी जिलों में अपनी मजबूत पहचान बना चुका है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार से जशपुर की तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। पहले जहां दूरस्थ अंचलों के लोगों को सामान्य उपचार और सुरक्षित प्रसव के लिए भी लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी, वहीं अब जिले में ही उच्च स्तरीय उपचार की सुविधाएं उपलब्ध हो रही हैं। डायलिसिस जैसी जटिल सेवाएं, जो कभी कल्पना से परे थीं, अब जिलेवासियों के लिए सुलभ होती जा रही हैं। *दो वर्षो में मिली स्वास्थ्य के क्षेत्र में मिलीं जिले को कई ऐतिहासिक सौगातें* मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में स्वास्थ्य अधोसंरचना को मजबूत करने के लिए अनेक बड़े निर्णय लिए गए हैं। जशपुर में मेडिकल कॉलेज की स्थापना के लिए वित्त विभाग से 359 करोड़ रुपये की सैद्धांतिक स्वीकृति मिलना जिले के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। इसके साथ ही 220 बिस्तरों वाले अत्याधुनिक अस्पताल के निर्माण के लिए 32 करोड़ रुपये की मंजूरी ने जिले में उच्च स्तरीय चिकित्सा व्यवस्था की नींव रख दी है।अखिल भारतीय कल्याण आश्रम परिसर में 35 करोड़ रुपये की लागत से आधुनिक चिकित्सालय का निर्माण कार्य तीव्र गति से जारी है, जो भविष्य में जशपुर को एक प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र के रूप में स्थापित करेगा। वहीं नर्सिंग शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 8.78 करोड़ रुपये की लागत से नर्सिंग कॉलेज भवन निर्माण को स्वीकृति दी गई है, जिससे जिले को प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की स्थायी उपलब्धता सुनिश्चित होगी। *मातृ-शिशु स्वास्थ्य को मिली प्राथमिकता* मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करते हुए कुनकुरी में 50 बिस्तरों वाले मातृ-शिशु अस्पताल का निर्माण 8.77 करोड़ रुपये की लागत से प्रगति पर है। इसके अतिरिक्त जिले में 14 करोड़ रुपये की लागत से फिजियोथेरेपी महाविद्यालय तथा कुनकुरी में 2 करोड़ 62 लाख रुपये से नेचुरोपैथी भवन निर्माण की स्वीकृति ने स्वास्थ्य सेवाओं को बहुआयामी बनाया है।वहीं मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय की पहल पर जिले के फरसाबहार मुख्यालय में बहुत जल्द सत्य साईं मातृत्व शिशु चिकित्सालय की स्थापना होगी जो जिले वासियों के साथ पड़ोसी राज्यों को भी इसकी सुविधाएं मुहैया होगी। यह नागलोग क्षेत्र वासियों के लिए बड़ी सौगात है।अब स्वास्थय के क्षेत्र में लोगों के लिए यह वरदान साबित होगी। *जिले में आपातकालीन सेवाओं को मिली नई गति* मुख्यमंत्री  विष्णुदेव साय के निर्देश पर जिले में आपात चिकित्सा सेवाओं का उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। स्वास्थ्य आपात स्थितियों में त्वरित सहायता सुनिश्चित करने के लिए जिले को 10 नई 108 संजीवनी एंबुलेंस उपलब्ध कराई गई हैं। अब जिले में कुल 24 संजीवनी एक्सप्रेस एंबुलेंस जीवनरक्षक सेवा प्रदान कर रही हैं। इसके अलावा 102 महतारी एक्सप्रेस की 18 एंबुलेंस गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुंचाकर सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित कर रही हैं। प्रत्येक विकासखंड में शव वाहन की उपलब्धता ने कठिन समय में ग्रामीण परिवारों को बड़ी राहत दी है। *नए स्वास्थ्य केंद्रों की सौगात से ग्रामीण क्षेत्रों को मिला संबल* जिले के स्वास्थ्य ढांचे को जमीनी स्तर पर मजबूत करते हुए कोतबा में 4 करोड़ 37 लाख रुपये की लागत से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भवन निर्माण की स्वीकृति दी गई है। साथ ही जिले के फरसाबहार तहसील के पेटामारा (अंकिरा) एवं गांझियाडीह, दुलदुला तहसील के करडेगा एवं सीरिमकेला तथा कुनकुरी तहसील के केराडीह में 5 नए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना को मंजूरी मिली है,जो ग्रामीण क्षेत्रों की स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ जाएगी। आज जशपुर स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में एक नए युग में प्रवेश कर चुका है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में बीते दो वर्षों में किए गए ये ऐतिहासिक प्रयास जिले को एक मजबूत, सक्षम और आधुनिक स्वास्थ्य मॉडल के रूप में स्थापित कर रहे हैं। यह परिवर्तन केवल अधोसंरचना का नहीं, बल्कि जनता के विश्वास और सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ते कदमों का प्रतीक है।

