तलाक-ए-हसन शरीअत की नज़र से : न्याय, जवाबदेही और नैतिक सुधार

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तलाक-ए-हसन शरीअत की नज़र से : न्याय, जवाबदेही और नैतिक सुधार निर्मल कुमार भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 26 नवम्बर 2025 को मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत तलाक-ए-हसन की प्रथा की संवैधानिकता और सामाजिक प्रभावों का गहन परीक्षण करते हुए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया । यह वह क्षण था जब देश ने एक बार फिर देखा कि कैसे अदालतें परंपरा, शरीअत और आधुनिक कानून के संगम पर खड़ी होकर समकालीन समाज के लिए संतुलित रास्ता तलाशती हैं। तलाक-ए-हसन, इस्लामी न्यायविदों के अनुसार, ऐसा तलाक है जिसमें एक निश्चित प्रतीक्षा अवधि और पुनर्मिलन का अवसर निहित रहता है। इसमें पति और पत्नी को अपने वैवाहिक संबंध पर पुनर्विचार करने का समय दिया जाता है। पहली तथा दूसरी बार उच्चारण के बाद विवाह अभी भी पुनर्स्थापित किया जा सकता है, परन्तु तीसरे उच्चारण के बाद यह तलाक अंतिम और अपरिवर्तनीय हो जाता है । इसे तलाक-ए-बिद्दत की तुलना में अधिक विचारशील, मर्यादित और गरिमापूर्ण प्रक्रिया माना गया है, क्योंकि इसमें दम्पत्ति को समय और सम्भावना दी जाती है। आज के डिजिटल समाज में, जब रिश्ते तेजी से बनते और बिखरते हैं, यह मॉडल न्यायपालिका के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करता है कि व्यक्तिगत कानून केवल धार्मिक आज्ञा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना के आधार पर भी समझे जाने चाहिए। अदालत ने स्पष्ट रूप से यह दर्शाया कि धार्मिक ढाँचे के भीतर भी शालीनता, सुनवाई और महिलाओं की सुरक्षा सर्वोपरि रहनी चाहिए। न्यायालय का हस्तक्षेप : प्रक्रिया की त्रुटियाँ और पीड़ित पक्ष की असुरक्षा सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन के मामले में हस्तक्षेप इस दृष्टि से भी आवश्यक पाया कि कई मामलों में प्रक्रिया की विसंगतियाँ पीड़ित पक्ष, विशेषतः महिलाओं, को न्याय के लिए उच्चतम अदालत तक जाने को बाध्य कर देती हैं । अदालत का कक्ष एक ऐसे मंच में बदल जाता है जहाँ पुरुष-प्रधान निर्णय-प्रक्रिया उजागर होती है और महिलाओं की आवाज़ अक्सर पीछे छूट जाती है। मुख्य याचिका में अदालत ने उस पति से कठोर प्रश्न किए जिसने बिना हस्ताक्षर वाले नोटिस के माध्यम से अपने अधिवक्ता से तलाक दिलाने की चेष्टा की। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि वैवाहिक विघटन की प्रक्रिया में प्रतिनिधि-संप्रेषण (delegation) की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे प्रक्रिया की पवित्रता और महिला की गरिमा प्रभावित होती है । न्यायमूर्ति सूर्यकांत का प्रश्न — “क्या आप अपने वकील को निर्देश दे सकते हैं, पर अपनी पत्नी का सामना करने का साहस नहीं?” शायद इस मुकदमे की सबसे महत्वपूर्ण पंक्ति बनकर उभरा। अदालत ने पति को निर्देशित किया कि वह अपनी पत्नी हीना और बच्चे के साथ संवाद स्थापित करे, स्वयं निर्णय व्यक्त करे और शरीअत में अपेक्षित जिम्मेदारी निभाए । हीना ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि दस्तावेज़-अस्पष्टता के कारण उसके बेटे के स्कूल प्रवेश, पासपोर्ट नवीनीकरण और अभिरक्षा जैसे मुद्दों पर गंभीर अड़चनें उत्पन्न हुईं। अदालत ने तत्परता से राहत प्रदान की और आवश्यक अंतरिम आदेश जारी किए । शरिया और संविधान का संगम : समानता, गरिमा और स्वतंत्रता 2017 की प्रसिद्ध शायरा बानो बनाम भारत संघ मामले में तलाक-ए-बिद्दत को अवैधानिक घोषित किया गया था। इसी संदर्भ में न्यायालय ने तलाक-ए-हसन पर गहराई से विचार करते हुए कहा कि यदि तलाक को धार्मिक प्रावधानों के अनुसार क्रियान्वित करना है, तो हर चरण का शुद्ध पालन अनिवार्य है । अदालत ने यह भी कहा कि तीसरे पक्ष द्वारा तलाक भेजना न केवल असंवैधानिक है बल्कि महिला-सम्मान, एजेंसी और अधिकारिता को भी नुकसान पहुँचाता है। सभा-कक्ष में यह बहस केवल तलाक की तकनीकी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रही; यह महिलाओं की आवाज़, सुरक्षा, वित्तीय अस्तित्व और पुनर्विवाह-समान अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक भी बन गई। जब धार्मिक नियमों का गलत उपयोग होता है, तब स्त्री अक्सर सबसे बड़ा नुकसान झेलती है — आर्थिक, सामाजिक और मानसिक तीनों स्तरों पर। अदालत ने इसी बिंदु पर जोर देते हुए कहा कि इस्लामी सिद्धांत न्याय और करुणा पर आधारित हैं, और यदि प्रक्रिया महिला को असुरक्षित बनाती है, तो उसका सुधार नैतिक दायित्व है।   तलाक-ए-हसन का व्यापक प्रभाव: सुधार, पुनर्मिलन और सामाजिक संदेश अदालत ने एआईएमपीएलबी तथा जमीयत-उलमा-ए-केरल को भी इस बहस का हिस्सा बनने की अनुमति दी, ताकि इस्लामी विवाह-क़ानूनों पर समग्र दृष्टिकोण स्थापित हो सके । इस्लामी शिक्षाओं में ‘सुलह’ सर्वोत्तम मार्ग मानी जाती है, और तलाक-ए-हसन इसी सिद्धांत के निकट है। यह सुनवाई भारतीय समाज के लिए एक सबक के रूप में सामने आई कि न्याय का मक़सद दंड नहीं, बल्कि संरक्षण और संतुलन स्थापित करना है। धार्मिक विधान चाहे जितना पुराना हो, उसका उपयोग मानव गरिमा की रक्षा के अनुरूप होना चाहिए। क़ुरआन स्पष्ट कहता है कि महिला को मेहर, पोस्ट-डाइवोर्स मेंटेनेंस, और सम्पत्ति-स्वामित्व का अधिकार प्राप्त है। तलाक की प्रक्रिया में उसे किसी भी प्रकार से अपमानित या निष्कासित करना इस्लामी सिद्धांत के विरुद्ध है । हीना जैसी महिलाएँ इस न्यायिक प्रक्रिया की प्रतीक बन गई हैं, जिन्होंने अपनी आवाज़ दबने नहीं दी — और अदालत ने दिखाया कि कानून उनके साथ खड़ा है यह फैसला केवल एक मुकदमा नहीं, बल्कि भारतीय न्यायिक इतिहास में शरिया, संवैधानिक समानता और महिला-गरिमा के बीच संतुलन का उदाहरण है। तलाक-ए-हसन पर यह निर्णय बताता है कि धर्म और कानून टकराव नहीं, बल्कि संवाद और सुधार के माध्यम बन सकते हैं। यह केस हमें याद दिलाता है कि न्याय का वास्तविक उद्देश्य सबसे कमजोर को सबसे अधिक सुरक्षा देना है। (लेखक निर्मल कुमार सामाजिक एवं धार्मिक मामलों के जानकार हैं।यह उनके निजी विचार हैं।)

