जशपुर से हिमालय तक: जनजातीय युवाओं की ऐतिहासिक चढ़ाई की तैयारी

IMG 20250826 WA0013

जशपुर –  26 अगस्त 2025/ छत्तीसगढ़ का जशपुर जिला जो अब तक अपनी हरियाली, झरनों और शांत वनों के लिए प्रसिद्ध रहा है, देशदेखा क्लाइम्बिंग सेक्टर की स्थापना के बाद अब एक और नई पहचान बनाने जा रहा है।जिले के आदिवासी युवा हिमालय की चोटियों पर अल्पाइन तरीके की रॉक क्लाइम्बिंग चढ़ाई के लिए निकलने की तैयारी कर रहे हैं। मियार वैली ट्राइबल अल्पाइन एक्सपेडिशन 2025 केवल एक पर्वतारोहण अभियान नहीं है, बल्कि यह पूरे प्रदेश और देश के लिए गर्व और उम्मीद की कहानी बन रहा है। इस अभियान के लिए अंतिम चरण में पाँच युवाओं का चयन किया गया है, जिनकी अपनी-अपनी कहानियाँ प्रेरणादायक हैं। रुसनाथ भगत जो एम.ए. हिस्ट्री के छात्र और एनसीसी कैडेट हैं, शहर में अपने लोकप्रिय नेपोलियन चाउमिन सेंटर चलाते हैं और कंटेंट क्रिएशन में भी सक्रिय हैं। तेजल भगत एम.एससी. बॉटनी की छात्रा, अपने गाँव बस्ता में एकता क्लब के ज़रिए शिक्षा और बाल अधिकारों के लिए काम करती हैं। सचिन कुजूर, एम.ए. हिस्ट्री के छात्र, जय हो एनजीओ से जुड़े रह चुके हैं और सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता फैलाने के साथ-साथ मंडार, एक पारंपरिक जनजातीय वाद्य, बजाने में माहिर हैं। प्रतीक, बी.कॉम स्नातक और एनएसएस वॉलंटियर, खेती करना पसंद करते हैं और परिवार का सहारा बनने के लिए बर्तन की दुकान में काम भी कर चुके हैं। वहीं रवि सिंह, बाइक मैकेनिक और साइकिलिंग के शौकीन, ने हाल ही में जशपुर का पहला देशदेखा क्लाइम्बिंग को. नामक एडवेंचर गाइडिंग कार्य बाकी प्रशिक्षित युवाओं के साथ शुरू किया है। टीम को जशपुर के जंगलों और आसपास की चट्टानों में कठोर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यहाँ उन्हें कैंपिंग, ट्रैड क्लाइम्बिंग, रूट ओपनिंग, वाइल्डरनेस फर्स्ट एड और माउंटेन एथिक्स जैसी अहम तकनीकें सिखाई जा रही हैं। प्रशिक्षण की कमान स्वप्निल शिरीष रचेलवार, अमेरिका से डेव गेट्स, रनर्सग्च से सागर दुबे, प्रसिद्ध भारतीय कोच प्रतीक निनवाने वर्तमान में यू मुम्बा कबड्डी टीम के प्रमुख फिटनेस कोच और काफी मीडिया से ईशान गुप्ता जैसे अनुभवी प्रशिक्षकों के हाथों में है। यह प्रशिक्षण केवल शारीरिक तैयारी नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता और नेतृत्व क्षमता विकसित करने पर भी केंद्रित है। जिला प्रशासन एवं राज्य सरकार के इस अभियान को स्थानीय लोगों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बड़े पैमाने पर समर्थन मिला है। विश्व की सबसे बड़ी पर्वतारोहण उपकरण निर्माता कंपनी पेटज़ल ने भारत में अपने साझेदार अलाइड सेफ्टी इक्विपमेंट के साथ मिलकर आधिकारिक उपकरण प्रायोजक की भूमिका निभाई है। अद्वेनोम एडवेंचर और जय जंगल ने पौष्टिक और ऑर्गेनिक भारतीय शैली के एडवेंचर फ़ूड उपलब्ध कराने का जिम्मा उठाया है। रनर्सग्च्, एक प्रतिष्ठित एथलीट कोचिंग ब्रांड, टीम की शारीरिक और मानसिक मजबूती पर काम कर रहा है। इसके साथ स्पेन की प्रसिद्ध बार्सिलोना क्लाइम्ब्स और मिस्टिक हिमालयन ट्रेल्स ने गाइडिंग और बेसकैंप गतिविधियों में सहयोग दिया है। इस अभियान का संचालन पहाड़ी बकरा एडवेंचर कर रहा है। वहीं छत्तीसगढ़ का प्रमुख औद्योगिक समूह हिरा ग्रुप इस पहल से प्रेरित होकर आधिकारिक प्रायोजक बना है। रेकी ऑउटडोर्स ने टीम को आधिकारिक पर्वतीय परिधान मुहैया कराए हैं, जबकि रेडपांडा ऑउटडोर्स और गोल्डन बोल्डर्स ने उपकरण सपोर्ट दिया है। आदि कैलाश वेलनेस पार्टनर के रूप में टीम के स्वास्थ्य और रिकवरी में सहयोग कर रहा है। मुख्य प्रायोजकों के अलावा कुल मिलाकर 15 कंपनियों ने अपना सहयोग प्रदान कर इसे शुरुआत से ही एक सफल अभियान बना दिया है। जशपुर से निकले ये पाँच युवा अब हिमालय की मियार वैली की ऊँचाइयों को छूने के सपने के साथ आगे बढ़ रहे हैं। ज्ञात रहे कि यह टीम 31 अगस्त को जशपुर से हिमाचल प्रदेश की ओर गंतव्य के लिए निकलेगी। एक महीने के इस अभियान पर जनजातीय युवक देश-विदेश के प्रसिद्ध माउंटेन क्लाइम्बर्स के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लीडर के तौर पर प्रतिभाग करेंगे। यह पहल केवल उनके लिए ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश और देश के लिए एक प्रेरणा है। यह साबित कर रही है कि अवसर और सहयोग मिलने पर जंगलों और गाँवों से भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के पर्वतारोही तैयार हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अभियान आने वाले समय में भारतीय हिमालयी पर्वतारोहण की दिशा बदल सकता है और अगली पीढ़ी के अल्पाइन क्लाइम्बर्स इन्हीं अप्रत्याशित इलाकों से निकल सकते हैं। यह केवल एक चढ़ाई नहीं, बल्कि बदलाव की चढ़ाई है।