तलाक-ए-हसन शरीअत की नज़र से : न्याय, जवाबदेही और नैतिक सुधार

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तलाक-ए-हसन शरीअत की नज़र से : न्याय, जवाबदेही और नैतिक सुधार निर्मल कुमार भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 26 नवम्बर 2025 को मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत तलाक-ए-हसन की प्रथा की संवैधानिकता और सामाजिक प्रभावों का गहन परीक्षण करते हुए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया । यह वह क्षण था जब देश ने एक बार फिर देखा कि कैसे अदालतें परंपरा, शरीअत और आधुनिक कानून के संगम पर खड़ी होकर समकालीन समाज के लिए संतुलित रास्ता तलाशती हैं। तलाक-ए-हसन, इस्लामी न्यायविदों के अनुसार, ऐसा तलाक है जिसमें एक निश्चित प्रतीक्षा अवधि और पुनर्मिलन का अवसर निहित रहता है। इसमें पति और पत्नी को अपने वैवाहिक संबंध पर पुनर्विचार करने का समय दिया जाता है। पहली तथा दूसरी बार उच्चारण के बाद विवाह अभी भी पुनर्स्थापित किया जा सकता है, परन्तु तीसरे उच्चारण के बाद यह तलाक अंतिम और अपरिवर्तनीय हो जाता है । इसे तलाक-ए-बिद्दत की तुलना में अधिक विचारशील, मर्यादित और गरिमापूर्ण प्रक्रिया माना गया है, क्योंकि इसमें दम्पत्ति को समय और सम्भावना दी जाती है। आज के डिजिटल समाज में, जब रिश्ते तेजी से बनते और बिखरते हैं, यह मॉडल न्यायपालिका के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करता है कि व्यक्तिगत कानून केवल धार्मिक आज्ञा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना के आधार पर भी समझे जाने चाहिए। अदालत ने स्पष्ट रूप से यह दर्शाया कि धार्मिक ढाँचे के भीतर भी शालीनता, सुनवाई और महिलाओं की सुरक्षा सर्वोपरि रहनी चाहिए। न्यायालय का हस्तक्षेप : प्रक्रिया की त्रुटियाँ और पीड़ित पक्ष की असुरक्षा सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन के मामले में हस्तक्षेप इस दृष्टि से भी आवश्यक पाया कि कई मामलों में प्रक्रिया की विसंगतियाँ पीड़ित पक्ष, विशेषतः महिलाओं, को न्याय के लिए उच्चतम अदालत तक जाने को बाध्य कर देती हैं । अदालत का कक्ष एक ऐसे मंच में बदल जाता है जहाँ पुरुष-प्रधान निर्णय-प्रक्रिया उजागर होती है और महिलाओं की आवाज़ अक्सर पीछे छूट जाती है। मुख्य याचिका में अदालत ने उस पति से कठोर प्रश्न किए जिसने बिना हस्ताक्षर वाले नोटिस के माध्यम से अपने अधिवक्ता से तलाक दिलाने की चेष्टा की। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि वैवाहिक विघटन की प्रक्रिया में प्रतिनिधि-संप्रेषण (delegation) की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे प्रक्रिया की पवित्रता और महिला की गरिमा प्रभावित होती है । न्यायमूर्ति सूर्यकांत का प्रश्न — “क्या आप अपने वकील को निर्देश दे सकते हैं, पर अपनी पत्नी का सामना करने का साहस नहीं?” शायद इस मुकदमे की सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति बनकर उभरा। अदालत ने पति को निर्देशित किया कि वह अपनी पत्नी हीना और बच्चे के साथ संवाद स्थापित