सीरत-उन-नबी: आधुनिक ज़िंदगी में भी एक मार्गदर्शन — मेरी दृष्टि से विस्तृत विश्लेषण

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सीरत-उन-नबी: आधुनिक ज़िंदगी में भी एक मार्गदर्शन — मेरी दृष्टि से विस्तृत विश्लेषण निर्मल कुमार   जब मैं पैग़म्बर मुहम्मद के जीवन पर सोचता हूँ, तो मुझे यह महसूस होता है कि उनकी ज़िंदगी इतिहास की कोई पुरानी किताब नहीं, बल्कि आज भी हमारा मार्गदर्शक है। उनकी बोली, उनके विचार, उनके व्यक्तिगत और सामाजिक रिश्ते — सब कुछ ऐसे हैं कि अगर हम उन्हें समझें, तो हमारी जिन्दगी बदल सकती है। उन्होंने दिखाया कि इंसानियत, दया, न्याय, सहानुभूति, नैतिकता — ये सिर्फ अच्छे विचार नहीं, बल्कि व्यवहार का हिस्सा हैं। उनके जीवन की शुरुआत भी बहुत सहज और कई मायनों में कठिन थी। वे एक सामान्य परिवार में पैदा हुए, पिता पहले ही गुज़र चुके थे, और बचपन में ही मां का साया उठ गया। फिर भी उन्होंने कभी हालात के आगे हथियार नहीं डाले। उनका जीवन हमें यह समझाता है कि कठिनाई किसी को बड़ा बनने से रोकती नहीं, बल्कि बड़ा बनाती है, अगर इंसान टूटने के बजाय सीखने का रास्ता चुने।   उनकी ईमानदारी इतनी मशहूर थी कि लोग उन्हें अल-अमीन कहते थे। यह विश्वास अचानक नहीं मिला, बल्कि उनके काम, उनके व्यवहार और उनकी सत्यनिष्ठा ने समाज के दिल में जगह बनाई। किसी भी रिश्ते की जड़ भरोसा होता है, और यह भरोसा उन्होंने शब्दों से नहीं बल्कि कर्मों से कमाया। यही बात आज के समय पर भी लागू होती है — कि पहचान और सम्मान दिखावे या उपाधि से नहीं, बल्कि सिद्धांतों और व्यवहार से बनते हैं।   फिर जब उन्हें पैग़म्बरी मिली, उन्होंने सिर्फ़ इबादत का पैग़ाम नहीं दिया, बल्कि इंसानी जीवन का संतुलित मॉडल पेश किया। उन्होंने बताया कि मजबूत विश्वास वही है जो व्यवहार में दिखे, जो घर में भी उतना ही चमके जितना मस्जिद में, जो बाज़ार के सौदे में भी उतना ही स्पष्ट हो जितना सजदे में। उनकी शिक्षा इबादत के साथ ईमानदारी, रिश्तों के साथ संतुलन, शक्ति के साथ करुणा और न्याय के साथ विनम्रता जोड़ती थी।   उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि जो लोग उनके विरोधी थे वे भी उनकी न्यायप्रियता की गवाही देते थे। उन्होंने कभी नफरत को भाषा नहीं बनने दिया। उन्होंने दिखाया कि बदले की जगह माफी बड़ा रास्ता खोलती है। मक्का की फतह इसका सबसे भव्य उदाहरण है। उन लोगों पर पूरा अधिकार था जिन्होंने उन्हें सताया, अपमानित किया, पत्थर बरसाए, पर उन्होंने तलवार नहीं, क्षमा चुनी। यह केवल इतिहास की घटना नहीं, बल्कि आज के विश्व नेतृत्व के लिए चरित्र की परिभाषा है। अगर राष्ट्र और समाज आज भी उससे सीखें, तो युद्ध की जगह संवाद, टकराव की जगह समाधान और विभाजन की जगह सह-जीवन संभव हो सकेगा।   