छत्तीसगढ़ में शुरू हुआ डॉ. हरविंदर मांकड़ की नई फिल्म ‘अर्पण’ का सफर, ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान को समर्पित,

IMG 20250822 WA0007

कुनकुरी (जशपुर, छत्तीसगढ़): 22/08/2025 कुनकुरी की धरती पर आयोजित एक अद्वितीय और यादगार संध्या ने पूरे जशपुर ज़िले के लिए एक ऐतिहासिक पल रच दिया। इस अवसर पर प्रसिद्ध लेखक, कार्टूनिस्ट और फिल्म निर्देशक डॉ. हरविंदर मांकड़ को जी.के. साइकोथेरेपी एंड रिहैबिलिटेशन सेंटर द्वारा विशेष रूप से मुंबई से आमंत्रित किया गया।   आदिवासी नृत्य से हुआ स्वागत डॉ. मांकड़ के आगमन पर सबसे पहले केरसई गाँव की आदिवासी जनजाति ने परंपरागत कर्मा नृत्य प्रस्तुत किया। इस नृत्य में आदिवासी संस्कृति की जीवंत झलक देखने को मिली। स्थानीय कलाकारों ने ढोल-नगाड़ों और लोकगीतों की थाप पर डॉ. मांकड़ का स्वागत कर कार्यक्रम को और भी गरिमामयी बना दिया। आदिवासी समाज की कला और संस्कृति को इस अवसर पर विशेष रूप से प्रदर्शित किया गया, जिसे देखकर सभी अतिथि भाव-विभोर हो उठे। इसके बाद महान कार्टूनिस्ट कुनकुरी जीके साइकोथेरेपी एंड रिहैबिलिटी सेंटर पहुंचे जहां छत्तीसगढ़ और झारखंड से पहुंचे लोगों ने आत्मीय स्वागत किया।मुख्य अतिथि के रूप में श्री मांकड़ ने विशिष्ट अतिथियों दीपक बड़ा,रोशन किरो ,नितेश महतो के साथ दीप जलाकर अर्पण कार्यक्रम का शुभारंभ किया। श्री मांकड़ ने ‘प्योर सोल चिल्ड्रेन’ कुमारी नीति के हाथों अपनी किताब Journey of Soul का विमोचन हुआ। इसके बाद डॉ. हरविंदर मांकड़ ने अपनी प्रेरणादायी मोटिवेशनल क्लास में उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए कहा – “बच्चे सभी ईश्वर की अनुपम देन हैं। इन्हें भरपूर प्यार दीजिए, ये किसी से कम नहीं हैं। बस इन्हें सही इलाज और अपनापन दीजिए, यही इनकी असली ताक़त बनेगी।” उनके शब्दों ने न केवल विशेष बच्चों के अभिभावकों के दिलों को छुआ, बल्कि हर उस व्यक्ति को नई सोच दी जो समाज सेवा और मानवता की राह पर चलना चाहता है। विशेष बच्चों के उपचार में मील का पत्थर मानी जाने वाली डॉ. ग्रेस कुजूर ने अपने विचार रखते हुए कहा –“डॉ. हरविंदर मांकड़ का कुनकुरी आना किसी करिश्मे से कम नहीं है। उनका यहां आना और हमें अपना कीमती समय देना, हमारे लिए सौभाग्य की बात है। वे जिस आत्मीयता से विशेष बच्चों से जुड़े, वह इस क्षेत्र के लिए प्रेरणादायी है।” नई फिल्म “अर्पण” का निर्माण शुरू इस अवसर पर यह भी घोषणा की गई कि डॉ. हरविंदर मांकड़ कुनकुरी में ही डॉ. ग्रेस कुजूर पर एक डॉक्यूमेंट्री फिक्शन फिल्म का निर्माण कर रहे हैं। इस फिल्म का नाम है – “अर्पण”। यह फिल्म छत्तीसगढ़ के पर्यावरण अभियानों को बढ़ावा देने और प्रधानमंत्री के ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान को समर्पित है। इस फिल्म को स्वयं डॉ. हरविंदर मांकड़ ने लिखा और निर्देशित किया है। फिल्म के माध्यम से न केवल डॉ. ग्रेस कुजूर की अनूठी सेवाओं को दिखाया जाएगा, बल्कि समाज को यह संदेश भी दिया जाएगा कि प्रकृति और मानवता का संरक्षण साथ-साथ चलना चाहिए।   छत्तीसगढ़ की सुंदरता की सराहना की कार्यक्रम का संचालन  संतोष चौधरी ने किया। उन्होंने बताया कि डॉ. मांकड़ छत्तीसगढ़ की सुंदरता से गहराई तक प्रभावित हुए हैं। डॉ. मांकड़ के शब्दों में –“मैंने छत्तीसगढ़ से अधिक सुंदर जगह आज तक नहीं देखी। कुनकुरी की धरती सचमुच स्वर्ग के समान है। यहाँ की सादगी, अपनापन और प्राकृतिक सौंदर्य मन को छू लेने वाला है।” कुनकुरी के गणमान्य नागरिक और गायक अजय मूंदड़ा ने बताया कि यह ऐतिहासिक शाम न केवल विशेष बच्चों और उनके परिवारों के जीवन में नई उम्मीद लेकर आई, बल्कि पूरे जशपुर ज़िले के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई। आदिवासी कला, संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और मानवता की महक से सजी इस संध्या ने यह संदेश दिया कि सच्ची समृद्धि तभी संभव है जब हम समाज और प्रकृति दोनों को समानता और प्रेम के साथ आगे बढ़ने का अवसर दें। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित लोगों ने मोटू पतलू कॉमिक सीरीज लिखनेवाले लेखक और उन्हें उकेरनेवाले कार्टूनिस्ट डॉ हरविंदर को अपने संस्मरण बताए।