करे, स्वयं निर्णय व्यक्त करे और शरीअत में अपेक्षित जिम्मेदारी निभाए । हीना ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि दस्तावेज़-अस्पष्टता के कारण उसके बेटे के स्कूल प्रवेश, पासपोर्ट नवीनीकरण और अभिरक्षा जैसे मुद्दों पर गंभीर अड़चनें उत्पन्न हुईं। अदालत ने तत्परता से राहत प्रदान की और आवश्यक अंतरिम आदेश जारी किए । शरिया और संविधान का संगम : समानता, गरिमा और स्वतंत्रता 2017 की प्रसिद्ध शायरा बानो बनाम भारत संघ मामले में तलाक-ए-बिद्दत को अवैधानिक घोषित किया गया था। इसी संदर्भ में न्यायालय ने तलाक-ए-हसन पर गहराई से विचार करते हुए कहा कि यदि तलाक को धार्मिक प्रावधानों के अनुसार क्रियान्वित करना है, तो हर चरण का शुद्ध पालन अनिवार्य है । अदालत ने यह भी कहा कि तीसरे पक्ष द्वारा तलाक भेजना न केवल असंवैधानिक है बल्कि महिला-सम्मान, एजेंसी और अधिकारिता को भी नुकसान पहुँचाता है। सभा-कक्ष में यह बहस केवल तलाक की तकनीकी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रही; यह महिलाओं की आवाज़, सुरक्षा, वित्तीय अस्तित्व और पुनर्विवाह-समान अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक भी बन गई। जब धार्मिक नियमों का गलत उपयोग होता है, तब स्त्री अक्सर सबसे बड़ा नुकसान झेलती है — आर्थिक, सामाजिक और मानसिक तीनों स्तरों पर। अदालत ने इसी बिंदु पर जोर देते हुए कहा कि इस्लामी सिद्धांत न्याय और करुणा पर आधारित हैं, और यदि प्रक्रिया महिला को असुरक्षित बनाती है, तो उसका सुधार नैतिक दायित्व है।   तलाक-ए-हसन का व्यापक प्रभाव: सुधार, पुनर्मिलन और सामाजिक संदेश अदालत ने एआईएमपीएलबी तथा जमीयत-उलमा-ए-केरल को भी इस बहस का हिस्सा बनने की अनुमति दी, ताकि इस्लामी विवाह-क़ानूनों पर समग्र दृष्टिकोण स्थापित हो सके । इस्लामी शिक्षाओं में ‘सुलह’ सर्वोत्तम मार्ग मानी जाती है, और तलाक-ए-हसन इसी सिद्धांत के निकट है। यह सुनवाई भारतीय समाज के लिए एक सबक के रूप में सामने आई कि न्याय का मक़सद दंड नहीं, बल्कि संरक्षण और संतुलन स्थापित करना है। धार्मिक विधान चाहे जितना पुराना हो, उसका उपयोग मानव गरिमा की रक्षा के अनुरूप होना चाहिए। क़ुरआन स्पष्ट कहता है कि महिला को मेहर, पोस्ट-डाइवोर्स मेंटेनेंस, और सम्पत्ति-स्वामित्व का अधिकार प्राप्त है। तलाक की प्रक्रिया में उसे किसी भी प्रकार से अपमानित या निष्कासित करना इस्लामी सिद्धांत के विरुद्ध है । हीना जैसी महिलाएँ इस न्यायिक प्रक्रिया की प्रतीक बन गई हैं, जिन्होंने अपनी आवाज़ दबने नहीं दी — और अदालत ने दिखाया कि कानून उनके साथ खड़ा है यह फैसला केवल एक मुकदमा नहीं, बल्कि भारतीय न्यायिक इतिहास में शरिया, संवैधानिक समानता और महिला-गरिमा के बीच संतुलन का उदाहरण है। तलाक-ए-हसन पर यह निर्णय बताता है कि धर्म और कानून टकराव नहीं, बल्कि संवाद और सुधार के माध्यम बन सकते हैं। यह केस हमें याद दिलाता है कि न्याय का वास्तविक उद्देश्य सबसे कमजोर को सबसे अधिक सुरक्षा देना है। (लेखक निर्मल कुमार सामाजिक एवं धार्मिक मामलों के जानकार हैं।यह उनके निजी विचार हैं।)