उनके जीवन में महिलाओं की स्थिति को लेकर भी बड़ा संदेश मिलता है। उन्होंने बेटी का सम्मान किया, पत्नी से सलाह ली, महिलाओं के अधिकार घोषित किए और उन्हें शिक्षा, सामाजिक सहभागिता और आर्थिक भागीदारी का दर्जा दिया। आज जब हम “जेंडर इक्विटी” की बात आधुनिक विचार के रूप में करते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि यह सच एक ऐतिहासिक नमूने के रूप में पहले ही दिया जा चुका है। अगर समाज उस सीख को फिर से पहचान ले, तो घरेलू हिंसा, असमानता और पक्षपात जैसी समस्याएँ काफी कम हो सकती हैं। बराबरी सिर्फ़ कानून नहीं, व्यवहार से आती है — और यही सीरत का सार है।   अब जब हम आधुनिक समाज पर नजर डालते हैं, तो रिश्तों में दरारें, सामाजिक अविश्वास, राजनीतिक ध्रुवीकरण और आध्यात्मिक खालीपन नजर आता है। सीरत-उन-नबी हमें यह एहसास कराती है कि समाधान नए सिद्धांत खोजने में नहीं, बल्कि पुराने सिद्धांतों को जीने में है। मनुष्य तभी संतुलित जीवन जी सकता है जब उसकी नैतिकता और ज़िम्मेदारी उसके विश्वास के बराबर मजबूत हों। सिर्फ़ धार्मिक पहचान काफी नहीं, धार्मिक चरित्र जरूरी है। बरकत वहीं होती है जहाँ धर्म सिद्धांत नहीं, व्यवहार बनकर उतरे।   अगर परिवारों में मामूली बातों पर नाराज़गी टूटने की बजाए बातचीत और क्षमा के रूप में बदल जाए, अगर समाज में कटुता की जगह सम्मान और सुनने की संस्कृति विकसित हो, अगर युवा यह समझें कि ईमानदारी सफलता का दुश्मन नहीं बल्कि नींव है, और अगर राष्ट्र यह याद रखे कि शक्ति शासन का साधन है शासन का चरित्र नहीं — तो दुनिया बदली जा सकती है। और इसका खाका पहले से मौजूद है, बस हमें उसे अपनाना है।   सीरत केवल एक शरीयत या नियम-पुस्तिका नहीं, बल्कि जीवन-कला है। यह सिखाती है कि धार्मिक व्यक्ति वह नहीं जो सिर्फ़ नमाज़ पढ़े या रोज़े रखे, बल्कि वह जो सच बोले, वादा निभाए, भरोसा दे सके, मदद करे, क्षमा करे, ईर्ष्या से बचे, और अपने से कमजोर को अधिकार दे। यह जीवन का वह रूप है, जिसे अपनाकर मनुष्य अपने आप में भी शांति पाता है और समाज को भी देता है। यही चरित्र यदि आज जनमानस में फिर जीवित हो जाए, तो धार्मिक संघर्ष, सामाजिक टूटी हुई संरचनाएँ और नैतिक अवसाद स्वभाविक रूप से कम हो जाएँ।   मेरी दृष्टि में यह विषय सिर्फ़ मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानवता के लिए उपयोगी है। क्योंकि इंसाफ़, सद्भाव, विनम्रता, दया, वचन-पालन, पड़ोस का हक़, स्त्री-पुरुष सम्मान, आर्थिक ईमानदारी — ये किसी एक समाज की जरूरत नहीं, पूरे विश्व की है। नबी ﷺ ने अपने जीवन से सिखाया कि सच्ची क्रांति तलवार से नहीं, चरित्र से आती है। आज भी जितनी हमें प्रौद्योगिकी, विकास और बुद्धि की आवश्यकता है, उतनी ही हमें इंसानियत, धैर्य, संवाद और संवेदनशीलता की भी है।   इसलिए मैं चाहता हूँ कि सीरत पढ़ी भी जाए और जी भी जाए। यह सिर्फ़ शब्द नहीं, आचरण बने। यह सिर्फ़ किताब नहीं, संस्कृति बने। यह सिर्फ़ आदर्श नहीं, अभ्यास बने। उसी दिन समाज शांत होगा, परिवार मजबूत होंगे, मनुष्य संतुलित होगा और धर्म सुंदरतम रूप में सामने आएगा — व्यवहार में, चरित्र में, और इंसानियत में। नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं

ईसाई आदिवासी महासभा ने क्यों कहा “जशपुर के ईसाई फर्जी नहीं, इतिहास और कानून दोनों हमें वैध साबित करते हैं”