मुख्यमंत्री की सौगात: बंदरचुवा और दुलदुला में बनेगा सर्वसुविधायुक्त बस स्टेशन,वर्षों पुरानी मांग सीएम साय ने की पूरी

IMG 20250817 WA0016

जशपुर, 17 अगस्त 2025 – मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में प्रदेश में जनसुविधा आधारित अधोसंरचना विकास को नई गति मिल रही है। उनके कार्यभार संभालते ही किसानों, विद्यार्थियों, व्यापारियों और आम नागरिकों की आवश्यकताओं को केंद्र में रखते हुए विभिन्न विकास कार्यों को निरंतर स्वीकृति मिल रही है और योजनाएं तेज़ी से ज़मीन पर उतर रही हैं। इसी क्रम में मुख्यमंत्री घोषणा मद से जशपुर जिले के बंदरचुवा में सर्वसुविधायुक्त बस स्टैंड तथा दुलदुला में बस स्टैंड निर्माण हेतु कुल 1 करोड़ 99 लाख 98 हजार रुपये की स्वीकृति प्रदान की गई है। इन निर्माण कार्यों से यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी, यात्रा सुगम होगी और क्षेत्रीय परिवहन व्यवस्था को मजबूती मिलेगी। मुख्यमंत्री की पहल पर बंदरचुवा में सर्वसुविधायुक्त बस स्टैंड के निर्माण के लिए 99.99 लाख रुपए और दुलदुला में बस स्टैंड निर्माण के लिए 99.99 लाख रुपए की स्वीकृति मिली है।

विशेष लेख : देवबंद और स्वतंत्रता संग्राम: भारतीय देशभक्ति का एक विस्मृत अध्याय

IMG 20250816 WA0007

लेखक : निर्मल कुमार भारत के स्वतंत्रता संग्राम के समृद्ध ताने-बाने में, औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध कई स्वर एक साथ उठे, कुछ हथियारों के साथ, कुछ विचारों के साथ, और कई अटूट नैतिक विश्वास के साथ। इनमें, उत्तर प्रदेश के एक प्रसिद्ध इस्लामी मदरसे, दारुल उलूम देवबंद की भूमिका एक शक्तिशाली, फिर भी अक्सर उपेक्षित अध्याय है। ऐसे समय में जब भारत के धार्मिक संस्थानों से अलग-थलग रहने की उम्मीद की जाती थी, देवबंद न केवल एक आध्यात्मिक केंद्र के रूप में उभरा, बल्कि उपनिवेश-विरोधी प्रतिरोध के एक राजनीतिक केंद्र के रूप में भी उभरा। इसके विद्वानों और अनुयायियों का योगदान, जो गहरे इस्लामी मूल्यों पर आधारित है, फिर भी एक बहुलवादी, स्वतंत्र भारत के विचार के लिए प्रतिबद्ध है, भारतीय मुसलमानों के देशभक्ति के जोश का प्रमाण है। देवबंद की विरासत पर पुनर्विचार केवल ऐतिहासिक न्याय के बारे में नहीं है; यह राष्ट्रीय एकता की विस्मृत भावना को पुनः प्राप्त करने के बारे में है।   1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के कुछ ही वर्षों बाद, 1866 में स्थापित, दारुल उलूम देवबंद, औपनिवेशिक दमन के प्रति एक प्रतिक्रिया मात्र नहीं था, बल्कि यह एक वैचारिक अवज्ञा का कार्य था। जहाँ कई लोग अंग्रेजों को एक अदम्य शक्ति मानते थे, वहीं देवबंद के संस्थापकों का मानना था कि धार्मिक पहचान की रक्षा को राष्ट्र की स्वतंत्रता से अलग नहीं किया जा सकता। परिणामस्वरूप, यह संस्था धार्मिक शिक्षा और राजनीतिक चेतना का एक अनूठा संगम बन गई।   देवबंद से उभरे सबसे प्रमुख व्यक्तियों में मौलाना महमूद हसन भी थे, जिन्हें प्यार से शेखुल हिंद के नाम से जाना जाता था। उनका जीवन राष्ट्रीय स्वतंत्रता के विचार से अभिन्न रूप से जुड़ा था। उन्होंने रेशमी रूमाल तहरीक (रेशमी पत्र आंदोलन) का नेतृत्व किया, जो भारत में ब्रिटिश-विरोधी ताकतों और क्रांतिकारी समूहों के साथ सहयोग करने का एक भूमिगत प्रयास था। अंग्रेजों द्वारा उनकी गिरफ्तारी और उसके बाद माल्टा में निर्वासन ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। उन्होंने आंदोलन को खामोश नहीं किया, बल्कि भारत के मुस्लिम समुदाय, खासकर युवा मौलवियों और छात्रों के बीच, और अधिक प्रतिरोध को भड़काया। देवबंद का प्रभाव गुप्त गतिविधियों से कहीं आगे तक फैला हुआ था। इसने जमीयत उलेमा-ए-हिंद को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो स्वतंत्रता-पूर्व भारत के सबसे महत्वपूर्ण मुस्लिम राजनीतिक संगठनों में से एक था। मुस्लिम लीग, जो विभाजन की वकालत करती थी, के विपरीत, जमीयत ने खुद को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जोड़ लिया और धार्मिक आधार पर देश के विभाजन के खिलाफ दृढ़ता से खड़ी रही। वास्तव में, जमीयत की स्थिति इस्लामी शिक्षाओं में निहित थी, जो एकता (वहदत) और न्याय (अदल) पर जोर देती थी, जो उस समय की अलगाववादी राजनीति के लिए एक नैतिक प्रति-कथा प्रस्तुत करती थी।   कई देवबंदी विद्वानों ने महात्मा गांधी और अन्य राष्ट्रवादी नेताओं के साथ मिलकर अहिंसक प्रतिरोध और सविनय अवज्ञा में भाग लिया। देवबंद के एक और कद्दावर व्यक्ति मौलाना हुसैन अहमद मदनी न केवल ब्रिटिश शासन के मुखर विरोधी थे, बल्कि समग्र राष्ट्रवाद (मुत्तहिदा कौमियात) के भी प्रबल समर्थक थे। उनका तर्क था कि सभी भारतीय: हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई मिलकर एक राष्ट्र हैं और उन्हें औपनिवेशिक उत्पीड़कों के खिलाफ सामूहिक रूप से उठ खड़ा होना चाहिए। इस वैचारिक प्रतिबद्धता की एक कीमत चुकानी पड़ी। देवबंदी विद्वानों को अंग्रेजों द्वारा अक्सर गिरफ्तार किया जाता था, प्रताड़ित किया जाता था और उन पर निगरानी रखी जाती थी। उनके संस्थानों को परेशान किया जाता था और उनके आंदोलनों को दबा दिया जाता था। फिर भी, उनका संकल्प कभी नहीं डगमगाया। उनकी कक्षाएँ शिक्षा और राजनीतिक जागृति के स्थान दोनों बन गईं। उनके उपदेशों में न केवल ईश्वर की, बल्कि गांधी, नेहरू और आज़ाद की भी चर्चा होती थी। उनका विश्वास दुनिया से पीछे हटने का नहीं, बल्कि उसे बदलने की प्रेरणा था।   भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में, दारुल उलूम देवबंद और उसके विद्वानों का योगदान सम्मान के योग्य है। उन्होंने उपनिवेशवाद को केवल विरोध के माध्यम से ही नहीं, बल्कि एक सतत बौद्धिक और आध्यात्मिक प्रतिरोध के माध्यम से चुनौती दी, जिसने मुस्लिम और भारतीय होने के अर्थ को नए सिरे से परिभाषित किया। देवबंद की यह कहानी हमारी युवा पीढ़ियों के लिए एक महत्वपूर्ण अनुस्मारक है कि भारतीय मुसलमान हमेशा से स्वतंत्रता और न्याय के संघर्ष में सबसे आगे रहे हैं। जब हम अपनी स्वतंत्रता के नायकों का सम्मान करते हैं, तो हमें उस धर्म-मंच को नहीं भूलना चाहिए जिसने सत्ता के सामने सच बोला, उस मदरसे को नहीं भूलना चाहिए जिसने शहीदों को जन्म दिया, और उस आस्था को नहीं भूलना चाहिए जो स्वतंत्रता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चली।