नकली सोने का सौदा करने आए ठग पुलिस के हत्थे चढ़े,एडवांस लेने के बाद हुआ कुछ ऐसा,,,

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*➡️ नकली सोने की बिस्किट दिखा, 10लाख रु की ठगी की कोशिश, तीन गिरफ्तार भेजा जेल* *➡️मामला थाना लोदाम क्षेत्रांतर्गत* *➡️ आरोपियों ने साढ़े चार सौ ग्राम नकली सोने का बिस्किट दिखा, एडवांस के तौर पे ले लिए थे रुपए* *➡️ प्रार्थी ने कराया चेक , तो निकला नकली* *➡️ आरोपियों के विरुद्ध थाना लोदाम में बी एन एस की धारा 318(4),3(5) के तहत अपराध पंजीबद्ध* *➡️ पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से नकली सोने की बिस्किट सहित घटना में प्रयुक्त कार व मोबाइल फोन को भी किया जप्त* *➡️ नाम गिरफ्तार आरोपी क्रमशः -1. कलाम खान उम्र 26 वर्ष।* *2. शंकर लाल भगत उम्र  45 वर्ष।* *3.बिहारी तिर्की उम्र 55 वर्ष* *सभी निवासी ग्राम करकली, थाना कुसमी , जिला बलरामपुर ( छ ग)* दरअसल, मामले का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है कि दिनांक 01.12.25 को थाना लोदाम क्षेत्रांतर्गत ग्राम साईं टांगर टोली निवासी प्रार्थी फिरोज हजाम ने थाना में रिपोर्ट दर्ज कराया था कि माह नवंबर 25 में उसके पास , ग्राम करकली, थाना कुसमी जिला बलरामपुर निवासी आरोपी कलाम खान आया व बताया कि उसके पास लगभग साढ़े चार सौ ग्राम सोने का बिस्किट है, जिसको वह कहीं से पाया है, व बिक्री हेतु ग्राहक खोज रहा है, यदि कोई लेने का इच्छुक है तो, उसे वह कम दाम में ही दे देगा, जिस पर प्रार्थी फिरोज खुद उक्त सोने के टुकड़े को खरीदने को तैयार हो गया, तब आरोपी कलाम खान के द्वारा प्रार्थी को बोला गया कि, उक्त सोने का टुकड़ा, आरोपी के घर में है, जिसे वीडियो कॉल के माध्यम से उसे दिखाएगा, दिनांक 27.11.25 को आरोपी कलाम खान के द्वारा प्रार्थी फिरोज को, वीडियो कॉल के माध्यम से उक्त सोने के टुकड़े को दिखाया गया, जिस पर प्रार्थी सोने को खरीदने के लिए तैयार हो गया, उनके मध्य 10 लाख रु में सौदा तय हुआ था, फिर दिनांक 1.12.25 को आरोपी कलाम खान अपने दो साथियों क्रमशः शंकर भगत व बिहारी तिर्की के साथ थाना लोदाम क्षेत्रांतर्गत ग्राम जामटोली, भलमंडा में क्रेटा कार से आए, तथा प्रार्थी को भी वहीं मिलने के लिए बुलाया, जिस पर प्रार्थी फिरोज हजाम , आरोपियों से मिलने ग्राम जामटोली भलमंडा चला गया, जहां आरोपियों के द्वारा प्रार्थी को बोला गया कि 10 लाख रु लाए हो, तो प्रार्थी फिरोज ने सोने की बिस्किट को देखने की इच्छा जताई, फिर आरोपियों के द्वारा प्रार्थी को झांसे में लेते हुए बोला गया कि एडवांस के तौर पर कुछ रकम दो तभी वे विश्वास करेंगे कि प्रार्थी सोने की बिस्किट को लेने का इच्छुक है , व उसे सोने की बिस्किट का दिखाएंगे, जिस पर प्रार्थी उक्त आरोपियों के झांसे में आ गया, और उन्हें नजराने के तौर पर 10 हजार रुपए दे दिए, फिर आरोपियों के द्वारा प्रार्थी फिरोज को एक सोने जैसी दिखने वाली बिस्किट को, दिखाते हुए, शेष रकम की मांग की जाने लगी, जिस पर प्रार्थी फिरोज हजाम को संदेह होने पर उसके द्वारा बोला गया कि वह शेष रकम तभी देगा जब उक्त सोने की बिस्किट को सुनार से चेक करवाएगा फिर उसके द्वारा लोदाम से ही एक सुनार को ग्राम जामटोली भलमंडा बुलाया गया, सुनार के द्वारा उक्त सोने की बिस्किट को चेक कर बताया गया कि , वह नकली है, जिस पर प्रार्थी फिरोज हजाम के द्वारा, आरोपियों से अपने 10 हजार रुपए को वापस मांगने पर आरोपी उसे बोल रहे थे कि सोना असली है,10 लाख रु दो और सोना ले जाओ, नहीं तो 10 हजार रुपए को भूल जाओ। ➡️ इसी दौरान प्रार्थी फिरोज हजाम के द्वारा ठगी का अहसास होने पर थाना लोदाम पुलिस को फोन के माध्यम से सूचित कर दिया गया था, जिस पर थाना लोदाम से पुलिस टीम के द्वारा तत्काल ग्राम जामटोली भलमंडा पहुंच कर घेराबंदी कर, उक्त तीनों संदिग्धों को धर दबौचा गया। ➡️ पुलिस की पूछताछ पर तीनों संदिग्ध आरोपियों ने अपना नाम क्रमशः 1. कलाम खान उम्र 26 वर्ष। 2. शंकर लाल भगत उम्र उम्र 45 वर्ष। 3.बिहारी तिर्की उम्र 55 वर्ष सभी निवासी ग्राम करकली, थाना कुसमी , जिला बलरामपुर ( छ ग) का रहने वाला बताया, तथा बताया कि उक्त नकली सोने की बिस्किट को उनके द्वारा उत्तर प्रदेश के एक व्यक्ति से लिया गया था, जिसके सम्बन्ध में पुलिस की जांच जारी है। आरोपियों के द्वारा नकली सोने का बिस्किट दिखा, रुपए ठगने को बात भी स्वीकार की गई। पुलिस के द्वारा मौके से नकली सोने की बिस्किट, आरोपियों के मोबाइल फोन व घटना में प्रयुक्त क्रेटा कार को भी जप्त कर लिया है। ➡️ पुलिस के द्वारा आरोपियों के विरुद्ध थाना लोदाम में बी एन एस की धारा 318(4),3(5) के तहत मामला पंजीबद्ध किया गया है। ➡️ पुलिस की पूछताछ पर आरोपियों के द्वारा अपराध स्वीकार करने व प्रयाप्त अपराध सबूत पाए जाने पर उन्हें विधिवत गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर जेल भेजा गया है। ➡️ मामले की कार्यवाही व आरोपियों की गिरफ्तारी में थाना प्रभारी लोदाम निरीक्षक हर्षवर्धन चौरासे , प्रधान आरक्षक प्रदीप लकड़ा, आरक्षक सुशील एक्का व अमर मिंज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। *➡️ मामले में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जशपुर शशि मोहन सिंह ने बताया कि थाना लोदाम क्षेत्र में नकली सोने के साथ, ठगी करने वाले तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर जेल भेजा गया है, अग्रिम कार्यवाही जारी है।*

गोकुलाष्टमी पर्व के शताब्दी वर्ष पर कंडोरा में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब — मूढू बाबा की परंपरा आज भी जीवंत, 100 वर्षों से अटूट आस्था का पर्व