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ईसाई आदिवासी महासभा ने क्यों कहा “जशपुर के ईसाई फर्जी नहीं, इतिहास और कानून दोनों हमें वैध साबित करते हैं” जशपुर – हाल ही में एक पूर्व जिला पंचायत सदस्य ने यूट्यूब चैनल के जरिए यह दावा किया कि “जशपुर जिले में 1968 के धर्म स्वतंत्रता अधिनियम के तहत कोई भी व्यक्ति वैधानिक रूप से ईसाई नहीं बना है, इसलिए जशपुर के ईसाई फर्जी हैं।” इस दावे के बाद कुछ लोगों ने काले झंडे दिखाते हुए शहर में क्रिश्चन के हॉली प्लेस खड़कोना में धार्मिक कार्यक्रम का विरोध भी किया। इन आरोपों को ईसाई आदिवासी महासभा, जिला जशपुर ने पूरी तरह गलत और भ्रामक बताया है। महासभा के जिला अध्यक्ष वाल्टर कुजूर ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि जशपुर के ईसाइयों का इतिहास सौ साल से भी पुराना है और उन्हें “फर्जी” कहना अज्ञानता है। ईसाई समुदाय के नेता वाल्टर कुजूर ने बताया कि जशपुर रियासत में ईसाई धर्म अपनाने की शुरुआत 1906–07 में हुई थी। 1908 से 1947 के बीच लगभग      99 प्रतिशत ईसाई परिवारों के पूर्वज ईसाई बने । करीब 1 प्रतिशत लोगों ने 1908 से 1947 की अवधि में धीरे–धीरे धर्म अपनाया। महासभा ने बताया कि यह पूरा समय ऐसा था जब किसी धर्म परिवर्तन के लिए सरकार को सूचना देने या किसी अधिनियम का पालन करने की जरूरत नहीं थी।महासभा ने स्पष्ट किया कि धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 21 अक्टूबर 1968 से लागू हुआ था।1968 के पहले हुए धर्मांतरण पर यह कानून लागू नहीं होता।इसलिए 1906–47 के धर्म परिवर्तन के कोई सरकारी दस्तावेज मिलना संभव नहीं है। 1858 की महारानी विक्टोरिया की घोषणा में थी धर्म की स्वतंत्रता महासभा ने बताया कि 1858 में ब्रिटिश शासन की ओर से जारी घोषणा–पत्र में धर्म की स्वतंत्रता,समान अधिकार,और धार्मिक आधार पर भेदभाव न करने की गारंटी दी गई थी, जिसके आधार पर जशपुर रियासत में धर्म परिवर्तन पूरी तरह वैध था। “जशपुर के ईसाई उतने ही वैध हैं जितने देश–दुनिया के अन्य ईसाई” वाल्टर कुजूर ने कहा कि जशपुर के ईसाई उतने ही वैध हैं जितने देश–दुनिया के अन्य ईसाई । जशपुर के ईसाइयों को फर्जी कहना न केवल गलत है, बल्कि समाज में भ्रम फैलाने की कोशिश है। उन्होंने कहा कि “जिस तरह बाबा साहेब आंबेडकर ने 1956 में लाखों अनुयायियों के साथ वैध रूप से बौद्ध धर्म अपनाया, उसी तरह जशपुर के आदिवासियों ने 1906 से 1947 के बीच वैध रूप से ईसाई धर्म अपनाया है। महासभा ने ऐसे भ्रामक दावे फैलाने वालों पर कार्रवाई की मांग की है।

संडे स्पेशल : देश में कट्टरता बढ़ी, पर ‘मानवतावादी कट्टरता’ की मिसाल बने यातायात निरीक्षक विशाल कुजूर — दो मजदूरों की पीड़ा ने पुलिस अधिकारी को रुला दिया

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देश में कट्टरता बढ़ी, पर ‘मानवतावादी कट्टरता’ की मिसाल बने यातायात निरीक्षक विशाल कुजूर — दो मजदूरों की पीड़ा ने पुलिस अधिकारी को रुला दिया   रायपुर (छत्तीसगढ़ ) – समाज में कट्टरता अक्सर नकारात्मक रूप में देखी जाती है, लेकिन जब यही कट्टरता मानवता के प्रति समर्पण बन जाए तो वह समाज को रोशन करने का काम करती है। रायपुर में पदस्थ यातायात निरीक्षक विशाल कुजूर ऐसी ही ‘कट्टर मानवता’ की मिसाल बनकर सामने आए हैं। शनिवार की शाम उनके व्यवहार और एक भावुक घटना से यह स्पष्ट हो गया कि व्यवस्था संभालने वाले हाथ यदि संवेदनाओं से भरे हों तो किसी की कठिन यात्रा भी आसान बनाई जा सकती है।   दरअसल, इन्स्पेक्टर विशाल कुजूर द्वारा सोशल मीडिया पर साझा की गई एक घटना ने लोगों को झकझोर दिया। रोज की तरह जब वे अपने क्षेत्र में यातायात व्यवस्था देख रहे थे, तभी उनके मुंशी ने दो थके-हारे युवकों को देखकर संदेह जताया और उन्हें बातचीत के लिए बुलाया। बात करने पर पता चला कि दोनों युवक — प्रदीप और संतोष — उड़ीसा के सुंदरगढ़ जिले के एक अंदरूनी गांव से मछली पकड़ने के काम के लिए किसी एजेंट के माध्यम से गोवा ले जाए गए थे।   तीन महीने काम करने के बावजूद उन्हें तनख्वाह नहीं मिली। जब उन्होंने विरोध किया तो जहाज मालिक ने मारपीट कर उन्हें वहां से भगा दिया। भय के कारण ये दोनों गोवा पुलिस तक नहीं गए। जेब में 100 रुपये तक नहीं थे। किसी तरह ट्रेन के बाथरूम में छिपते-छिपाते वे नागपुर पहुँचे, और फिर वहाँ से पाँच दिनों तक पैदल चलकर रायपुर पहुँचे।   दोनों डरे हुए थे, टूटी-फूटी हिंदी बोल रहे थे, और पिछले 7 दिनों की भूख और मुश्किलें उनके चेहरों पर साफ दिख रही थीं। उनका आधार कार्ड, फोन और अन्य दस्तावेज गोवा में ही कंपनी के मालिक के पास बंधक पड़े थे। इनके घरवालों का मोबाइल भी कवरेज की कमी के कारण स्विच ऑफ मिला। स्थिति जानकर विशाल कुजूर ने तुरंत भोजन कराया, कुछ आर्थिक मदद की और दोनों का झारसुगुड़ा तक का टिकट बनवाकर उन्हें ट्रेन में बैठाया। साथ ही अपना मोबाइल नंबर दिया और स्थानीय थाना में शिकायत करने के लिए कहा। दोनों युवकों ने इसकी हामी भरी।   लेकिन इन्स्पेक्टर विशाल को सबसे अधिक भावुक कर देने वाली बात तब सामने आई, जब उन्होंने पूछा कि 8 दिनों तक बिना पैसे के खाना कैसे खाया? दोनों ने सिर झुकाकर जवाब दिया— “नागपुर से रायपुर तक रेलवे ट्रैक के किनारे गिरे पैकेट जमा करके खाते हुए आए हैं…”   इस जवाब ने अधिकारी का दिल दहला दिया। उन्होंने लिखा— “कल इन दो दोस्तों ने सचमुच रुला दिया… अब बस उनके कॉल का इंतज़ार है।”   कुजूर ने लोगों से अपील की है कि रास्ते में ऐसे किसी जरूरतमंद को देखें तो जरूर पूछें और मदद करें। उन्होंने यह भी याद किया कि कोरोना काल में जब वे कुनकुरी थाना प्रभारी थे, तब जशपुर और कुनकुरी के लोगों ने पैदल लौट रहे मजदूरों की जो मिसाल पेश की थी, वह आज भी यादगार है।   दिलचस्प संयोग यह कि 22 नवंबर 2025 को घटी यह घटना उसी तारीख की याद दिलाती है जब 2017 में — ठीक 22 नवंबर को — इन्स्पेक्टर विशाल की पोस्टिंग कुनकुरी थाना में हुई थी। मानवता के प्रति ऐसी कट्टरता ही आज के समय में समाज को जोड़ने और लोगों के जीवन में आशा की लौ जलाने का काम करती है।