कौन थे संविधान निर्माण में मुस्लिम दूरदर्शी? मिलिए ऐसे समावेशी भारत के वास्तुकारों से

IMG 20250816 WA0008

लेखक:निर्मल कुमार भारतीय संविधान का निर्माण केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह विविध समुदायों के बीच एक नैतिक अनुबंध था, जो उपनिवेशवाद की साझा पीड़ा और एक संप्रभु, समावेशी राष्ट्र के साझा स्वप्न से जुड़ा था। ऐसे समय में जब उपमहाद्वीप विभाजन और एकता के चौराहे पर खड़ा था, कई मुस्लिम नेताओं ने सांप्रदायिक अलगाव के बजाय संवैधानिक लोकतंत्र का मार्ग चुना। संविधान सभा में बैठे इन दूरदर्शी लोगों ने धर्मनिरपेक्षता, न्याय और समान अधिकारों को प्रतिष्ठित करने वाले एक कानूनी ढाँचे को आकार देने में मदद की। निष्क्रिय भागीदार होने से कहीं आगे, वे एक आधुनिक, बहुलतावादी भारत के सक्रिय निर्माता थे। उनका योगदान हमें याद दिलाता है कि भारत की अवधारणा कभी किसी एक धर्म या विचारधारा से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और एकता के लिए प्रतिबद्ध विचारों के एक गठबंधन से बनी थी। इन दूरदर्शी लोगों में सबसे प्रमुख थे मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, जो एक विद्वान, स्वतंत्रता सेनानी और स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री थे। संविधान सभा में उनकी उपस्थिति प्रतीकात्मक और महत्वपूर्ण दोनों थी। एक कट्टर मुसलमान और कट्टर राष्ट्रवादी, आज़ाद ने लंबे समय से द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को खारिज किया था। अपने भाषणों में, उन्होंने दोहराया कि भारत का भाग्य धार्मिक अलगाव पर नहीं, बल्कि साझा इतिहास, पारस्परिक सम्मान और एक साझा भविष्य पर आधारित हो सकता है। आज़ाद की बौद्धिक गंभीरता और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता ने संविधान के कई प्रमुख प्रावधानों को प्रभावित किया। उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देने वाले अनुच्छेद 25 और शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन के अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने वाले अनुच्छेद 30 का पुरजोर समर्थन किया। ये केवल संवैधानिक धाराओं से कहीं अधिक, विशेष रूप से उन मुसलमानों के लिए नैतिक आश्वासन थे जिन्होंने विभाजन के बाद भारत में रहने का विकल्प चुना था।आज़ाद ने भारत की शिक्षा नीति को आकार देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शिक्षा मंत्री के रूप में, उन्होंने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) की नींव रखी और सभी जातियों व समुदायों में वैज्ञानिक सोच और आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा दिया। उनके लिए, किसी राष्ट्र की प्रगति केवल संवैधानिक आदर्शों पर नहीं, बल्कि प्रबुद्ध नागरिकों पर निर्भर करती है। उन्होंने एक बार कहा था, “दिल से दी गई शिक्षा समाज में क्रांति ला सकती है।” संविधान सभा में एक और महत्वपूर्ण मुस्लिम हस्ती बेगम ऐज़ाज़ रसूल थीं, जो इस ऐतिहासिक संस्था का हिस्सा बनने वाली एकमात्र मुस्लिम महिला थीं। उनकी उपस्थिति ने ही रूढ़िवादिता को चुनौती दी और एक गहरे पितृसत्तात्मक समाज में मौजूद बाधाओं को तोड़ा। बेगम रसूल लैंगिक अधिकारों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की प्रबल समर्थक थीं। उनकी आवाज़ ने एक एकीकृत चुनाव प्रणाली बनाने के संकल्प को मज़बूत किया, जो आज भी भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रीढ़ बनी हुई है। असम के पूर्व प्रधानमंत्री सैयद मोहम्मद सादुल्लाह एक अन्य प्रमुख व्यक्ति थे जिनकी अंतर्दृष्टि ने संघीय और अल्पसंख्यक हितों के बीच संतुलन बनाने में मदद की। नागरिकता और अल्पसंख्यक सुरक्षा उपायों पर बहस में उनके हस्तक्षेप ने भारत के बहुलवादी स्वरूप की परिपक्व समझ को प्रतिबिंबित किया। उन्होंने कानूनी समानता और सामाजिक समरसता पर ज़ोर दिया, विशेषाधिकारों की नहीं, बल्कि ऐसे संरक्षण की वकालत की जिससे हर भारतीय, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, फल-फूल सके। ये मुस्लिम नेता अलग-थलग आवाज़ें नहीं थीं। वे मुस्लिम देशभक्ति के उस व्यापक परिवेश का हिस्सा थे जो इस विचार को खारिज करता था कि धर्म राष्ट्रीय निष्ठा का निर्धारण करे। आज़ादी से पहले और बाद के वर्षों में, जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे संगठनों और खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे व्यक्तियों (हालांकि संविधान सभा में नहीं) ने भारत की एकता और संवैधानिक मूल्यों का पुरज़ोर समर्थन किया। उनकी सामूहिक उपस्थिति सांप्रदायिक दुष्प्रचार का खंडन और भारत के लोकतांत्रिक भविष्य में विश्वास की पुनः पुष्टि थी। भारतीय संविधान के निर्माण पर विचार करते हुए, हमें उन मुस्लिम नेताओं को अवश्य याद करना चाहिए जो इसके निर्माण में अग्रणी भूमिका में रहे, किसी समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि एक राष्ट्र के दूरदर्शी के रूप में। उनकी विरासत केवल संविधान के पन्नों में ही नहीं, बल्कि उन अधिकारों और स्वतंत्रताओं में भी समाहित है जिनका हम आज आनंद लेते हैं। ये कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि आधुनिक भारत की नींव सभी धर्मों के लोगों के हाथों रखी गई थी। संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह उन पुरुषों और महिलाओं के साहस, दूरदर्शिता और देशभक्ति का प्रमाण है जिन्होंने विभाजन के बजाय एकता को चुना। और उस पवित्र सभा में, मुस्लिम आवाज़ हाशिये से नहीं, बल्कि भारत के हृदय से गूंजी।