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गोकुलाष्टमी पर्व के शताब्दी वर्ष पर कंडोरा में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब — मूढू बाबा की परंपरा आज भी जीवंत, 100 वर्षों से अटूट आस्था का पर्व अष्टमी के दिन आयुष जल से मां यशोदा अपने कान्हा को कराती हैं स्नान संतोष चौधरी जशपुर,12 नवंबर 2025 – महाकुल समाज के आराध्य भक्त प्रहलाद उर्फ मूढू बाबा द्वारा 1925 में प्रारंभ की गई गोकुलाष्टमी बाल लीला की परंपरा इस वर्ष अपने 100वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। यह अनूठा पर्व आज भी कंडोरा गांव में उसी रीति-रिवाज और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है, जैसा एक शताब्दी पूर्व प्रारंभ हुआ था।आज मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की मौजूदगी में गूंजेगा “जय यादव जय माधव”।   यह बाल लीला सप्तमी की रात से प्रारंभ होती है, जब नौ प्रकार की जड़ी-बूटियों को मिलाकर आयुष जल तैयार किया जाता है। अष्टमी की भोर चार बजे अविवाहित बालक-बालिकाओं को इस आयुष जल से स्नान कराया जाता है, फिर उन्हें तिलक-चंदन लगाकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। चावल के आटे, शकरकंद, छेना और घी से बनी मीठी रोटी तैयार की जाती है, जिसे दही के साथ प्रसाद स्वरूप बच्चों और उपस्थित जनों को वितरित किया जाता है। घर-घर में यही प्रसाद प्रेमपूर्वक परोसा जाता है।       इस बाल लीला का उद्देश्य है — “बालकों की आयु बढ़े तो वंश वृद्धि होगी”, इसी मंगलकामना के साथ महाकुल समाज में गोकुलाष्टमी पर्व मनाया जाता है।   गांव के बुजुर्ग ग्राम पटेल निराकार यादव बताते हैं कि इस परंपरा की शुरुआत स्वर्गीय मूढू बाबा ने की थी, जिन्होंने धर्म, भक्ति और गौसेवा के पथ पर जीवन समर्पित किया। उन्होंने चारों धाम की पैदल यात्रा की थी और प्रायः मथुरा-वृंदावन जाकर गोसेवा में लीन रहते थे। मूढू बाबा कंदोरा और बोडोकछार — दोनों गांवों के जमींदार थे और लगभग 120 एकड़ भूमि के स्वामी थे। उनके तीन पुत्र हुए, जिनमें सबसे छोटे चेतन बोडोकछार में बस गए, जबकि अन्य दो पुत्र कंदोरा में ही रहे। मूढू बाबा ने 1942 में देह त्याग किया।   निराकार यादव बताते हैं कि महाकुल समाज के पूर्वज कृष्णवंशज थे, जो उड़ीसा के संबलपुर क्षेत्र से पलायन कर छत्तीसगढ़ के धर्मजयगढ़, लैलूंगा और आसपास के क्षेत्रों में बस गए। कहा जाता है कि जब उनके सामने खाड़ूंग नदी पड़ी, तो उन्होंने अपने इष्टदेव का सुमिरन किया और नदी सूख गई — जिससे वे सुरक्षित पार हो सके। धीरे-धीरे महाकुल समाज की आबादी बढ़ी और रायगढ़, जशपुर, बिलासपुर सहित पूरे अंचल में फैल गई।   ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार मूढू बाबा का जन्म 1831 में बोडोकछार गांव के मंगल भगत के घर हुआ था। 1910 में उन्होंने कंदोरा में खसरा नंबर 223 के 14 एकड़ 40 डिसमिल क्षेत्र में आम के पौधे लगाए, जो आज “अमराई” के नाम से प्रसिद्ध है। यही स्थान अब महाकुल समाज के यज्ञ नगर – गोकुलधाम के रूप में प्रतिष्ठित है। मूढू बाबा ने उड़िया भाषा में भागवत पुराण, हरिवंश पुराण और महाभारत के पवित्र ग्रंथों का निर्माण करवाया, जो आज भी सुरक्षित हैं और अष्टमी के दिन गोकुलधाम में पूजा के लिए रखे जाते हैं।   मूढू बाबा का जशपुर राज परिवार से गहरा संबंध था। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान राजा देवशरण सिंह जूदेव ने उन्हें राजसी विवाह समारोह का विशेष न्यौता भेजा था, जिसका प्रमाण आज भी मौजूद है।   1963 से कंदोरा की अमराई में गोकुलाष्टमी मेला प्रारंभ हुआ, जो इस वर्ष अपने 62वें वर्ष में है। अब यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में महाकुल समाज की आस्था, एकता और परंपरा का प्रतीक बन चुका है। इस वर्ष के गोकुलाष्टमी शताब्दी पर्व को भव्यता देने के लिए मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय, पद्मश्री जगेश्वर राम यादव, शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, प्रांताध्यक्ष परमेश्वर यादव, रणविजय सिंह जूदेव, राधेश्याम राठिया, गोमती साय, रायमुनि भगत और प्रबल प्रताप सिंह जूदेव जैसे कई प्रमुख अतिथि शामिल हो रहे हैं। प्रशासन द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं, वहीं मेले में दुकानदार अपनी दुकानें सजा रहे हैं और मंच की तैयारी अंतिम चरण में है।   गोकुलाष्टमी पूजा समिति के अध्यक्ष रविशंकर यादव, उपाध्यक्ष कुंवर यादव, कोषाध्यक्ष बिन्नू यादव, सचिव विनोद कुमार यादव एवं सह सचिव गुले यादव अपनी कार्यकारिणी के साथ आयोजन की सफलता हेतु सक्रिय रूप से जुटे हैं।   गोकुलधाम की यह 100 वर्षीय परंपरा आज भी न सिर्फ आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह संदेश देती है —“जहां भक्ति है, वहां वंश की समृद्धि और समाज की एकता सदैव बनी रहती है।”

जशपुर से बड़ी खबर : ड्राइवर महासंगठन की मांगों पर सरकार से मिला सकारात्मक आश्वासन, बस स्टैंड पर मना जश्न