गोकुलाष्टमी पर्व के शताब्दी वर्ष पर कंडोरा में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब — मूढू बाबा की परंपरा आज भी जीवंत, 100 वर्षों से अटूट आस्था का पर्व

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गोकुलाष्टमी पर्व के शताब्दी वर्ष पर कंडोरा में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब — मूढू बाबा की परंपरा आज भी जीवंत, 100 वर्षों से अटूट आस्था का पर्व अष्टमी के दिन आयुष जल से मां यशोदा अपने कान्हा को कराती हैं स्नान संतोष चौधरी जशपुर,12 नवंबर 2025 – महाकुल समाज के आराध्य भक्त प्रहलाद उर्फ मूढू बाबा द्वारा 1925 में प्रारंभ की गई गोकुलाष्टमी बाल लीला की परंपरा इस वर्ष अपने 100वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। यह अनूठा पर्व आज भी कंडोरा गांव में उसी रीति-रिवाज और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है, जैसा एक शताब्दी पूर्व प्रारंभ हुआ था।आज मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की मौजूदगी में गूंजेगा “जय यादव जय माधव”।   यह बाल लीला सप्तमी की रात से प्रारंभ होती है, जब नौ प्रकार की जड़ी-बूटियों को मिलाकर आयुष जल तैयार किया जाता है। अष्टमी की भोर चार बजे अविवाहित बालक-बालिकाओं को इस आयुष जल से स्नान कराया जाता है, फिर उन्हें तिलक-चंदन लगाकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। चावल के आटे, शकरकंद, छेना और घी से बनी मीठी रोटी तैयार की जाती है, जिसे दही के साथ प्रसाद स्वरूप बच्चों और उपस्थित जनों को वितरित किया जाता है। घर-घर में यही प्रसाद प्रेमपूर्वक परोसा जाता है।       इस बाल लीला का उद्देश्य है — “बालकों की आयु बढ़े तो वंश वृद्धि होगी”, इसी मंगलकामना के साथ महाकुल समाज में गोकुलाष्टमी पर्व मनाया जाता है।   गांव के बुजुर्ग ग्राम पटेल निराकार यादव बताते हैं कि इस परंपरा की शुरुआत स्वर्गीय मूढू बाबा ने की थी, जिन्होंने धर्म, भक्ति और गौसेवा के पथ पर जीवन समर्पित किया। उन्होंने चारों धाम की पैदल यात्रा की थी और प्रायः मथुरा-वृंदावन जाकर गोसेवा में लीन रहते थे। मूढू बाबा कंदोरा और बोडोकछार — दोनों गांवों के जमींदार थे और लगभग 120 एकड़ भूमि के स्वामी थे। उनके तीन पुत्र हुए, जिनमें सबसे छोटे चेतन बोडोकछार में बस गए, जबकि अन्य दो पुत्र कंदोरा में ही रहे। मूढू बाबा ने 1942 में देह त्याग किया।   निराकार यादव बताते हैं कि महाकुल समाज के पूर्वज कृष्णवंशज थे, जो उड़ीसा के संबलपुर क्षेत्र से पलायन कर छत्तीसगढ़ के धर्मजयगढ़, लैलूंगा और आसपास के क्षेत्रों में बस गए। कहा जाता है कि जब उनके सामने खाड़ूंग नदी पड़ी, तो उन्होंने अपने इष्टदेव का सुमिरन किया और नदी सूख गई — जिससे वे सुरक्षित पार हो सके। धीरे-धीरे महाकुल समाज की आबादी बढ़ी और रायगढ़, जशपुर, बिलासपुर सहित पूरे अंचल में फैल गई।   ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार मूढू बाबा का जन्म 1831 में बोडोकछार गांव के मंगल भगत के घर हुआ था। 1910 में उन्होंने कंदोरा में खसरा नंबर 223 के 14 एकड़ 40 डिसमिल क्षेत्र में आम के पौधे लगाए, जो आज “अमराई” के नाम से प्रसिद्ध है। यही स्थान अब महाकुल समाज के यज्ञ नगर – गोकुलधाम के रूप में प्रतिष्ठित है। मूढू बाबा ने उड़िया भाषा में भागवत पुराण, हरिवंश पुराण और महाभारत के पवित्र ग्रंथों का निर्माण करवाया, जो आज भी सुरक्षित हैं और अष्टमी के दिन गोकुलधाम में पूजा के लिए रखे जाते हैं।   मूढू बाबा का जशपुर राज परिवार से गहरा संबंध था। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान राजा देवशरण सिंह जूदेव ने उन्हें राजसी विवाह समारोह का विशेष न्यौता भेजा था, जिसका प्रमाण आज भी मौजूद है।   1963 से कंदोरा की अमराई में गोकुलाष्टमी मेला प्रारंभ हुआ, जो इस वर्ष अपने 62वें वर्ष में है। अब यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में महाकुल समाज की आस्था, एकता और परंपरा का प्रतीक बन चुका है। इस वर्ष के गोकुलाष्टमी शताब्दी पर्व को भव्यता देने के लिए मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय, पद्मश्री जगेश्वर राम यादव, शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव, प्रांताध्यक्ष परमेश्वर यादव, रणविजय सिंह जूदेव, राधेश्याम राठिया, गोमती साय, रायमुनि भगत और प्रबल प्रताप सिंह जूदेव जैसे कई प्रमुख अतिथि शामिल हो रहे हैं। प्रशासन द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं, वहीं मेले में दुकानदार अपनी दुकानें सजा रहे हैं और मंच की तैयारी अंतिम चरण में है।   गोकुलाष्टमी पूजा समिति के अध्यक्ष रविशंकर यादव, उपाध्यक्ष कुंवर यादव, कोषाध्यक्ष बिन्नू यादव, सचिव विनोद कुमार यादव एवं सह सचिव गुले यादव अपनी कार्यकारिणी के साथ आयोजन की सफलता हेतु सक्रिय रूप से जुटे हैं।   गोकुलधाम की यह 100 वर्षीय परंपरा आज भी न सिर्फ आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह संदेश देती है —“जहां भक्ति है, वहां वंश की समृद्धि और समाज की एकता सदैव बनी रहती है।”

