कुनकुरी की राजनीति इन दिनों छत्तीसगढ़ की सियासत में अलग ही पहचान बना रही है। कभी चावल घोटाले के कारण चर्चा में रहा यह छोटा सा नगर अब राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और नगर पंचायत अध्यक्ष विनयशील के रिश्ते और रवैये को लेकर राजनीतिक विश्लेषणों का केंद्र बन गया है।
विष्णुदेव साय का मुख्यमंत्री बनना कुनकुरी के लिए बड़े गौरव की बात है। यह पहला मौका है जब इस अंचल से कोई शीर्ष पद तक पहुंचा है। लेकिन इससे भी ज्यादा दिलचस्प यह है कि मुख्यमंत्री के गृहक्षेत्र में हुए नगर पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में जनता ने कांग्रेस के विनयशील को जिताकर एक नया संदेश दिया। यह लोकतंत्र की ताकत है, जहां व्यक्ति के काम और नीयत को प्राथमिकता दी जाती है, न कि सिर्फ पार्टी को।
विनयशील की कार्यशैली इस वक्त खास चर्चा में है। वे मुख्यमंत्री के “भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस” की नीति का खुलकर समर्थन करते हैं और यही कारण है कि चाहे कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों दलों के भीतर बैठे भ्रष्टाचार के संरक्षक उन्हें पसंद नहीं करते। लेकिन आम जनता में विनयशील का प्रभाव बढ़ता जा रहा है – चाहे वह राशन दुकानों की शुरुआत हो, वार्डों में सक्रियता हो, या पारदर्शिता की कोशिश।
राजनीतिक समीकरणों को अगर सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि विनयशील और विष्णुदेव साय के बीच ‘राजनीतिक मतभेद’ नहीं बल्कि ‘कार्यशैली का संतुलन’ है। विनयशील, जिन्हें विष्णुदेव साय व्यक्तिगत रूप से स्नेह देते हैं, ने कभी भी उनके प्रति असम्मानजनक व्यवहार नहीं किया। नालंदा परिसर के कार्यक्रम में मंच के सामने रहकर भी उन्होंने राजनीतिक मर्यादा का उदाहरण पेश किया।
अब ये भी जान लीजिए विनयशील का विष्णुदेव साय से क्या रिश्ता है तो विनयशील उन्हें चाचा कहता ही नहीं बल्कि जहां तक मुझे अंदाजा है मानता भी है।दरअसल,विनयशील के पिता विष्णु गुप्ता आजीवन संघ विचारधारा के साथ भाजपा से जुड़े रहे।कोरोना में उनकी मृत्यु हो गई।विष्णुदेव साय अपने प्रिय की मृत्यु पर दुखी हुए और मृत्युभोज पर आकर दुःखी परिवार को हिम्मत दी थी।
और यही विनयशील की राजनीति की परिपक्वता है – वे सीधे टकराव नहीं करते, लेकिन चुपचाप बड़े दांव खेलते हैं। नालंदा परिसर का नाम धरती आबा बिरसा मुंडा के नाम करने की मांग इस बात का प्रमाण है। यह सिर्फ एक नामकरण नहीं बल्कि भाजपा की आदिवासी राजनीति के भीतर सेंध लगाने की चतुर चाल भी है। अब यूथ कांग्रेस इस मुद्दे को विश्व आदिवासी दिवस तक आंदोलन का रूप देने की तैयारी में है।
इस सबके बीच भाजपा खेमे में असहजता दिखती है। विनयशील पर काम रोकने के आरोप लगाए जा रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आए। वहीं, विनयशील के विरोधी भी इस बात को नकार नहीं सकते कि वे न सिर्फ जनता के छोटे-छोटे काम करवा रहे हैं, बल्कि कागजी सबूतों के साथ भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर कर रहे हैं – जो स्थानीय राजनीति में दुर्लभ है।
कुनकुरी की राजनीति एक दिलचस्प मोड़ पर है। चाचा-भतीजे की इस जोड़ी को जनता उम्मीद भरी नजरों से देख रही है। जनता को इससे फर्क नहीं पड़ता कि कोई भाजपा में है या कांग्रेस में, उसे बस यह दिखना चाहिए कि उसके इलाके में काम हो रहा है, पारदर्शिता है और उसकी आवाज सुनी जा रही है।
अब देखना यह है कि कुनकुरी की यह ‘सियासी कैमिस्ट्री’ वास्तव में जनता के लिए ‘सुनहरे विकास’ का सूत्र बनेगी या आने वाले चुनावों में यह समीकरण एक नए संघर्ष की ओर बढ़ेगा।
– संपादक
संतोष चौधरी
ख़बर जनपक्ष





