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जशपुर से बड़ी खबर : ड्राइवर महासंगठन की मांगों पर सरकार से मिला सकारात्मक आश्वासन, बस स्टैंड पर मना जश्न जशपुर,कुनकुरी 26 अक्टूबर 2025 – अपनी विभिन्न मांगों को लेकर लंबे समय से संघर्ष कर रहे छत्तीसगढ़ ड्राइवर महासंगठन को आखिरकार बड़ी सफलता मिल गई है। रविवार को जशपुर बस स्टैंड पर उस समय खुशी का माहौल बन गया जब संघ के पदाधिकारियों ने घोषणा की कि राज्य सरकार ने उनकी मांगों को पूरा करने का आश्वासन दे दिया है। इस सूचना के मिलते ही बस स्टैंड जशपुर,कुनकुरी पर मौजूद ड्राइवरों और संगठन के सदस्यों ने जोरदार आतिशबाजी की और एक-दूसरे को गुलाल लगाकर अपनी खुशी जाहिर की। माहौल में खुशी और एकजुटता की झलक स्पष्ट दिखाई दी। संघ के जिलाध्यक्ष फिरन यादव, उपाध्यक्ष ललित यादव, सचिव मुन्ना खान और वरिष्ठ सदस्य चार्जे तिर्की ने बताया कि सरकार से मिले इस सकारात्मक आश्वासन ने पूरे ड्राइवर संघ में नई ऊर्जा भर दी है। उन्होंने कहा — “हमने अपनी जायज मांगों को सरकार के सामने रखा था, और अब जब उस पर सहमति बनी है, तो यह हमारे पूरे समुदाय के लिए बड़ी जीत है।” संघ के पदाधिकारियों ने इस अवसर पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री स्वयं जशपुर जिले से आते हैं, इसलिए उन्होंने ड्राइवर समाज की समस्याओं को करीबी दृष्टि से समझा और संवेदनशीलता के साथ समाधान का आश्वासन दिया। पदाधिकारियों ने कहा — “हमारे मुख्यमंत्री का जशपुर से होना हमारे लिए गर्व की बात है। उन्होंने हमारी तकलीफों को समझा और हमारी आवाज को महत्व दिया। हम तहे दिल से उनका धन्यवाद करते हैं।” बस स्टैंड पर मिठाइयों का वितरण भी किया गया और ड्राइवरों ने इस सफलता को “संघ की एकजुटता की जीत” बताया।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का जशपुर प्रवास आज,करेंगे सोहरई करमा महोत्सव का शुभारंभ — दीपावली पर अपने गृहग्राम बगिया में करेंगे रात्रि विश्राम

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का जशपुर प्रवास आज, करेंगे सोहरई करमा महोत्सव में शामिल — दीपावली पर अपने गृहग्राम बगिया में करेंगे रात्रि विश्राम जशपुर,19 अक्टूबर 2025 – मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय आज दिनांक 19 अक्टूबर 2025 (रविवार) को अपने एकदिवसीय जशपुर प्रवास पर रहेंगे। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार मुख्यमंत्री सुबह 11:40 बजे रायपुर स्थित निवास सिविल लाइन से कार द्वारा पुलिस ग्राउंड हेलीपैड पहुँचेंगे, जहाँ से वे हेलीकॉप्टर द्वारा जशपुर के लिए प्रस्थान करेंगे। मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर दोपहर 1:10 बजे माध्यमिक विद्यालय खेल मैदान हेलीपैड, ग्राम कडोरा (गोकुला आमा बगीचा) पहुँचने का कार्यक्रम है। जहां “महासम्मेलन (सोहरई करमा महोत्सव 2025)” का शुभारंभ करेंगे। यह कार्यक्रम ग्राम कडोरा (गोकुला आमा बगीचा) में अखिल भारतीय रौतिया समाज विकास परिषद के तत्वावधान में आयोजित किया गया है। मुख्यमंत्री साय दोपहर 1:15 से 2:15 बजे तक महासम्मेलन में शामिल होकर समाज के प्रतिनिधियों से चर्चा करेंगे। तत्पश्चात 2:15 से 2:45 तक का समय आरक्षित रखा गया है। कार्यक्रम उपरांत मुख्यमंत्री दोपहर 2:50 बजे हेलीकॉप्टर द्वारा कुनकुरी से प्रस्थान कर 3:10 बजे बगिया हेलीपैड  पहुँचेंगे। इसके बाद वे कार द्वारा अपने निज निवास बगिया जाएंगे। दीपावली पर्व के अवसर पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय आज रात्रि अपने गृहग्राम बगिया में विश्राम करेंगे। अगले दिन 20 अक्टूबर 2025 (सोमवार) का कार्यक्रम आरक्षित रहेगा। दीपावली पर्व पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के गृह जिले में आने की खबर से जिलेवासियों में हर्ष का माहौल है। रौतिया समाज ने महासम्मेलन को भव्य बनाने के लिए खूब मेहनत की है।

जशपुर में 15 अक्टूबर को होगा फिल्म अर्पण का पोस्टर विमोचन, डॉ हरविंदर मांकड़ और आदेश शर्मा रहेंगे विशेष अतिथि