माँ समलेश्वरी के आशीर्वाद से प्रबल प्रताप सिंह जूदेव ने 140 लोगों को कराई घर वापसी,कार्तिक उरांव को किया नमन

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  रायपुर,31 अक्टूबर 2026 – माँ समलेशवरी की पावन धरा सारंगढ़ में विराट हिन्दू सम्मेलन का भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ।कार्यक्रम में अजय उपाध्याय महाराज के सानिध्य में आयोजित कार्यक्रम में 140 धर्मांतरित लोगों की घर वापसी हुई।इस आयोजन में प्रमुख अतिथि प्रबल प्रताप सिंह जूदेव ने उपस्थित होकर सभी 140 धर्मांतरित लोगों के पैर पखारकर उन्हें विधिवत सनातन धर्म में वापसी कराई। अपने उद्बोधन में प्रबल प्रताप सिंह जूदेव ने कहा“माँ समलेशवरी की इस पवित्र भूमि पर आज धर्म की पुनःस्थापना का एक गौरवशाली क्षण है। सनातन धर्म केवल एक आस्था नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक उत्कृष्ट पद्धति है जो समरसता, प्रेम और सत्य के मार्ग पर अग्रसर करती है।” प्रबल ने कहा “यह घर वापसी हम परम पूजनीय कार्तिक उरांव को समर्पित करते हैं जिनकी कल जयंती थी, उन्होंने अपना पूरा जीवन जनजाति समाज के संस्कृति के संरक्षण एवं उनके हक के लिए संघर्ष किया। उन्होंने आगे कहा कि – “पूज्य पिताजी कुमार दिलीप सिंह जूदेव जी द्वारा प्रारंभ किया गया घर वापसी अभियान हमारे जीवन का आधार है, और हम इसे जीवन पर्यंत आगे बढ़ाते रहेंगे। यह केवल एक अभियान नहीं बल्कि एक राष्ट्र निर्माण कार्य हैं जो हमारी संस्कृति, परंपरा और आत्मसम्मान का प्रतीक है।”   कार्यक्रम में घर वापसी छत्तीसगढ़ प्रांत की संयोजिका अंजू गबेल का विशेष सहयोग रहा. उन्होंने अपने भाषण में कहा ” छत्तीसगढ़ के युवाओं को अपने धर्म, संस्कृति के लिए एकजुटता से कार्य करने की आवश्यकता है ” कार्यक्रम की अध्यक्षता संजय भूषण पांडेय, अध्यक्ष जिला पंचायत ( सारंगढ़ ) ने की।इस अवसर पर राजकुमार चौधरी, प्रान्त प्रमुख धर्मजागरण , मेहर बाई नायक, स्वाध्याय प्रमुख, केराबाई मनहर,पूर्व विधायक,ज्योति पटेल, जिलाध्यक्ष भाजपा,मुक्ता वर्मा,उषाकला रेख बाई रामनामी, गुलाराम रामनामी, आचार्य श्रीराम भगत रामनामी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।कार्यक्रम को सफल बनाने युवा टीम में मुख्य रूप में रवि तिवारी, किशन गुप्ता, इशांत शर्मा, धीरज सिंह एवं अन्य लोग उपस्थित रहे।कार्यक्रम का सफल संचालन अमित गोगले द्वारा किया गया।इस अवसर पर सभी वक्ताओं ने धर्म, समाज एवं राष्ट्र की एकता के लिए एकजुट होकर कार्य करने का आह्वान किया।

आलेख : विविधता में एकता – राष्ट्र निर्माण में संस्कृति, कला और परंपराओं की भूमिका