बड़ी खबर: बच्चे चप्पल पहनकर स्कूल आए तो प्रिंसिपल ने कहा – भागो यहां से,अभिभावकों में रोष,लोयोला हाईस्कूल का मामला

IMG 20250802 WA0004

रिपोर्ट – संतोष चौधरी जशपुर/कुनकुरी, 2 अगस्त – एक तरफ सरकार हर बच्चे को शिक्षा दिलाने की कोशिश में करोड़ों खर्च कर रही है, वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की विधानसभा से ही ऐसी तस्वीर सामने आई है जो न केवल अमानवीय है बल्कि “शिक्षा का अधिकार कानून” (RTE Act, 2009) की खुलेआम अवहेलना है। दरअसल, जशपुर जिले के कुनकुरी स्थित प्रतिष्ठित लोयोला हायर सेकेंडरी स्कूल, जहां से खुद मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने पढ़ाई की है, वहां शनिवार को कुछ छात्रों को सिर्फ इसलिए स्कूल से बाहर निकाल दिया गया क्योंकि वे बारिश में भीगने के कारण जूते नहीं पहन सके और चप्पल पहनकर आ गए थे। बताया गया कि शुक्रवार को स्कूल से लौटते समय बारिश के चलते कई बच्चों के जूते भीग गए। शनिवार को जब वे सूखे नहीं तो मजबूरी में बच्चों ने चप्पल पहनकर स्कूल आना उचित समझा, पर प्रिंसिपल फादर सुशील टोप्पो ने इसे “अनुशासनहीनता” मानते हुए बच्चों को स्कूल परिसर से बाहर निकाल दिया। छात्र हर्ष राम (कक्षा 9वीं) का कहना है – “हमने पहले भी देखा है कि पुराने प्रिंसिपल हमारी परिस्थितियों को समझते थे, लेकिन नए प्रिंसिपल बहुत सख्त हैं। आज हम लोग को बिना पढ़ाई के घर भेज दिए।बहुत खराब लग रहा है।” वहीं अभिभावक विष्णु राम और श्रवण यादव ने इसे बच्चों के शिक्षा के अधिकार का हनन बताया और जिला प्रशासन से मामले में कठोर कार्रवाई की मांग की है। क्या कहता है कानून? “शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009” (Right to Education Act) के तहत कोई भी स्कूल 6 से 14 वर्ष की आयु के किसी भी बच्चे को इस तरह शिक्षा से वंचित नहीं कर सकता। यूनिफॉर्म संबंधी नियमों के पालन में लचीलापन आवश्यक है, विशेषकर जब मामला गरीब परिवारों या प्राकृतिक परिस्थितियों से जुड़ा हो। प्रिंसिपल ने रखा अपना पक्ष इस घटना के बारे में जब हमने लोयोला हाईस्कूल हिंदी मीडियम के प्रिंसिपल फादर सुशील तिग्गा से बात की तो उन्होंने यह स्वीकार किया कि बिना जूता पहने स्कूल आने वाले छात्रों को बिना आवेदन के क्लास में बैठने नहीं दिया जाता।सुशील ने बताया कि हमने बच्चों को जुलाई तक रियायत दी थी।आज तीन छात्र मेरे पास आए थे,उन्होंने बारिश में जूता भींगने की बात बताई थी तो मैने उन्हें आवेदन देने को कहा था लेकिन उन्होंने आवेदन नहीं दिया और स्कूल से बाहर चले गए। प्रशासन से अपील इस मामले की जानकारी मिलने पर कई अभिभावकों ने कहा – “यह मामला न सिर्फ संवेदनशील है, बल्कि कानूनन भी गलत है। ज़रूरत है कि जिला शिक्षा अधिकारी, बाल संरक्षण आयोग और प्रशासन इस घटना की उच्च स्तरीय जांच कराए और बच्चों को पुनः शिक्षा से जोड़ा जाए। साथ ही स्कूल प्रशासन को निर्देशित किया जाए कि बच्चों की समस्याओं को मानवीय दृष्टिकोण से समझें।”