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जशपुर में 15 अक्टूबर को होगा फिल्म अर्पण का पोस्टर विमोचन, डॉ हरविंदर मांकड़ और आदेश शर्मा रहेंगे विशेष अतिथि जशपुर,12 अक्टूबर 2025/ जशपुर की धरती एक बार फिर बड़ी सांस्कृतिक और प्रेरणादायक घटना की साक्षी बनने जा रही है। क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ ग्रेस कुजूर के संघर्षपूर्ण जीवन पर आधारित फिल्म अर्पण का भव्य पोस्टर विमोचन समारोह 15 अक्टूबर को जशपुर में आयोजित होगा। पॉपकॉर्न फ्लिक्स इंडिया के प्रोडक्शन हेड संतोष चौधरी ने बताया कि इस अवसर पर एपीजे अब्दुल कलाम पर पुस्तक लिखने वाले प्रसिद्ध लेखक और लोटपोट पत्रिका के मोटू पतलू के क्रिएटर, सुप्रसिद्ध कार्टूनिस्ट डॉ हरविंदर मांकड़ तथा बालाजी फिल्म्स इंडिया के संस्थापक आदेश शर्मा मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे। खास बात है कि पॉपकॉर्न फ्लिक्स इंडिया की फिल्म अर्पण में नायिका की भूमिका स्वयं डॉ ग्रेस कुजूर ने निभाई है। कार्यक्रम में पूर्व सैनिक भी विशेष रूप से आमंत्रित हैं, क्योंकि डॉ ग्रेस के पिता स्वर्गीय स्तानिसलास कुजूर भारतीय सेना के वीर सैनिक रहे हैं, जिन्होंने चार लड़ाइयां, 1962, 1965, 1971 तथा गोवा मुक्ति संग्राम में अपनी वीरता का प्रदर्शन किया था। डॉ हरविंदर मांकड़ ने कहा कि “जशपुर की खूबसूरत और अनछुई वादियाँ मुझे दोबारा खींच लाई हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जी की स्वच्छ पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता अनुकरणीय है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक पेड़ माँ के नाम अभियान की सफलता देखकर यह फिल्म उसी भावना को समर्पित है।” वहीं, आदेश शर्मा ने भी डॉ ग्रेस के कार्यों से प्रभावित होकर समारोह में शामिल होने की सहमति दी है। वे पिछले 35 वर्षों से मीडिया और फिल्म निर्माण के क्षेत्र में सक्रिय हैं और तथास्तु इंडिया, वायदूत न्यूज नेटवर्क, बालाजी फिल्म्स के संस्थापक होने के साथ ही दूरदर्शन स्ट्रिंगर फेडरेशन ऑफ इंडिया के संयुक्त सचिव के रूप में कार्यरत हैं। यह समारोह न केवल जशपुर की कला और सौंदर्य को राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने वाला साबित होगा, बल्कि डॉ ग्रेस कुजूर के प्रेरक जीवन की कहानी को भी जन-जन तक पहुँचाने का माध्यम बनेगा।

*Brown Sugar* : जशपुर में ‘ऑपरेशन आघात’ की बड़ी कार्रवाई: ब्राउन शुगर के साथ तकीम खान गिरफ्तार, 30 हजार रुपये की मादक पदार्थ जब्त

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जशपुर, 3 अक्टूबर 2025 जशपुर पुलिस द्वारा नशे के सौदागरों के खिलाफ चलाए जा रहे विशेष अभियान ‘ऑपरेशन आघात’ के तहत लोदाम थाना क्षेत्र में एक बड़ी कार्रवाई की गई है। पुलिस ने ग्राम साईं टांगर टोली से एक आरोपी को गिरफ्तार कर उसके कब्जे से ब्राउन शुगर की पुड़ियां जब्त की हैं।   पुलिस के अनुसार, 2 अक्टूबर को मुखबिर से सूचना मिली थी कि मोहम्मद तकीम खान (28 वर्ष), निवासी ग्राम साईं टांगर टोली, अपने पास ब्राउन शुगर रखकर बेचने के लिए ग्राहक तलाश रहा है। सूचना के आधार पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शशि मोहन सिंह के निर्देशन में लोदाम पुलिस की टीम तत्काल कार्रवाई के लिए रवाना हुई।   टीम को देखकर आरोपी भागने की कोशिश करने लगा, लेकिन पुलिस ने पीछा कर घेराबंदी करते हुए उसे हिरासत में ले लिया। तलाशी के दौरान आरोपी के पैंट की जेब से पीले रंग की प्लास्टिक की पन्नी में लिपटी 19 कागज की पुड़ियां बरामद की गईं, जिनमें कुल 1 ग्राम 95 मिलीग्राम ब्राउन शुगर रखी हुई थी। जब्त मादक पदार्थ की बाजार कीमत लगभग 30 हजार रुपये बताई जा रही है।   लोदाम थाना में आरोपी के विरुद्ध एनडीपीएस एक्ट की धारा 21(a) के तहत अपराध दर्ज किया गया है। पुलिस आरोपी से यह भी पता लगाने में जुटी है कि वह ब्राउन शुगर कहां से लाता था और इस नेटवर्क में अन्य कौन लोग शामिल हैं। आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया है।   इस कार्रवाई में थाना प्रभारी लोदाम निरीक्षक हर्षवर्धन चौरासे, उप निरीक्षक सुनील सिंह, सहायक उप निरीक्षक सहबीर भगत, आरक्षक मोरिस किस्पोट्टा, धनसाय राम और राजेश गोप की महत्वपूर्ण भूमिका रही।   वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शशि मोहन सिंह ने बताया कि नशे के कारोबार के खिलाफ ऑपरेशन आघात के तहत पुलिस की कार्रवाई लगातार जारी रहेगी। जिले में मादक पदार्थों की अवैध तस्करी व बिक्री में लिप्त तत्वों पर सख्त निगरानी और सटीक कार्रवाई की जा रही है।

भारत के राष्ट्रीय अध्यापक विनोबा भावे की जयंती पर विशेष लेख,पढ़ें विनायक से विनोबा तक का सफर