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आलेख : विविधता में एकता – राष्ट्र निर्माण में संस्कृति, कला और परंपराओं की भूमिका भारत की एकता केवल संविधान या कानूनों से संचालित नहीं होती, बल्कि यह हमारे जीवन के हर पहलू में रची-बसी है। यह एकता हमारे त्योहारों, लोककला, संगीत, भाषा, परिधान, भोजन और परंपराओं में सांस लेती है। भारत की सच्ची ताकत उसकी विविधता में छिपी है—जहाँ अलग-अलग धर्म, भाषाएँ और संस्कृतियाँ एक साथ मिलकर एक ऐसा रंगीन मोज़ेक बनाती हैं जो दुनिया में अद्वितीय है। राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर हमें यह स्मरण करना चाहिए कि हमारी सांस्कृतिक विविधता केवल पहचान नहीं, बल्कि हमारे राष्ट्र की आत्मा है। कश्मीर की सूफियाना कव्वालियों से लेकर कन्याकुमारी के भरतनाट्यम तक, राजस्थान के लोकगीतों से लेकर नागालैंड के जनजातीय नृत्यों तक, भारत का हर क्षेत्र अपनी विशिष्टता में चमकता है। यह विविधता विभाजन नहीं लाती, बल्कि एक-दूसरे के अनुभवों और भावनाओं को जोड़ती है। जब हम किसी और क्षेत्र के त्योहार में शामिल होते हैं या किसी अन्य भाषा का गीत गुनगुनाते हैं, तब हम अपने राष्ट्र की एकता को और गहराई से महसूस करते हैं। मेले, उत्सव और स्थानीय परंपराएँ केवल मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि वे आपसी मेल-जोल और सांस्कृतिक संवाद के पुल हैं। भारतीय समाज में महिलाओं की भूमिका इस सांस्कृतिक निरंतरता का केंद्र बिंदु है। वे घर से लेकर समाज तक परंपराओं की संवाहक और एकता की प्रतीक हैं। किसी भी त्योहार की तैयारी, लोककला का संरक्षण, पारिवारिक रस्मों का निर्वाह या समुदायिक समन्वय—हर स्तर पर महिलाओं का योगदान अद्वितीय है। वे लोककथाएँ सुनाकर, लोकगीत सिखाकर और बच्चों में परंपरागत मूल्यों को रोपित करके न केवल संस्कृति को जीवित रखती हैं, बल्कि सामाजिक एकजुटता को भी सशक्त बनाती हैं। वास्तव में, महिलाएँ उस अदृश्य शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं जो समाज को भीतर से जोड़ती है। भारत की कला और संगीत केवल सौंदर्य की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के उपकरण हैं। शास्त्रीय नृत्य की लय, लोकगीतों की आत्मा, नाटकों का संदेश और चित्रकला की भावनाएँ – सब मिलकर नागरिकों में साझा चेतना का निर्माण करती हैं। जब कोई बच्चा स्कूल में भांगड़ा और भरतनाट्यम दोनों सीखता है, या जब किसी कार्यक्रम में कथक और ओडिसी साथ प्रस्तुत होते हैं, तब यह केवल कला नहीं होती – यह एकता की भाषा होती है। यही कारण है कि एकता दिवस जैसे अवसरों पर बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ हमारे राष्ट्रीय चरित्र की जीवंत झलक पेश करती हैं। त्योहार भारत के समाज को जोड़ने वाली सबसे बड़ी शक्ति हैं। दीवाली की रोशनी, ईद का सेवरीं, पोंगल का भात या बैसाखी की फसल – हर त्योहार अपने भीतर साझेदारी और पारस्परिक सम्मान का संदेश रखता है। इन अवसरों पर जब समाज के लोग साथ मिलकर उत्सव मनाते हैं, तो धर्म, भाषा और क्षेत्र की दीवारें स्वतः गिर जाती हैं। ऐसे साझा अनुभव सामाजिक जिम्मेदारी, सहिष्णुता और सहयोग की भावना को जन्म देते हैं। यही भावना भारत को एक ऐसा राष्ट्र बनाती है जहाँ भिन्नताएँ टकराती नहीं, बल्कि मिलकर नई पहचान बनाती हैं। संस्कृति की यह एकता केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि संस्थागत भी है। जहाँ संस्कृति लोगों को जोड़ती है, वहीं शासन और नीतियाँ उस एकता की रक्षा करती हैं। प्रशासनिक संस्थाएँ, कानून व्यवस्था और नीतिगत ढाँचे यह सुनिश्चित करते हैं कि हर नागरिक को अपनी संस्कृति और परंपरा को सुरक्षित रखने की स्वतंत्रता मिले। जब सरकार कला, संगीत, नाटक, लोककला और सांस्कृतिक त्योहारों को प्रोत्साहन देती है, तो वह न केवल कलाकारों का सम्मान करती है, बल्कि समाज की एकजुटता को भी सशक्त बनाती है। भारत की एकता का ताना-बाना कानून और जीवन दोनों के धागों से बुना गया है। संस्कृति, कला, संगीत और विविधता वह सामाजिक गोंद हैं जो हमें एक साथ बाँधते हैं, जबकि संस्थाएँ इस एकता को सुरक्षा और संरचना प्रदान करती हैं। राष्ट्रीय एकता दिवस का यह संदेश हमें याद दिलाता है कि एकता और विविधता विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक मूल्य हैं। राष्ट्र निर्माण केवल साझा शासन से नहीं, बल्कि साझा भावनाओं, परंपराओं और मूल्यों से संभव होता है। जब हम हर संस्कृति को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, तब हम न केवल भारत की आत्मा को समझते हैं, बल्कि उसे और मजबूत भी बनाते हैं। यही वह दृष्टिकोण है जो भारत को एक जीवंत, सशक्त, सामंजस्यपूर्ण और दूरदर्शी राष्ट्र के रूप में स्थापित करता है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय धर्मपत्नी के साथ पहुंचे छठ घाट, सर में पूजा सामग्री ढोकर आते मुख्यमंत्री की EXCLUSIVE तस्वीरें

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जशपुर 28 अक्टूबर 2025/ मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कौशल्या साय ने आज छठ महापर्व त्यौहार के अवसर पर जशपुर के कुनकुरी छठ घाट में उगते सूर्य को अर्घ्य देकर प्रदेश के सुख समृद्धि और खुशहाली की कामना की। मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों को छठ पूजा की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दी। उन्होंने कहा कि आज बड़े ही सौभाग्य का दिन है कि मुझे अपने विधानसभा क्षेत्र में छठ पर्व में शामिल होने का अवसर मिला। मुख्यमंत्री ने कहा कहा कि कुनकुरी छठ घाट के लिए लगभग 5 करोड़ 17 लाख की राशि से छठ का घाट का सौन्दर्यकरण किया जाएगा इस वर्ष के छठ महापर्व में व्रती महिलाएं छठ घाट में पूरे श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना भी कर रही है। इस अवसर पर बीजेपी जिलाध्यक्ष भरत सिंह,कलेक्टर रोहित व्यास, पुलिस अधीक्षक शशिमोहन सिंह सहित छठ पूजा करने वाली व्रती महिलाएं और जनप्रतिनिधीगण और ग्रामीणजन बड़ी संख्या में मौजूद थे। *छठ पर्व का धार्मिक महत्व सूर्य उपासना:* सूर्य देव को जीवन, ऊर्जा, और स्वास्थ्य का स्रोत माना गया है। छठ पूजा में सूर्य की आराधना करके श्रद्धालु उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। छठ महापर्व में व्रती (उपासक) पूरी तरह शुद्धता, और आस्था के साथ चार दिनों तक उपवास, स्नान, और पूजा करती है। छठ पूजा में समाज के सभी लोग मिलकर घाट सजाते हैं, प्रसाद बनाते हैं और एक साथ पूजा करते हैं।