*कांवड़ यात्रा:* *एक पवित्र यात्रा जो सम्मान और सहिष्णुता की हकदार है*

IMG 20250801 WA0001

निर्मल कुमार भारत के सर्वाधिक पूजनीय तीर्थयात्रा में से एक, कांवड़ यात्रा, देश भर के करोड़ों शिव भक्तों द्वारा की जाने वाली एक वार्षिक आध्यात्मिक यात्रा है। श्रावण के पवित्र महीने में, कांवड़िये कहे जाने वाले ये तीर्थयात्री, नंगे पैर और अक्सर कठोर मौसम में, सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर गंगा से पवित्र जल इकट्ठा करते हैं और उसे उत्तर भारत के मंदिरों में भगवान शिव को अर्पित करते हैं। यह सदियों पुरानी परंपरा ईश्वर के प्रति गहरी व्यक्तिगत आस्था, अनुशासन और समर्पण का प्रतीक है। फिर भी, हाल के वर्षों में, जिसे भारतीय आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक एकता के एक जीवंत उदाहरण के रूप में मनाया जाना चाहिए, उसे कभी-कभी गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है और अनुचित रूप से निशाना बनाया गया है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि कांवड़ यात्रा कोई खतरा नहीं है, यह एक शांतिपूर्ण, धार्मिक परंपरा है जो सभी समुदायों के सम्मान और समर्थन की हकदार है। हमारे जैसे विविध राष्ट्र में, धार्मिक सहिष्णुता एक विकल्प नहीं, बल्कि एक कर्तव्य है और इस पवित्र समय में, समाज के सभी वर्गों को शांति, धैर्य और आपसी समझ सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करना चाहिए।   कांवड़िये कोई राजनीतिक एजेंट या उपद्रवी नहीं हैं, वे आम नागरिक हैं, जिनमें छात्र, मजदूर, किसान, पेशेवर और यहाँ तक कि पूरा परिवार भी शामिल है, जो अपने जीवन से आध्यात्मिक पथ पर चलने के लिए समय निकालते हैं। वे अपने आराध्य के प्रति प्रेम के कारण कष्ट और थकान सहन करते हैं। इस प्रकार की भक्ति आधुनिक समय में विरले ही देखने को मिलती है और इसकी प्रशंसा की जानी चाहिए, आलोचना नहीं। दुर्भाग्य से, कुछ उपद्रवी व्यक्तियों से जुड़ी छिटपुट घटनाओं को अक्सर मीडिया और सोशल मीडिया पर प्रमुखता से दिखाया जाता है, जिससे अधिकांश लोगों की भक्ति दब जाती है। यह कहानी अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जाती है कि यह यात्रा सार्वजनिक जीवन को बाधित करती है या सांप्रदायिक तनाव पैदा करती है। सच तो यह है कि ज़्यादातर कांवड़िये अनुशासन का पालन करते हैं, झगड़ों से बचते हैं और प्रार्थना करते हुए चुपचाप चलते हैं।   यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि यात्रा के दौरान, सरकारी अधिकारी यातायात, सफ़ाई और सुरक्षा प्रबंधन के लिए गंभीर प्रयास करते हैं। स्वयंसेवक और गैर-सरकारी संगठन, जिनमें अन्य धार्मिक समुदाय भी शामिल हैं, अक्सर अपनी सेवाएँ प्रदान करते हैं।पानी, भोजन या प्राथमिक उपचार वितरित करके सहायता प्रदान करना। यह भारत की परस्पर सम्मान की गहरी जड़ें जमाए हुए संस्कृति की कहानी कहता है। हालाँकि, कुछ मिश्रित आबादी वाले क्षेत्रों में, कांवड़ यात्रा को संदेह या असहजता की दृष्टि से देखा जाता है, जिससे अनावश्यक तनाव पैदा होता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है और यात्रा की भावना के साथ घोर अन्याय है। जिस प्रकार अन्य समुदाय अपने त्योहारों और धार्मिक प्रथाओं के सम्मान की अपेक्षा करते हैं, उसी प्रकार कांवड़ियों को भी इसी तरह के सम्मान की आवश्यकता है।   भारत विविध धर्मों का देश है, लेकिन इसके मूल में एक साझा मूल्य निहित है: शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व। कोई भी धार्मिक समुदाय तब तक फल-फूल नहीं सकता जब तक वह दूसरे की आस्था की अभिव्यक्ति को दबाने की कोशिश न करे। सहिष्णुता चयनात्मक नहीं होनी चाहिए। अगर रमज़ान के दौरान लाउडस्पीकर या क्रिसमस के दौरान ईसाई जुलूस स्वीकार्य हो सकते हैं, तो निश्चित रूप से सार्वजनिक सड़कों पर शांतिपूर्वक और क़ानूनी ढंग से आयोजित हिंदू भक्ति के कुछ दिनों का भी स्वागत किया जाना चाहिए। यह प्रतिस्पर्धा का विषय नहीं है; यह करुणा का विषय है। धार्मिक सहिष्णुता का अर्थ है दूसरों की भक्ति का सम्मान करना, भले ही वह आपकी अपनी न हो। आख़िरकार, शिव, जिनकी कांवड़िये सेवा करते हैं, उन्हें “भोलेनाथ” भी कहा जाता है, यानी वे भोले भगवान जो बिना किसी भेदभाव के सभी को गले लगाते हैं।   हाँ, सभी तीर्थयात्रियों को कानून का पालन करना चाहिए और उकसावे से बचना चाहिए, लेकिन बाकी सभी को भी ऐसा ही करना चाहिए। स्थानीय समुदायों, नागरिक समाज और मीडिया का भी यह समान कर्तव्य है कि वे ज़िम्मेदारी से काम करें और छोटी-छोटी घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने से बचें। विभाजन को बढ़ावा देने के बजाय, उन्हें आपसी सम्मान और सद्भाव को बढ़ावा देना चाहिए। भारत की आत्मा उन त्योहारों में निहित है जहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाई पड़ोसी एक-दूसरे का हाथ थामकर एक-दूसरे का साथ देते हैं। कांवड़ यात्रा के दौरान भी यही क्रम जारी रहे।   कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, यह भक्ति, एकता और दृढ़ता का जीवंत उदाहरण है। ऐसे समय में जब दुनिया आस्था और पहचान के आधार पर विभाजित होती जा रही है, यह तीर्थयात्रा हमें विश्वास और सहनशीलता की शक्ति का स्मरण कराती है। आइए, कुछ घटनाओं या राजनीतिक उद्देश्यों को इसकी पवित्रता को धूमिल न करने दें। अन्य समुदायों के हमारे भाइयों और बहनों से, यह एक विनम्र अपील है: इस पवित्र यात्रा के दौरान अपने कांवड़िये पड़ोसियों के साथ खड़े रहें। धैर्य रखें, सम्मान करें और दयालु बनें। उनकी भक्ति आपकी भक्ति को कम नहीं करती; उनकी आस्था आपकी आस्था को खतरे में नहीं डालती। जिस प्रकार आप अपने धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान शांति और सम्मान चाहते हैं, उसी प्रकार दूसरों को भी प्रदान करें। भारत तभी मजबूत रह सकता है जब उसके लोग केवल सड़कों और यात्राओं पर ही नहीं, बल्कि दिलों ओ दिमाग से भी एक साथ चलें। (नोट:लेखक निर्मल कुमार आर्थिक,सामाजिक और धार्मिक मुद्दों के जानकार हैं और यह उनके निजी विचार हैं।)