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आचार्य विनोबा भावे / जयंती पर विशेष आलेख जन्म : 11 सितंबर 1895 मृत्यु : 15 नवंबर 1982   आज भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और गांधीवादी नेता, संत विनोबा भावे को उनकी जयंती पर कोटि-कोटि नमन। इन्हें महात्मा गांधी का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माना जाता है, और भारत का राष्ट्रीय अध्यापक भी कहा जाता है, जिस कारण लोग संत विनोबा भावे को आचार्य कहकर भी संबोधित करते हैं।   आचार्य विनोबा भावे का जन्म 11 सितंबर, 1895 को महाराष्ट्र के कोलाबा ज़िले के गागोड गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनका मूल नाम ‘विनायक नरहरि भावे’ था। उनके पिता का नाम नरहरि शंभू राव व माता का नाम रुक्मिणी देवी था। उनकी माता एक विदुषी महिला थी। आचार्य विनोबा भावे का ज़्यादातर समय धार्मिक कार्य व आध्यात्म में बीतता था। बचपन में वह अपनी मां से संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर और भगवत् गीता की कहानियां सुनते थे। इसका प्रभाव, उनके जीवन पर काफी गहरा पड़ा और इस वजह से उनका रुझान, आध्यात्म की तरफ बढ़ गया।   आगे चलकर विनोबा भावे ने रामायण, कुरान, बाइबल, गीता जैसे अनेक धार्मिक ग्रंथों का, गहन अध्ययन किया। वह एक कुशल राजनीतिज्ञ, और अर्थशास्त्री भी थे। उनका संपूर्ण जीवन साधू, सन्यासियों व तपस्वी की तरह बीता। इसी कारण, उनको संत कहकर संबोधित किया जाने लगा।   वह इंटर की परीक्षा देने के लिए 25 मार्च, 1916 को मुंबई जाने वाली रेलगाड़ी में सवार हुए, परंतु उस समय उनका मन स्थिर नहीं था। उन्हें लग रहा था कि वह जीवन में जो करना चाहते हैं, वह डिग्री द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। उनके जीवन का लक्ष्य, कुछ और ही था।   अभी उनकी गाड़ी सूरत पहुंची ही थी कि उनके मन में हलचल होने लगी। गृहस्थ जीवन या सन्यास, उनका मन दोनों में से किसी एक को नहीं चुन पा रहा था। तब थोड़ा विचार करने के बाद, उन्होंने संन्यासी बनने का निर्णय लिया, और हिमालय की ओर जाने वाली गाड़ी में सवार हो गए।   1916 में मात्र 21 वर्ष की आयु में, उन्होंने घर छोड़ दिया और साधु बनने के लिए, काशी नगरी पहुंच गए। वहां पहुंचकर, उन्होंने महान पंडितों के सानिध्य में, शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। उस समय, स्वतंत्रता आंदोलन भी अपनी चरम सीमा पर था।   महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटकर भारत आ गए थे। तब विनोबा जी ने अहमदाबाद के कोचरब आश्रम में, गांधी जी से पहली मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद उनका जीवन बदल गया और उन्होंने अपना पूरा जीवन गांधीजी को समर्पित कर दिया।   1921 से 1942 तक, वह अनेकों बार जेल गए। उन्होंने 1922 में नागपुर में सत्याग्रह किया, जिसके बाद उनको गिरफ्तार कर लिया गया। 1930 में विनोबा जी ने, गांधीजी के नेतृत्व में नमक सत्याग्रह को अंजाम दिया। 11 अक्टूबर, 1940 को प्रथम सत्याग्रही के रूप में गांधी जी ने विनोबा भावे को चुना।   समय के साथ गांधीजी और विनोबा जी के संबंध काफी मज़बूत होते गए। वह गांधी जी के आश्रम में रहने लगे, और वहां की गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे। आश्रम में ही उनको विनोबा नाम मिला।   विनोबा भावे ने गरीबी को खत्म करने के लिए, काम करना शुरू किया। 1950 में उन्होंने, सर्वोदय आंदोलन आरंभ किया। इसके तहत, उन्होंने ‘भूदान आंदोलन’ की शुरुआत की। 1951 में, जब वह आंध्रप्रदेश का दौरा कर रहे थे, तब उनकी मुलाकात, कुछ हरिजनों से हुई, जिन्होंने विनोबा जी से 80 एकड़ भूमि उपलब्ध कराने की विनती की।   विनोबा जी ने ज़मींदारों से आगे आकर अपनी ज़मीन दान करने का निवेदन किया, जिसका काफी ज़्यादा असर देखने को मिला और कई ज़मींदारों ने अपनी ज़मीनें दान में दीं। वहीं इस आंदोलन को पूरे देश में प्रोत्साहन मिला। 17 सितम्बर 1992 को हज़ारीबाग़ में इनके नाम पर “विनोबा भावे विश्वविद्यालय” इनके भूदान आंदोलन से प्राप्त जमीन पर स्थापित किया गया। विनोबा भावे जी को भूदान आंदोलन में सबसे ज्यादा जमीन हज़ारीबाग़ में मिली थी।   1959 में उन्होंने, महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए, ब्रह्म विद्या मंदिर की स्थापना की। स्वराज शास्त्र, गीता प्रवचन और तीसरी शक्ति उनकी लिखी किताबों में से प्रमुख है।   नवंबर 1982 में विनोबा भावे गंभीर रूप से बीमार हो गए और उन्होंने अपने जीवन को त्यागने का फैसला किया। उन्होंने जैन धर्म के संलेखना-संथारा के रूप में भोजन और दवा को त्याग दिया और इच्छा पूर्वक मृत्यु को अपनाने का निर्णय लिया। 15 नवंबर, 1982 को विनोबा भावे ने दुनिया को अलविदा कह दिया।