उरांव महिलाओं ने दिखाई शौर्यगाथा की झलक, पारंपरिक ‘जनी शिकार’ का किया प्रदर्शन, पांच दिवसीय सम्मेलन में संस्कृति, परंपरा और अस्तित्व की रक्षा का लिया संकल्प, हजारों महिलाओं ने पुरुष वेश में नगाड़ों की थाप पर किया जुलूस, धर्मांतरण के खिलाफ गरजे गणेश राम भगत

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जशपुर,23 मई 2025 – जशपुरनगर के तेतरटोली में 18 से 22 मई तक हिन्दू उरांव महिला समिति के बैनर तले एक पांच दिवसीय महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य उरांव समाज की महिलाओं को अपनी पारंपरिक संस्कृति, लोकगीत, नृत्य और जातिगत परंपराओं से जोड़ना था, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी मूल पहचान और गौरवशाली विरासत को समझ सकें। कार्यक्रम के अंतिम दिन ऐतिहासिक ‘जनी शिकार’ परंपरा का प्रतीकात्मक प्रदर्शन हुआ, जिसमें हजारों महिलाओं ने पारंपरिक पुरुष वेश में हाथों में पारंपरिक हथियार लेकर नगाड़ों की थाप पर शहर में विशाल रैली निकाली। यह प्रदर्शन रोहतासगढ़ की उस गौरवशाली गाथा की याद दिलाने के लिए था, जब उरांव महिलाओं ने अपने शौर्य से मुगलों को तीन बार पराजित किया था। आमसभा में जनजाति सुरक्षा मंच के राष्ट्रीय संयोजक गणेश राम भगत ने धर्मांतरण पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि छोटा नागपुर क्षेत्र को ‘ईसाई राज’ में बदलने की साजिशें लगातार चल रही हैं, लेकिन समाज अब जागरूक हो चुका है। उन्होंने डीलिस्टिंग कानून की मांग को दोहराते हुए सरकार से इस पर ठोस कदम उठाने का आग्रह किया। फोटो: पारंपरिक परिधान में दंत चिकित्सक डॉ कांति प्रधान अन्य सामाजिक नेताओं के साथ रैली में सभा में झारखंड के संदीप उरांव और अंबिकापुर से आए डॉ. आज़ाद भगत ने भी अपने विचार रखते हुए कहा कि यदि जनजातीय समाज अपनी भाषा, परंपरा और रीति-रिवाजों को नहीं भूले, तो धर्मांतरण जैसी चुनौतियों से सहजता से निपटा जा सकता है। इस मौके पर गणेश राम भगत ने जशपुर रेल परियोजना में अवरोध उत्पन्न करने वालों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि यह जनभावना से जुड़ा मामला है, और ऐसे तत्वों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। साथ ही उन्होंने संरक्षित जंगलों में अंधाधुंध पेड़ कटाई पर नाराजगी जाहिर करते हुए उसकी जांच की मांग की तथा बारिश में वृक्षारोपण का आह्वान किया। इस आयोजन में हज़ारों की संख्या में महिलाएं और समाजजन शामिल हुए। तेज धूप में रैली में शामिल लोगों के सेवा में शहर के सामाजिक संगठनों ने भी भागीदारी निभाई। संवेदना फाउंडेशन, श्री बालाजी जन कल्याण समिति, और गुड मॉर्निंग ग्रुप जैसे संगठनों ने रैली में शामिल लोगों को पानी, शीतल पेय और फल वितरित कर सेवा भाव का परिचय दिया। यह आयोजन न केवल सांस्कृतिक जागरूकता का प्रतीक बना, बल्कि सामाजिक एकता, जनजागरण और आत्मगौरव की मिसाल भी प्रस्तुत कर गया।

मुख्यमंत्री VDS आज जगन्नाथ मंदिर दोकड़ा के उद्घाटन में होंगे शामिल,सुशासन तिहार में भी देंगे समय

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जशपुर,21 मई 2025 – प्रदेश के मुखिया विष्णुदेव साय आज कांसाबेल विकासखंड के दोकड़ा गांव में  उतरेंगे।प्रशासनिक तैयारी  और जगन्नाथ मंदिर से जुड़े लोगों से चर्चा के अनुसार  दोकड़ा ग्राम में वर्षों पुराना जगन्नाथ मंदिर को नए सिरे से पूरी भव्यता और ओड़िशी वास्तुकला के साथ निर्माण किया गया है।इस मंदिर के निर्माण में स्वयं विष्णुदेव साय ने रुचि दिखाई और अपने विश्वस्त पुरुषोत्तम सिंह,बलराम भगत  समेत दोकड़ा के भाजपा कार्यकर्ता,पदाधिकारियों के अथक प्रयास से आज वह दिन आ गया है ,जब मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय अपनी धर्मपत्नी श्रीमती कौशल्या साय के साथ भगवान जगन्नाथ मंदिर के महाआयोजन में उपस्थित होंगे। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का शाम 4 बजे के करीब कार्यक्रम में आने की संभावना है।जिसको लेकर प्रशासनिक तैयारियां पूरी हो चुकी है।आज सुशासन तिहार भी दोकड़ा गांव में मनाया जायेगा।इन दोनों बड़े आयोजन में शामिल होने बड़ी संख्या में लोगों का आना शुरू हो चुका है।पुलिस व्यवस्था चुस्त दुरुस्त है।