बिलासपुर गांव में दबंगई: धार्मिक-सामाजिक अशांति फैलाने और सीसी रोड पर कब्जा कर मकान निर्माण का आरोप, ग्रामीणों ने पट्टा निरस्तीकरण की उठाई मांग

IMG 20250724 WA0003

जशपुर/कुनकुरी, 24 जुलाई 2025/ कुनकुरी विधानसभा अंतर्गत ग्राम पंचायत रेंगारघाट के आश्रित ग्राम बिलासपुर में झूलन राम चौहान पिता स्व. गुरबारु राम द्वारा किए जा रहे मकान निर्माण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि झूलन राम न केवल सीमेंट-कांक्रीट (सीसी) सड़क से सटाकर मकान बना रहा है, बल्कि गांव में धार्मिक और सामाजिक अशांति भी फैला रहा है। ग्रामीणों ने 8 जुलाई 2025 को मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय बगीचा में आवेदन प्रस्तुत कर शासन से मांग की है कि झूलन राम को प्रदाय किया गया आवासीय पट्टा शासन के नियमों के विरुद्ध है और इसे तत्काल निरस्त किया जाए। मुख्यमंत्री को सौंपे गए आवेदन में ग्रामीणों ने जो बिंदु प्रस्तुत किए, वे इस प्रकार हैं— झूलन राम को दिया गया पट्टा गलत तरीके से जारी हुआ है। वह जिस वार्ड का निवासी है, वह प्लॉट उस क्षेत्र में नहीं आता। मकान निर्माण सीसी रोड से बिल्कुल सटा हुआ है और दूसरी ओर सड़क किनारे बोर खनन भी किया गया है, जिससे ग्रामीणों को आवागमन में कठिनाई हो रही है। वहीं गांव में धार्मिक-सामाजिक वातावरण को बिगाड़ने की नियत से लगातार दबाव और टकराव की स्थिति उत्पन्न की जा रही है। ग्राम पंचायत व तहसील स्तर पर शिकायतों के बावजूद झूलन राम किसी भी निर्णय का पालन नहीं कर रहा है। उसके पास पहले से ही ग्राम बिलासपुर में 2.1920 हेक्टेयर और मकरिबन्धा (दुलदुला) में 1.7200 हेक्टेयर भूमि उपलब्ध है। वह हर साल 73 क्विंटल से अधिक धान का उत्पादन कर मंडी में बिक्री करता है। वर्ष 2024-25 में उसने 72 क्विंटल मोटा धान बेचकर सरकार से ₹1,55,892.50 की राशि प्राप्त की है, जो प्रमाण सहित है। टीप स्वरूप तीन और गंभीर आरोप लगाए गए हैं— 1. झूलन राम ने ईब नदी से लगी हुई लगभग 3 एकड़ भूमि पर भी अवैध कब्जा कर रखा है। 2. गांव के स्थायी निवासी और पुलिस विभाग में आरक्षक के पद पर पदस्थ संतोष भगत पर झूठा आरोप लगाया गया है कि वह गांव वालों को भड़का रहा है, जबकि गांव वाले इसके साक्षी हैं कि यह आरोप निराधार है। 3. तहसील और पंचायत स्तर से प्राप्त आवेदन की प्रतिलिपि भी सलग्न की गई है। *आवेदन के बाद की स्थिति:* 8 जुलाई 2025 को यह आवेदन सीएम कैंप बगिया में दिया गया। इस आवेदन पर तहसीलदार स्तर पर जांच हुई है, जिससे डरकर झूलन राम अब सड़क के ऊपर बनाए छज्जे को तोड़ा है, लेकिन सड़क से मकान नहीं हटाया है। ग्रामीणों ने इस बात का प्रमाण खबर जनपक्ष को देते हुए बताया कि खरीफ वर्ष 2024-25 में झूलन ने 72 क्विंटल मोटा धान बेचकर सरकार से ₹1,55,892.50 प्राप्त किया है। ऐसे में उसे भूमिहीन कैसे माना जाए? अब ग्रामीणों ने झूलन की करतूतों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। ग्रामीणों की स्पष्ट मांग है कि शासन इस मामले में निष्पक्ष कार्रवाई करते हुए तत्काल उक्त विवादित पट्टा को निरस्त करे ताकि ग्राम का सामाजिक सौहार्द बना रह सके। राजनीतिक संदर्भ में भी मामला संवेदनशील उल्लेखनीय है कि यह वही ग्राम बिलासपुर है, जो कुनकुरी विधानसभा क्षेत्र में आता है और जहां वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को बंपर वोट मिला था।भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ताओं में यह चिंता है कि यदि शासन को गुमराह कर बड़े किसान को लाभ पहुंचाने वाले इस पट्टे को निरस्त नहीं किया गया, तो इसका सीधा नुकसान पार्टी को आगामी चुनाव में हो सकता है।

💥 मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस नीति पर बम्हनी में भारी पड़ता भ्रष्टाचार, ग्रामीणों ने की उच्चस्तरीय जांच की मांग 💥

IMG 20250713 WA0002

जशपुर/दुलदुला,13 जुलाई 2025 –  मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की ‘भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस’ की नीति को उनके ही अधिकारी और पार्टी कार्यकर्ता दुलदुला क्षेत्र में चुनौती दे रहे हैं। ऐसा ही एक मामला बम्हनी पंचायत में सामने आया है, जहां मुख्यमंत्री समग्र विकास योजना के अंतर्गत शंकर घर से महादेव चट्टान तक करीब 5 लाख 20 हजार रुपए की लागत से बनी सीसी रोड की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि यह सड़क पंचायत के एक कथित “ठेकेदार” ने बनाई है, जो पहले कांग्रेस शासनकाल में विधायक यूडी मिंज का करीबी था और अब बीजेपी सरकार में पाला बदलकर नए विधायक और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के इर्द-गिर्द सक्रिय हो गया है। हैरानी की बात यह है कि सरकार बदलती है, लेकिन इंजीनियर नहीं बदलते — जो तब भी काम देख रहा था और आज भी वही जिम्मेदार अधिकारी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़क बने महज दो महीने हुए हैं और गिट्टी सीमेंट छोड़ने लगी है, बालू बहने लगा है। न तो निर्माण से पहले जमीन की ठीक से तैयारी की गई, और न ही निर्माण के दौरान वाइब्रेटर जैसी आवश्यक तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इसका नतीजा – बारिश में सड़क की परतें उधड़ने लगी हैं। सबसे गंभीर आरोप यह है कि दुलदुला विकासखंड में सीसी रोड निर्माण के नाम पर ठेकेदारों और तकनीकी अधिकारियों की मिलीभगत से साइड में मोटी परत और बीच में कमज़ोर सामग्री डालकर लाखों का घोटाला किया जा रहा है। इन रोडों की हालत देखकर “विकास की रफ्तार को राफेल से जोड़ना” ग्रामीणों की नजर में व्यंग्य बन गया है।   जब इस मामले में सरपंच से बात की गई, तो उन्होंने खुद को “टेक्निकल नहीं हूँ” कहकर पल्ला झाड़ लिया। यह जवाब अपने आप में ग्रामीण व्यवस्था की एक बड़ी विडंबना को उजागर करता है। ग्रामीणों की मांग: 1. सड़क निर्माण की उच्चस्तरीय जांच। 2. महादेव चट्टान के पास तत्काल पुलिया निर्माण, जिसे बारिश से ठीक पहले जेसीबी लगाकर खोद दिया गया है, जिससे आने-जाने में परेशानी हो रही है। ग्रामीणों ने पवित्र सावन मास में भगवान शिव के मार्ग पर भ्रष्टाचार की परतें बिछाने वालों के खिलाफ मुख्यमंत्री से स्वयं संज्ञान लेने की अपील की है।

कोटपा एक्ट के तहत कुनकुरी शहर में तंबाकू उत्पादों के खिलाफ सख्त कार्रवाई,स्कूलों के समीप कई दुकानें कोटपा के उल्लंघन करती मिली

IMG 20250603 125846

कोटपा एक्ट के तहत तंबाकू उत्पादों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कुनकुरी, 3 जून 2025: SDM नंदजी पांडे और एसडीओपी कुनकुरी विनोद मंडावी के निर्देश पर थाना प्रभारी राकेश यादव और तहसीलदार प्रमोद पटेल की टीम ने कोटपा एक्ट के तहत क्षेत्र में सख्त कार्रवाई की। यह कदम खासतौर पर स्कूलों के खुलने से पहले उठाया गया, ताकि बच्चों को तंबाकू और नशीले पदार्थों से बचाया जा सके। कुनकुरी क्षेत्र में शंकरनगर, जनपद कार्यालय और आसपास के इलाके में स्थित प्रमुख किराना दुकानों और ठेले-खोमचों में कार्रवाई की गई। इन दुकानों पर नशीले पदार्थों और तंबाकू उत्पादों की बिक्री की जा रही थी। कार्रवाई में राजेश गुप्ता किराना, दिलीप जैन किराना, कोलंबो खान, और मिश्रा किराना स्टोर्स के साथ-साथ अन्य दुकानों के मालिकों के खिलाफ जुर्माना लगाया गया और तंबाकू उत्पादों को जब्त किया गया। थाना प्रभारी राकेश यादव ने बताया कि यह कार्रवाई 15 जून से स्कूलों के खुलने को ध्यान में रखते हुए की गई है, ताकि बच्चों और युवाओं के बीच तंबाकू उत्पादों का सेवन न बढ़े। उन्होंने कहा, “यह कदम क्षेत्र में तंबाकू के अवैध बिक्री और इसके दुष्प्रभाव को रोकने के लिए उठाया गया है, और भविष्य में भी इस तरह की कार्रवाई जारी रहेगी।” कोटपा एक्ट (कंट्रोल ऑफ टोबैको प्रोडक्ट्स एक्ट) के तहत, यह सुनिश्चित किया जाता है कि स्कूलों के पास तंबाकू उत्पादों की बिक्री न हो, और यह कदम बच्चों और युवाओं के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए महत्वपूर्ण है।